Tuesday, 30 January 2018

इस वर्तमान का भविष्य क्या???


देखने में सुडौल, खूबसूरत शरीर के मालिक पेशे से इंजीनयर मौलिक चंद्रा अपने हर काम में निपुण हैं। जितने देखने में सरल मन कहीं उससे अधिक मधुर। एक-एक कर सारी खूबियाँ उनमें समायी थी सिवाय मन की कमजोरी के। सभी के लिए इतना अच्छा सोचते कि स्वयं का ध्यान रखने का मौका नहीं मिलता। ऐसे में अगर कोई कुछ कह देता वो उसी के जैसा सोचने लगते। जब लोगों को ये पता चलता लोग हर तरह से उनका उपयोग करते। उनसे अपने मन की करा लेते। 
उनके एक बहुत अच्छे मित्र को कुछ मजे लेने की सूझी। कुछ पुरानी खुन्नस भी निकालनी थी उन्हें। शाम होते ही ऑफिस आ गए, "यार मौलिक अपने ग्रुप के सभी लोगों की बैंड बज गयी अब तू ही बचा है..."
"सही बोल रहा तू, मुझे पता तुम सबसे मेरी खुशी नहीं देखी जाती।" मौलिक बात काटते हुए बोला।
"मैं ये सब नहीं जानता। तू तो पार्टी से बचना चाह रहा। अब जल्दी से फाइनल कर।" मोहित चहकते हुए बोला।
"नहीं यार वो बात नहीं, मुझपर बहुत जिम्मेवारियां हैं। अभी कुछ वक्त और रुकना चाहता हूँ।"
"अरे पागल है क्या, वो आ जायेगी न तो दोनों मिलकर करना फिर सब ठीक हो जायेगा।"
"तू नहीं समझता आजकल अच्छी लड़की मिलती कहाँ हैं।"
"उसकी टेंशन मत ले तू मैं तो लड़कियों की लाइन लगा दूँगा। मुझे पता है तू इतना डिस्टर्ब क्यों है। देख यार हर लड़की एक जैसी नहीं होती और मैं तो कहता हूँ तूने जल्दबाजी भी बहुत कर दी थी। तूने लिव-इन का ऑफर देकर ही गलती की। तुझे निचोड़कर चली गयी। जाने ही देना था तो ऐसे न जाने देता। साली को देना था कान के नीचे एक। उसकी औकात बताकर भेजता कि तू भी क्या था। अब यहीं अपनी भाभी की फ्रेंड को ही ले। इतनी खूबसूरत है कितने ही लड़कों ने प्रपोज किया पर मजाल है जो किसी से बात कर ले। रिश्ता वहीं करेगी जहाँ घरवालों की मर्जी होगी।"
"हाँ सही कह रहे हो भाई। लड़की को संस्कारी ही होना चाहिए.... अच्छा मैं निकलता हूँ जाना है कहीं। फिर मिलते हैं।"
"हाँ, मैं भी घर जा रहा हूँ।"
मोहित और मौलिक दोनों ही अलग रास्तों पर निकले थे पर दोनों की सोच एक ही थी। मौलिक जहाँ अपने अतीत को भुलाकर नयी शुरुआत करना चाहता था वहीं मोहित दिव्या से उसका रिश्ता कराकर अपने अतीत को जीना चाहता था। 
मोहित के घर पहुँचते ही उसकी पत्नी ने शादी में जाने की बात की। तैयार होते हुए उसने अपनी पत्नी को मौलिक के बारे में बताया कि वो दिव्या और मौलिक का रिश्ता कराना चाहता है। 
"अरे ये क्या कह रहे हो। इतने शालीन, सभ्य मौलिक भाई और वो आवारा लड़की जिसने तुम्हें तक नहीं छोड़ा।"
"हाँ तो मैं कौन सा धर्म का ठेकेदार हूँ। वैसे भी मौलिक को तुम जानती ही कितना हो।"
"फिर भी कम से कम उन्हें इस तरह तो न फँसाओ।"
मोहित ने मौलिक को फोन कर शादी में जाने की बात याद करायी। मौलिक भी झट से तैयार हो गया।
"अब मौलिक को जबरदस्ती क्यों बुलाया? देखो ये गलत कर रहे हो तुम।"
"बस मेरी मर्जी।"
शादी के हाल में मौलिक, मोहित और उसकी पत्नी से मिला। कुछ औपचारिक बातें हुईं। तभी सामने से दिव्या आ गयी।
"इनसे मिलो मौलिक ये हैं हमारे यहाँ की फैशन डिज़ाइनर दिव्या,,, और दिव्या ये हैं इंजीनियर साहब मौलिक।" कहते हुए मोहित ने परिचय कराया।
