" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!: अप्रैल 2026

रविवार, 19 अप्रैल 2026

वो 92 प्रतिशत और एक अधूरी मुस्कान










एक कमरे के सन्नाटे में,

ढेर सारी किताबें अब भी सो रही हैं, 

मेज पर पड़ी वो नीली स्याही, 

आज लहू बन कर रो रही है


नब्बे प्रतिशत... बांध न पाए, 

उस नन्हीं सी जान के डर को, 

कितना भारी कर दिया हमने, 

कोमल पंखों वाले घर को


वह जो मुस्कान चश्मे के पीछे, 

शायद एक समंदर छुपाए थी, 

हम पढ़ते रहे केवल अंकों को, 

वो सिसकियाँ दबाए थी


पूछा होता "आज मन कैसा है?" 

नंबरों की जगह उसे पुचकारा होता, 

एक कागज़ का टुकड़ा हार जाता, 

मगर हमारा बच्चा न हारा होता


सुनो दुनिया वालों, ये जीत नहीं, 

ये हार है हमारी और तुम्हारी, 

जब एक मासूम की सांसों पर, 

नंबरों की होड़ पड़ जाए भारी


लौट आओ वैशाली...

हमें तुम्हारे 'अंक' नहीं, तुम चाहिए थी, 

इस बेजान मार्कशीट की जगह, 

हँसती-खेलती एक मासूम चाहिए थी


एजुकेटर और काउंसलर के रूप में यहाँ  साझा कर रही हूँ ,कुछ महत्वपूर्ण लक्षण जिन्हें परिवार अक्सर अनदेखा कर देते हैं:

  • बच्चे का अचानक चुप हो जाना या अकेले रहना

  • नींद और भूख के पैटर्न में बदलाव

  • अपनी उपलब्धियों के बावजूद उदास रहना

  • "मेरे होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है" जैसी बातें करना


समाधान और बदलाव की दिशा

  • अपने बच्चों से केवल "कितनी पढ़ाई हुई?" न पूछें, बल्कि "आज तुम कैसा महसूस कर रहे हो?" यह भी पूछें. 

  • बच्चों को बताएं कि गिरना गलत नहीं है, गिरकर न उठना समस्या है. 

  • मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो वर्जना (Taboo) है, उसे तोड़ें. काउंसलर के पास जाना कमजोरी नहीं, समझदारी है.

#MentalHealthAwareness #StudentSuicidePrevention #ParentingTips #EducationSystem #DailyDoseOfMentalWellness #VaishaliSingh #MentalPeace #MentalHealthAwareness #StudentSuicidePrevention #ParentingTips


क्या आप अपने विचारों में उलझे हुए महसूस कर रहे हैं? मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना आपकी शारीरिक सेहत और खुशियों को प्रभावित कर सकता है. Psychology और Counseling से जुड़ी किसी भी समस्या के समाधान के लिए हमसे जुड़ें. हम यहाँ हैं, आपकी बात सुनने और आपको सही दिशा दिखाने के लिए. 🧠✨ 📞 अभी कॉल करें: 8090373331 📧 मेल करें: abhi.abhilasha86@gmail.com #PsychologyIndia #MentalHealthAwareness #CounselingServices #StressManagement #Healing #TherapyMatters #MentalHealthProfessional #India #TalkToSomeone "मदद माँगना कमजोरी नहीं, बहादुरी की निशानी है"

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला




मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा वह नहीं जो उसे मिली, बल्कि वह है जो उसे मिलनी चाहिए थी और नहीं मिली.


~दोस्तोयेवस्की


मनुष्य का जीवन उपलब्धियों और अभावों की एक निरंतर चलती रहने वाली कहानी है. हम अक्सर यह मानते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पीड़ा वह 'चोट' है जो हमें लगी है चाहे वह असफलता हो, आर्थिक हानि हो या किसी प्रियजन का बिछोह. किंतु गहराई से विचार करने पर यह सत्य उभरता है कि मिली हुई पीड़ा से कहीं अधिक गहरी वह टीस होती है जो 'अप्राप्यता' से जन्म लेती है. यह विचार कि "जो हमें मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला", एक ऐसी मानसिक फाँस है जो जीवन भर हृदय में चुभती रहती है.


​मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो मिली हुई पीड़ा का एक 'अंत' होता है. यदि कोई दुर्घटना हुई, तो समय के साथ उसके घाव भर जाते हैं. मनुष्य की चेतना उसे स्वीकार कर लेती है और अनुकूलन (adaptation) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. लेकिन जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला, वह कभी घटित ही नहीं हुआ, इसलिए उसका कोई अंत भी नहीं होता. वह एक 'अधूरी संभावना' बनकर मन के किसी कोने में जीवित रहता है.


​यह पीड़ा कई रूपों में सामने आती है. जब एक योग्य व्यक्ति को वह पद या सम्मान नहीं मिलता जिसका वह हकदार था, तो वह न्याय की कमी को महसूस करता है. बचपन में माता-पिता का अपेक्षित प्रेम न मिलना या जीवनसाथी से वह सम्मान न मिलना जिसकी व्यक्ति को आशा थी. वह करियर या वह मुकाम जो बस एक कदम की दूरी पर था, पर मिल न सका. ​इस पीड़ा का सबसे बड़ा कारण 'अपेक्षा' और 'तुलना' है. जब हम देखते हैं कि हमसे कम योग्य व्यक्ति वह सब प्राप्त कर रहा है जिसके लिए हमने कठिन परिश्रम किया, तो 'न्याय की अवधारणा' खंडित हो जाती है. मिली हुई पीड़ा को हम 'भाग्य' मानकर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अप्राप्त वस्तु को हम 'अन्याय' मानते हैं. अन्याय की यह भावना मनुष्य को भीतर से कुंठित कर देती है.


​यह दुःख एक 'शून्य' (void) की तरह होता है. शून्य को भरना कठिन है क्योंकि वह अदृश्य है. मिली हुई चोट का इलाज संभव है, पर उस रिक्तता का क्या करें जो कभी भरी ही नहीं गई?


​भारतीय दर्शन में इसे 'तृष्णा' और 'असंतोष' के संदर्भ में देखा गया है. बुद्ध कहते हैं कि दुःख का मूल चाहत है. जब हम "जो मिलना चाहिए था" पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम वर्तमान की उन चीजों को भूल जाते हैं जो हमें "मिली हुई" हैं. यह पीड़ा दरअसल हमारे अहंकार और भविष्य की उन कल्पनाओं का परिणाम है जिन्हें हमने सच मान लिया था.


​"स्मृति की गलियों में वह मोड़ सबसे अधिक डराता है, जहाँ हम वह नहीं बन पाए जो हम बन सकते थे"


​इस सबसे बड़ी पीड़ा से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है- स्वीकार्यता (Acceptance). यह स्वीकार करना कि जीवन रैखिक (linear) नहीं है और न ही यह हमेशा 'योग्यता बनाम प्रतिफल' के गणित पर चलता है. जो नहीं मिला, उसे 'अस्तित्व का निर्णय' मानकर छोड़ देना ही मानसिक शांति का द्वार है.


​अंततः, मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा उसकी वह 'काल्पनिक पूर्णता' है जिसे वह प्राप्त नहीं कर सका. मिली हुई पीड़ा हमें मजबूत बनाती है, लेकिन न मिलने वाली पीड़ा हमें खोखला कर सकती है. यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें कि जीवन केवल वही नहीं है जो हमें मिलना चाहिए था, बल्कि वह भी है जो हमारे पास आज है, तो हम इस अदृश्य टीस से मुक्त हो सकते हैं. रिक्तता को कोसने से बेहतर है कि जो उपलब्ध है, उससे अपना संसार सजाया जाए.

 

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php