"तो आप आज ये प्रमाणित कीजिए कि आप हमारी मित्र हैं"
"इसके लिए क्या करना होगा हमें?"
"हम आज मयूरी विहार जाना चाहते हैं, आप अनुमति दीजिए"
"बस कुछ क्षण प्रतीक्षा कर लो. तुम्हारे भाई सा आ रहे होंगे"
"नहीं, हम अभी इसी क्षण और अपने चेतक पर अकेले जाना चाहते हैं"
"यह इच्छा हम पूरी नहीं कर सकते"
..
"यह मत भूलो कि तुम सौंदर्य कला से पूर्ण एक युवती भी हो"
"परन्तु अपनी सुरक्षा तो कर सकते हैं"
"कुछ भी हो… महाराज के आने तक तुम्हें ठहरना ही होगा"
"ठीक है हम भी अब अन्न जल तब तक नहीं ग्रहण करेंगे, जब तक महाराज नहीं आते"
"पुत्री तुम नाहक ही वाद कर रही हो"
"माँ सा… हमारा चेतक बाहर प्रतीक्षा कर रहा"
"हम निर्लज्ज तो नहीं आप निर्मोहिनी अवश्य प्रतीत होती हैं. एक भटकते हुए पथिक पर तनिक भी दया नहीं"
"दया या निर्दयता का कोई प्रश्न ही नहीं. आइये हमने झील का स्थान रिक्त कर दिया. जल गृहण कीजिए"
"ऐसे नहीं राजकुमारी हम तो आपकी अंजुरि से गृहण करेंगे"
"आप तो बहुत हठी प्रतीत होते हैं"
वेश भूषा और वार्तालाप से पूरा संकेत मिल रहा था कि वो एक साधारण व्यक्ति न होकर राजकुमार हैं.
"तो आप द्वैत गढ़ की राजकुमारी हैं?" उन अपरिचित ने प्रश्न कर राजकुमारी का ध्यान भंग करने की चेष्टा की.
"हम किन शब्दों में अपना परिचय दें तो आप समझेंगे?"
राजकुमारी ने भी अपनी हठ नहीं छोड़ी.
"आप अपनी जिह्वा को अधिक विश्राम नहीं देती हैं?"
"आप प्रश्न अधिक नहीं करते हैं?"
"हमें आपके प्रत्युत्तर भाते हैं"
राजकुमारी के नेत्रों में न परन्तु हृदय पर हाँ की छाप लग चुकी थी.
"आप यहाँ आती रहती हैं क्या?"
"हम क्यों बताएँ?"
"हम पूछ रहे क्या ये कारण पर्याप्त नहीं?"
"आप तो हमसे ऐसे कह रहे जैसे हमारे सखा हों!"
"आप हमारी सखी तो हैं"
"हमने कब ऐसा कहा? हम तो आपसे वार्तालाप नहीं कर रहे"
"वार्तालाप तो आप अब भी कर रहीं और तो और हमें अंजुरि में जल भरकर दिया"
"बात करने का तो कुछ और ही प्रयोजन है और जल देकर तृषा बुझायी"
"आपको देखते ही रेत का एक जलजला हमारे भीतर ठहर गया और आप कहती हैं तृष्णा बुझ गयी"
"आप हमें बातों के जाल में उलझा रहे हैं"
"आपके नेत्रों ने हमारा आखेट किया है"
"यह कैसा आरोप है?"
"क्या प्रमाण नहीं चाहेंगी?"
"---"
"हमें अनुमति दीजिए कि हम आपके हृदय के स्पंदन की अनुभूति कर आपको प्रमाण दे सकें!"
"हमारा हृदय...स्पंदन...प्रमाण...बेसिरपैर की बात कर रहे हैं आप"
"विवाद नहीं सुंदरी अनुभव कीजिए"
.
"तुम चेतक के साथ दौड़ की स्पर्धा करने गयीं थी क्या?"
"क्यों माँ सा, आपने ये प्रश्न क्यों किया? हम तो चेतक की लगाम थामकर उड़ते चले आए"
"तुम्हारी बढ़ी हुई श्वांस को देखकर कहा. कहीं कुछ अघटित तो नहीं घटित हुआ?"
"कैसा अघटित माँ सा? वैसे भी जो होता है वो पूर्व निर्धारित ही होता है फिर उसे अघटित क्यों कहें?"
"राजकुमारी हम आपके बिखरे केशों को सुलझा दें. अगर न चाहें तो शृंगार न करवाईयेगा"
"नहीं गेंदा रहने दे. उलझनें तो जीवन में हैं, क्या-क्या सुलझायेगी"
"पहले केश फिर कुछ और…" इस पर दोनों मुस्करा दीं. राजकुमारी अपने शयनकक्ष के एक कोने में लगे आईने के सामने बैठ गयीं.
"नहीं मानती है तो आ जा बना दे केश" गेंदा अपने दोनों हाथों में चमेली का तेल लेकर राजकुमारी के केशों में लगाने लगी.
"राजकुमारी जी, एक बात पूछें?"
"हाँ बोलो गेंदा"
"उलझनें तो उनको होती हैं जो प्रेम में होते हैं"
"अच्छा तुझे तो बड़ा पता है"
"नहीं हमने देखा है न"
"क्या देखा है बोल"
"कुछ नहीं" कहकर गेंदा चुपचाप तेल लगाने लगी. राजकुमारी बहुत कुछ सोचने पर विवश हो गयीं.
.
"हम अपनी बहना को न देखें ऐसा कभी हुआ है क्या?"
"आज अभी हुआ न! जाइये हम आपसे बात नहीं करते"
"अच्छा...कितनी देर के लिए?" भाई सा ने बहना को अपने पास बिठाते हुए पूछा.
"हुँह"
"क्या? हमारे कारण ऐसा हुआ? फिर क्या हुआ?"
"फिर उसने एक जादूगर की सहायता से हमारे प्राण इस तोते में बंद कर दिए"
"और आपका शरीर?"
"हमारा शरीर उस जादूगर के पास है"
"आने वाली अमावस्या की रात वो जादूगर हमारे शरीर की बलि दे देगा"
"ऐसा मत कहिए राजकुमार. हम यह नहीं होने देंगे"
"क्या ही कर पाओगी तुम?"
"अभी तो अमावस्या की रात में पूरे १५ दिन हैं. बस आप हमारा साहस बने रहिए"
पहुँचते ही राजकुमारी ने यह क्या देख लिया उनके भाई सा व्यग्रता से इधर-उधर टहल रहे हैं.
"भाई सा क्या बात हुई भला, आप चिंतित से लग रहे?"
"लगता है हमारी बहना ने हमारे मन की सुन ली. तुमसे कुछ वार्तालाप करनी थी हमें"
"अब इसके लिए भी आपको इतना सोचना पड़ेगा अथवा किसी से अनुमति लेनी होगी?"
"नहीं हमारा वो तात्पर्य नहीं" इतना कहते ही राजकुमार जैसे ही पीछे मुड़े उनकी हँसी छूट गयी.
"क्या हुआ भाई सा? हँसी क्यों आ गयी?"
"दर्पण...दर्पण वाली राजकुमारी"
"आ वो…" अचानक राजकुमारी को याद आया तोते को अंदर करने में वो अपना दर्पण उतारना ही भूल गयीं.
"याद आया, हमने ही कहा था अपनी सूरत देखने के लिए दर्पण साथ में रखा करो. तुमने तो गले में ही लटका लिया"
दोनों ही हँस पड़े.
"अच्छा भाई सा अपनी व्यग्रता का कारण तो बताइये हमें"