कुछ देर तक औपचारिक बातें होती रहीं फिर कुछ खिलाने के बहाने दिव्या मौलिक को बाहर तक ले आयी। एकांत पड़ी कुर्सियों पर दोनों बैठ गए। मोहित अपनी पत्नी के गुस्से को नजरअंदाज करता रहा। 
ये एक छोटी सी मुलाक़ात एक सिलसिले का सबक बन गयी। मोहित तो जैसे आमादा था सब कुछ अभी हो जाये। मौलिक प्यार के पन्ने पलटने में व्यस्त था। वही दिव्या इन सब बातों से बेखबर जीवन के मजे ले रही थी। दिव्या की स्वच्छंदता सबसे बड़ी रुकावट थी। मौलिक दिव्या के इस व्यवहार को उसकी जहीनता समझ रहा था। 
"मौलिक इतने स्लो ट्रैक पे क्यों चल रहा?"
"यू मीन?"
"नथिंग"
"कहाँ आज इतनी सुबह..."
"अरे मैं तो नितिन के लिए आया था। एक भाईसाहब आगे वाले मोड़ पर हैं, उनके पास जाना है। तू यहाँ क्या कर रहा चल न मेरे साथ।"
"अरे नहीं, ऑफिस में बहुत काम है।"
"कोई काम नहीं। वापिस आकर कर लेना।"
मोहित मौलिक को जबरदस्ती अपने साथ ले गया। 
दोनों एक तांत्रिक के दरवाजे पर थे। नॉक करते ही उन्हें अंदर बुलाकर बिठाया गया। मौलिक को महसूस हुआ कि मोहित का कोई इम्पोर्टेन्ट काम नहीं था बस बहाने से ले आया। मोहित ने बातों ही बातों में मौलिक की पूरी कहानी सुना डाली। 
"परेशान क्यों होता है तू, तेरी परेशानियां तो चुटकी बजाते जाएंगी।" इतना कहकर उस तांत्रिक ने आंख बंद कर मन्त्र पढ़ने शुरू कर दिए।
"घोर अनर्थ तुझपर बहुत बड़ी विपदा आने वाली है। सही समय पर आ गया तू। ये ले ताबीज पहन  ।" मौलिक की ओर ताबीज बढ़ाते हुए बोला।
"देख मैं तुझसे इसके बदले कुछ भी नहीं ले रहा।" 
"अरे ऐसा कैसे बाबा। ये लीजिये, अब हम आज्ञा चाहते हैं।" मोहित ने बाबा को मुद्रा देकर अनुमति ली। अब मौलिक के दिमाग ने सोचना बंद कर दिया था। उसकी दुनिया दिव्या, मोहित और तांत्रिक तक सिमट कर रह गयी थी। तांत्रिक उसे सफलताओं के सब्ज-बाग दिख रहा था। दिव्या और मोहित का आहार तो वो पहले से ही बना था। जो शख्स इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद ऐसी हरकत करे तो समाज में वैल्यू कम होना स्वाभाविक था यहाँ तक कि उसके जूनियर भी दूर होने लगे थे।
एक शाम मौलिक उचाट मन से ऑफिस में बैठा हुआ था तभी सामने से दिव्या को आता देख खुश हो गया। 
"मौलिक, ये मैं क्या सुन रही हूँ तुम्हारे बारे में, तुम इतने गिरे हुए इंसान हो। मुझे पाने के लिए उस ढोंगी बाबा का सहारा ले रहे। बस यही संस्कार हैं और तुम्हारी शिक्षा।"
"ये किसने कह दिया तुमसे। तुम्हें गलतफहमी हुई है। मैं किसी बाबा को नहीं जानता।"
"झूठ मत बोलो। मैं उस बाबा का स्टिंग ऑपरेशन करके आ रही हूं।" इतना कहकर एक जोरदार आवाज के साथ पूरे ऑफिस में सन्नाटा पसर गया। मौलिक के गाल पर दिव्या की उंगलियों के निशान छप गए थे। तभी तड़-तड़ की आवाज के साथ आफिस में अंधेरा हो गया। कहीं शार्ट-सर्किट हुआ था। लोगों में अफरा-तफरी मच गई। दिव्या जा चुकी थी। वो बूढ़ा तांत्रिक मौलिक की गिरेबान पकड़कर अपनी आखिरी किश्त मांग रहा था। मौलिक ईश्वर को याद कर अपनी उन अच्छाइयों का वास्ता दे रहा था जो उसने जीवन में कभी की हों। 
तभी मौलिक के कानों में फोन की घण्टी बजी। 
"ज़िन्दगी, तुमने मुझे जगा दिया। थैंक यू सो मच। शायद मौलिक ने बहुत अच्छाइयां की अपने जीवन में कि ये एक स्वप्न ही था इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

