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Friday, 20 October 2017

हो कोई जवाब तो तसल्ली करा दो!

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ये कहकर अदालत ने
अपना दरवाजा बंद कर लिया
कि आरुषि को
तलवार दम्पत्ति ने नहीं मारा,
लगभग सभी ने राहत की सांस ली;
अगर ये राहत है तो किस बात की,
कि महफूज़ नहीं हैं अब
घरों में भी बेटियां,
कि पहले तो गुनाह
सूरत में हुआ करते थे
अब एलियन गुनाह करते हैं,
कि वक़्त हर ज़ख़्म
भर देता है
कि आरुषि हमारी अपनी तो नहीं,
कि यहाँ तो
हर रात सनसनीखेज होती है
हर गली का एक
किस्सा मशहूर है,
कि सोचने को बस एक
यही बात तो नहीं
एक नन्हीं सी जान
और उसपर सौ अफसाने हैं,
कि....
ये फेहरिस्त बहुत लंबी है
हजारहां सवाल हैं
और दर्द में सुलगती आँखे हैं:
अब वो नहीं आएगी कभी
इंसाफ की भीख मांगने,
मगर सवाल ये है कि
बेटी जब तक घर नहीं आती
घर राह तकता है
फिर उसे सुलाकर
वो खुद भी सो जाता है,
एक रात अचानक उसकी नींद खुलती है
वो बदहवास सा
ये सोचकर बेटी को हमेशा के लिए
सुला देता है
कि कोई और न ये कर दे??
कोई जवाब हो तो तसल्ली करा दो:
कि गुनहगार की सूरत बता दो,
जिस लम्हे इंसाफ हो वो वक़्त मिला दो,
इंसानियत के नाते अपनापन दिखा दो,
वारदात न हो जिसमें वो रात बना दो,
लाल न हो जो गली वो राह दिखा दो,
गर ये भी न सोचूँ, तो क्या मैं सोचूँ,
सोच में फर्क की ये दीवार गिरा दो।

एक और दीवाली की सुबह।

दीवाली की धमधमाती रात की अगली सुबह यूँ तो शांत होनी ही थी। ऐसे में ड्राइव करने का अलग ही आनन्द होता है। पर आज कुछ ज़्यादा ही मौन था चारों ओर। घरों के खिड़की, दरवाजे लॉक थे कि लोग छुट्टी मना रहे थे, इससे भी बड़ा एक कारण था मौनता का कि रोड किनारे हर जगह जानवर चित्त पड़े थे। ये वो प्रहरी हैं जो सुबह होते ही मुस्तैद हो जाते हैं पर आज चौकस नहीं थे क्योंकि जब हम तेज आवाज में पटाखे फोड़कर दीवाली की खुशियां मना रहे थे तब ये छुपने को जगह तलाश कर रहे थे।
हम अपनी खुशियां मनाने के लिए कभी-कभी किसी को दूर तक परेशानी में डाल देते हैं। इन जानवरों का क्या क़ुसूर था कि रात भर आराम की नींद नहीं सो पाए। दीवाली की खुशियां जरूर मनाइए पर अपने आस-पास जानवरों, बुजुर्गों और बच्चों का ख़याल करके। ऊंची-ऊंची बिल्डिंग की छोटी तंग गलियों में डेसिबल की धज्जी उड़ाते फोड़ू बम महज पैसों का बेजा प्रदर्शन है। बेहतर होगा कि आप अपनी सामग्री को एकत्रित कर एक पार्क में निकल जाइए और खूब मनाइए दीवाली का जश्न।
त्योहार मनाना ग़लत नहीं बस आपका तरीका सही हो।

Wednesday, 18 October 2017

इतिश्री.... एक बुझे हुए दिये की।

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शहर के कोलाहल से दूर
जंगल के वीरानों में
नयी सड़क से लगी हुई
पुरानी पशेमां गली पर
ज़्यादा दूर नहीं
उस पीपल के पीछे
एक टूटा-झुका सा
पर खण्डहर नहीं
हाँ उम्मीद का मारा
इस दरवाजे से जाता हुआ
उस निकास के आगे
बस बरसों में अपनी उम्र गिनकर
इतने ही कदम चलो
यही तो है वो आबो-हवा
जो तुम्हें बुला रही है
आशीष देने को
ये गूलर, ये नीम
और इनके नीचे सो रही
तुम्हारी माँ
इन्हीं के सिरहाने पापा भी तो हैं
ऊर्ध्वाधर लेटे
जब तक साँस थी
एक चम्मच पानी के भी
गुनहगार न हुए
आज उनकी समाधि पर
दीपक जलाकर दे ही दो
अपने जीवित होने का प्रमाण
फिर उल्टे पैरों लौटोगे
मुझे पता है
बीवी को शॉपिंग करानी है
जाते-जाते कहीं से लंब
तो कहीं से क्षैतिज हुए
खण्डहर नुमा हवेली के
एक पाये पर सर टिकाकर
श्रद्धांजलि दोगे।
इतिश्री।

Sunday, 15 October 2017

ऑटो अपडेट वर्जन

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लोग कहते हैं
समय के साथ
प्यार पुराना हो जाता है,
मगर जान
तुम तो हमारा
ऑटो अपडेट वर्जन हो,

न पुराने होगे
न बदलने पड़ोगे;
हो भी तो वायरस फ्री,
विश्वास और मोह के
दो पायों पर टिकी
शीत, ताप, बारिश की छत हो जैसे:

जब 25 अप्रैल को
लोग कहते हैं....
धरती हिली थी,
हम तो
जैसे तुम्हारी लहर की गोद में थे,
भूकम्प
हमारा पता जाने बगैर ही गुजर गया;
अच्छा है जो अपना इश्क़ हार्डवेयर नहीं है
 
छुप जाते हो,
कलम की स्याही,
शब्दों की खुशबुएँ बनकर;
ये न जताना
कि तुम इस अनारकली के
शहजादा सलीम हो,
कहीं जहाँपनाह की शमसीर
सौ बार हमें जिबह न कर दे,
किसी ने छुप-छुपकर
मिलते-मिलाते देखा भी तो
सौ बार गंगा मइया से बोला
बस इस बार बचा लो,
कल ही हरिद्वार आते हैं
पिछले हर कसम की डुबकी लगाने:

खण्डहर की छत पे
हो एक टूटी खाट
स्याह नभ के तले
तुम्हारी कलाई थामे हो हमारा हाथ
और हमें क्या चाहिए,
ए सी कमरों में
बनावटी सामानों के बीच
पहाड़नुमा चीड़-सागौन के
नक्काशीदार बेड की नरम बिछावन पर
तुम स्लो सिस्टम लगते हो हमें:

हम प्यार बेशुमार करते है,
  इस प्यार में
नहीं कोई इतवार करते हैं,
और ऐतबार से कहते हैं
अगर प्रेम जैसे खौफनाक
मगर यूनिवर्सल ट्रूथ को आगे बढ़ाया जाए,
तुम्हारे जैसे आशिक़ को
हमारे जैसी महबूबा से मिलाया जाए,
तो थर्ड वर्ल्ड वार खयालों में भी न होगा।