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नुक्ते भर प्रेम




वह पहाड़ियों की ढलान से
भेड़ें हाँककर आता है
और वह उसे पश्मीना ओढ़ा देती है
वह खाली गिलास की ओर देखता है
वह पानी लिए हाज़िर होती है
वह पाँवों की उँगलियों को भीतर की ओर मोड़ता है
वह देह सहित बिछ जाती है
कब, कहाँ, किसमें, कैसे, कितना है
दोनों ही नहीं जानते
मगर यह इश्क़ में क के नीचे
जो नुक्ते भर इश्क़ है न
वह इन्हीं जैसों की बदौलत है

यह जो पहाड़ है न
कोई किताब हो जैसे
और तुम्हारे शब्द
गोया पहाडियों पर फैली भेड़े

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