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Monday, 29 January 2018

मैं रूठा नहीं .... छूट गया हूँ।

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हाँ, मैं छोड़ आया हूँ

किसी को तड़पते हुए अपने पीछे
स्नेह की हाँड़ी पर
संबंधों की गर्माहट
जो मेरे दर्द को सींचती थी,
समय-असमय 
मेरी जरूरतों के वक़्त 
वो बेहिसाब जीती थी मेरे लिए
मैं उसपर खर्च हुए पलों का हिसाब 
रखने लगा हूँ आजकल,
मैं उसकी साँसे कम कर रहा हूँ
छीन कर उसकी मुस्कराहटों के पल,
वो दुनिया से लड़ जाती थी मेरे लिए
मैं चुपकी लगा आया उसके होठों पर
कि मुझसे मुबाहिसे न करे,
मुझे गलतियां करने से न रोके;
मैं जीना चाहता हूँ
खुलकर हंसना चाहता हूँ
मजे लेना चाहता हूँ ज़िन्दगी के
वो हर बार टोकती है
मेरी विफलताओं का हवाला देकर
मैं आगे बढ़ता रहता था
और वो हर जतन करती थी
कि मुझे डूबने से रोक ले
मैं उसे मृतप्राय छोड़कर बढ़ जाता था
मैं डूबता
और वो तिनका बनकर फिर सहारा देती
मेरे सारे गुनाह, अपशब्दों को
भुला दिया करती,
गले से लगाती मुझे
बहुत प्यार करती
मेरा दम घुटता उसके निःस्वार्थ प्रेम में
मैं उससे हर बात जुदा रखता
उसे बहुत फिक्र होती थी
कि कोई बुरा न कह सके मुझे
मैं सबकी सुनता
पर उसकी सुनता ही कब था,
अब भी नहीं सुनूंगा मैं उसकी फिक्र
नहीं चाहता अपनी बातों में
मैं उसका जिक्र:
तभी तो 
दफन कर आया उसे
उसी मिट्टी में
जिसकी वो बनी थी,
गला घोंटकर आया हूँ
उस हसरत का
जो मुझे सुनने के लिए थी
गर्म सलाखें आंखों में उतार दीं
अब न आंखें रहेंगी
न मुझे देखने का सपना
साथ लाया हूँ 
राख उस चिता की,
रोज़ उस राख के कुछ कण
अपने पांवों में लगाऊंगा
कि ये सफलता की ओर ही बढ़े,
उसकी निःस्वार्थ चाहत
जो मुझे सिर्फ और सिर्फ 
अर्श पर देखने की थी
इस टोटके में साथ रहेगी।

Friday, 26 January 2018

ख़ुदा हाफ़िज़

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ज़िन्दगी चाहती है एक बदलाव मुक़म्मल
गर खो जायें तो अब इंतज़ार मत करना।



रेत के घरौंदों सी ढह गयीं ख्वाहिशों की इमारतें
दर्द मुक़द्दस तू कहीं खुद में समा ले मुझको।



तू गया औ जीने का सामान भी ले गया
रुक ये कलम ये सियाही तो मुझे दे दे।

Tuesday, 23 January 2018

मैंने लिखना छोड़ दिया है

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तुम्हारी मुस्कराहटों के नाम 
वो जो रक्तिम अक्षर थे 
आखिरी थे मेरी कलम से
तोड़ दिया अग्र भाग
कि ये विवश हो जाये,
अब नहीं होगी न, वो स्याही
जो तुम 
अपनी देह की ऊष्मा पिघलाकर
दिया करती थीं,
तुम्हारी झनकार लय थी
मेरे गीत का
सुलझाते हुए तुम्हारे अलकों को
शब्द बिखरते थे हर पन्ने पर
जब झुकाती थीं तुम पलकें
माधुर्य सिमट आता था कविता में;
न भी होती थीं तो
मुझमें छुपी होती थीं
तुम तो चुरा ले गईं खुद को मुझसे
अब कहाँ से लाऊँ वो रस
मैंने लिखना छोड़ दिया है
क्योंकि
रूठे हुए मीत को मनाऊँ कैसे
बिन मीत गीतों में रस लाऊँ कैसे

Monday, 22 January 2018

मैं मृत्यु हूँ...

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कोई भी मुझे जीत नहीं सकता 
मैं अविजित हूँ,
गांडीव, सुदर्शन, ब्रह्मास्त्र हो या
ए के-47...56
इनकी गांधारी हूँ मैं,
समता-ममता, गरिमा-उपमा
मद, मोह, लोभ-लालच,
ईर्ष्या, तृष्णा, दया,
शांति...आदि 
सभी उपमाओं से परे हूँ;
मेरा वास हर जीवन में है
जन्म के समय से पहले ही
मेरा निर्धारण हो जाता है
बूढ़ा, बच्चा और जवान 
मैं कुछ भी नहीं देखती
क्योंकि मैं निर्लज्ज हूँ;
गरीबी-अमीरी कुछ भी नहीं है
मेरे लिए,
दिन क्या रात क्या,
झोपड़ी, महल और भवन
इनके अंदर साँसे लेता जीवन
मेरी दस्तक से ओढ़ता है कफन
इमारतें हो जाती हैं बियाबान
मंजिल है हर किसी की
बस शमशान;

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..........
अगर नहीं किया मेरा वरण
तो कैसे समझोगे प्रकृति का नियम
बिना पतझड़
कैसे होगा बसंत का आगमन,
पार्थ को रणक्षेत्र में
मिला है यही ज्ञान
मौत से निष्ठुर बनो
न हो संवेदनाओं का घमासान
गर डरो तो बस इतना कि 
मैं आऊँ तो मुस्करा कर मिलना
अभी और जीना है
अच्छे कर्म करने को
ये पश्चाताप मन में न रखना,
मेरा आना अवश्यम्भावी है
मैं कोई अवसर भी नहीं देती,
दबे पाँव, बिन बुलाए
आ ही जाऊंगी
करना ही होगा मेरा वरण
फिर क्यों नहीं सुधारते ये जीवन
पूर्णता तो कभी नहीं आती
अंतिम इच्छा हर व्यक्ति की
धरी ही रह जाती है,
पूरी करते जाओ
अंतिम से पहले की हर इच्छाएं,
ध्यान रखो 
औरों की भी अपेक्षाएं:
मैं तो आज तक
वो चेहरा ढूंढ रही हूँ
जिसके माथे पर
मेरे डर की सिलवटें न हों,
जिसके मन में
'कुछ पल और' जीने की
इच्छा न हो!

Sunday, 21 January 2018

माँ शारदे...

माँ शारदे!
स्नेह से तार दे
   मेरी कलम में वो
     रोशनाई तू दे कि जो
       मन की परिभाषा मैं कह दूं
     वो भावों का संगीत हो
    हो तेरी वीणा मधुर
   शब्द मेरे रचे हों
गीत तेरा अमर!

Friday, 19 January 2018

A letter to those who write ingrezi

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हमारे deer मित्रों
एक अनुभव से गुजरे हम
बीते दिनों,
फ़ेसबुक की timeline पर
अचानक एक फोटू आया
हार पहने हुए व्यक्ति
हमसे टकराया;
हमने आँखे बंद कर
दो मिनट तो नहीं
पूरे दो सेकण्ड का ध्यान लगाया
इस तसल्ली पे आँखे खोली
जब वो बोले अब मैं शान्ति पाया,
नीचे लिखे कमेंट बॉक्स को पढ़कर
सर चकराया
तब समझ आया
क्यों अब वो शांति पाया;
कमेंट बॉक्स में कुछ यूँ लिखा था
Rest in piece
क्या dye आत्मा को
शांति टुकड़ों में मिलेगी?
हे मित्रों
हिंदी बुरी नही है
अँग्रेजी आने से ज़्यादा जरूरी है
अच्छा इंसान होना
हो सुख बांटने को अपना
और ग़मों में पहचान होना,
भाषा से बड़ा भाव होता है
गर व्यक्त न कर सको खुद को सही
तो अपनेपन का अभाव होता है,
ये कविता तो बस हमारे
Deer मित्रों के लिए है,
दिल पे मत लेना जानी
हिंदी तो हमें भी नहीं आती
अंग्रेजी समझने को तरसते हैं।

Thursday, 18 January 2018

ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

बस इतनी सी ख्वाहिश थी मेरी
तुम सबकी खुशी में शामिल रहो
मग़र ए ज़िन्दगी!
तुम्हारी खुशी तो
मेरी मय्यत पर भी
मुकम्मल नहीं,
अब क्या करूँ इस रूह का
जो जनाज़े को तरसती है
सुबह कर दो मेरे ग़मों की
मेरी रूह को अफज़ा कर दो.

Morning wish


Sunday, 14 January 2018

.....जब पास नहीं हो तुम

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लिखना होता है जब बहुत प्रेम
तुम्हें लिख देती हूँ,
मन होता है ढ़ेरों बातें करने का
हजारहां खयाल बुन देती हूं;
शाम ढले जब भी
पक्षियों को देखती हूँ
व्याकुल से लौटते हैं
अपने घरौंदों की तरफ
मैं भी बाट जोहती हूँ तुम्हारी
कि कब आओ 
और मैं तुमपे न्योछावर करूँ
प्रेम की हर बून्द
मन के रीतने तक,
घूमती रहूँ तुम्हारे इर्द-गिर्द;
कभी चुन दो न मुझे
अपने अहसास की दीवार में,
तुम पलकें झपकाओ
और मैं बन्द हो जाऊँ
काली पुतलियों के घेरे में,
मेरे दर्द को पनाह मिल जाये
तुम्हारे होने में;
कब दोगे वो रात
जिसकी सुबह मायूस न हो,
क्या करूँ
ज़िन्दगी फ़क़त इतनी भी तो नहीं 
रोज़ सुबह होती है
कलेवा भी करती हूँ,
हर अहसास वाली गुनगुनी सुबह को
शाम के दर तक ले जाती हूँ
और अक्सर 
तुम्हारे न आने का बहाना
इतनी तसल्ली देकर जाता है
कि तुम तो मेरा सवेरा हो
रातें अपने हिस्से की
कोई और ले गया;
मैं मुस्कराती हूँ हर सुबह
तुम्हारे लिए 
कि तुम भी कहीं तो खुश होगे
किसी के साथ
मुझे ईर्ष्या होती है
हर उस शय से जिसे तुम्हारा साथ मिला
उस सूरज से, रोशनी से,
दिन से, सवेरे से, 
उन दीवारों से
जहाँ बैठकर तुम लम्हे बुनते हो,
तुम्हारा आकाश एकटक
तुम्हारा नूर ताकता है
मैंने तो उल्टी गिनती भी नहीं शुरू की
जब देख सकूँगी तुम्हें,
बस शब्दों का प्रक्षेपण होता है,
महसूस करती हूँ
तुम्हारी आवाज़ का स्पंदन
अगली आवाज़ मुखर होने तक;
फिर जब बोलते हो न
तो विराम नहीं अच्छा लगता,
प्रेम करती रहूँ तुम्हें
आखिरी साँस के थकने तक
अब आराम नहीं अच्छा लगता।

Saturday, 13 January 2018

What I'm


इसरो का सफ़र..


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104 सैटेलाइट एक साथ लांच करने का
इसरो का था पुराना रिकॉर्ड
श्रीहरिकोटा आंध्रा से
मिल गयी एक नयी सौगात:
अप्रैल दिवस 19 सन 1975
सोवियत संघ ने मदद का हाथ बढ़ाया
भारत ने पहला उपग्रह
कक्षा आर्यभट्ट में पहुंचाया;
1980 में रोहिणी सैटेलाइट के प्रक्षेपण का
हुआ सफल प्रयास
अपना पहला राकेट एसएलवी-3 भेजा
पूरी कर ली आस;
इसरो का लोहा दुनिया ने माना है
अब आगे की योजना भी बताना है,
सूर्य के नमन को आदित्य-1
2019 में जायेगा,
2020 में शुक्र और
2021-22 मंगलयान-2 विजय गाथा गायेगा:
मार्च का महीना दूसरे चन्द्र मिशन 
चन्द्रयान-2 को समर्पित है
विश्व की नज़र हमारी सस्ती तकनीक पर है
इसरो की नज़र हर महीने 
एक रॉकेट भेजने की नीति पर है।


भारत सहित 6 अन्य देशों के 31 उपग्रह प्रक्षेपित करने के लिए हमारे वैज्ञानिकों को बहुत-बहुत बधाई।

Wednesday, 10 January 2018

Leap year bounce


हिंदी को प्रेम से अपनाएं


हम हिंदी से शर्म लिहाज करें
ये पिछड़े होने की निशानी है
क्यों कहें स्वयं को अक्षम हम
खुद से ही भेद-भाव बेमानी हैं
नहीं गुलाम हैं दूजी भाषा के
हर बच्चे में अलख जगानी है
प्रधानमंत्री जी की शुभकामना
अब जन-जन तक पहुंचानी है
इस देश के वैश्विक उत्थान को
हम सब को हिंदी अपनानी है।

Tuesday, 9 January 2018

Yahi jivan hai...is jivan ka


अथ श्री चाय महात्म्य!


तुम्हारी याद भर से
मोह जाता है मन
एक छुवन भड़का जाती है
मन की अगन,
हर बूँद में
स्वाद लिए फिरती हो
आज भी महज़बीं हो
और बीते जमाने की
याद लिए फिरती हो,
घर हो या ऑफिस
जी चाहता है
होठों से लगी रहो,
महफ़िल हो कोई भी
तुम्हारे बिना
अधूरी सी लगती है,
वक़्त बदला
लोग भी बदल गए,
पर तुम नए कलेवर में
साथ-साथ चलती रहीं,
एक वो जमाना था
कि चूल्हे पर भगोने में
सुबह शाम चढ़ती थी
केतली की टोटी से
हौले-हौले गिलास में गिरती थी,
अब देखो न तुम्हारे स्वागत को
पैन और कप आते हैं,
डिस्पोजल को भी
कुल्हड़ कहाँ भाते हैं,
पर तुम तो मैदान में डटी हो
स्वाद कोई भी हो
नाम में वही हो;
बस मुझे ही नहीं
सभी को बहुत भाती हो
जब कहलाती हो
अदरक वाली चाय,
जुकाम हो तो तुलसी वाली,
खांसी भगाये कालीमिर्च वाली,
स्वाद में अच्छी
गुड़ और नमक वाली,
नींबू वाली चाय,
चाय कहेंगे कैसे इसे
ये तो औषधि है,
जो पिए वो गुण गाए
जिसे न भाए
वो पछताए,
चाय की बराबरी
कौन कर पाए.
अगर चाय खुशी की महफ़िल है
तो ग़म में भी जान है,
भले ही उठ रहे हो जनाजे
चाय की तो
ज़िन्दगी देने में पहचान है,
कुछ सुबह शाम पीते हैं,
कुछ पीकर शाम करते हैं,
वो और होंगे
जो गिनतियों में पीते हैं
चाय के दीवाने तो
आसमान के तारों की तरह
हर गिनती नाकाम करते हैं,
ठंडी-गरम, घूंट-घूंट, पूरा कप
क्या फर्क पड़ता है,
जिनकी रगों में खून नहीं
चाय का खुमार बहता है,
ये तो शुरुआत है
चाय पर दो शब्द
इस महात्म्य का वर्णन
अभी आगे बढ़ाना है,
आपके स्नेह की आंच पर
इसे खौलाते जाना है.

Saturday, 6 January 2018

एक दिन...जब तुम खो दोगे मुझे

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एक दिन यक़ीनन तुम मुझे खो दोगे
जैसे आज तुम्हें फिक्र नहीं
मेरे रूठने-मनाने से
मेरे रोकर बुलाने से
मेरे दूर हो जाने से
जब चली जाऊंगी हमेशा की खातिर
तुम ढूंढोगे मुझे ज़र्रा-ज़र्रा
चीखोगे मेरा नाम सन्नाटों में,
मुस्कराओगे सोचकर मेरा पागलपन
कि मैं होती तो क्या करती,
आज जब मैं हूँ हर उस जगह
जहाँ तुम चाहते हो
तो कैसे समझोगे मेरा न होना
और जब महसूसोगे
मैं नहीं बची रहूँगी
वापिस आने भर को भी
झलक में मिलूँगी न महक में
न ही बेबस पुकारों में,
मैं टुकड़ा-टुकड़ा जी रही हूँ आज
रत्ती-रत्ती मरने को,
एक कण सा भी चाहते हो मुझको
तो समा लो मेरा वजूद अपनी छाया में
मेरा दम घुट रहा है
बचा लो मुझे मर जाने से
मेरा दर्द बिखर जाने से
मैं गयी तो खो जाऊंगी
तुम शिकायत करोगे
तलाशोगे मेरी आवाज हर चेहरे में
और मैं सिमट जाऊंगी
चन्द अहसासों में सिमटे बस एक नाम में
एक थी ...
तब यकीनन खो चुके होगे मुझे।

Wednesday, 3 January 2018

प्रेम: कल्पनीय अमरबेल...प्रथम अंक



हमारे वैवाहिक रिश्ते को अभी चन्द महीने हुए थे। अभिलाषाएं पालने में ही थी पर आवश्यकताओं ने पाँव पसारने शुरू कर दिए थे।  वो बेटे न होकर पति जो बन गए थे और मैं भी बेटी कहाँ रह गयी थी। जो एक अच्छा सा सामंजस्य चला आ रहा था सात बरसों के बेनाम जीवन में, रिश्ते को नाम मिलते ही बचकाना सा लगने लगा। प्रेम को मंजिल तक लाने में जो सफर तय किया आज वो उम्र का कच्चापन लग रहा। जाने क्यों आज ऐसा लग रहा कि प्रेम एक अमरबेल है बस देखने में सुंदर। अगर स्थिरता न हो तो ये किसके परितः अपनी साँसे जियेगा। कल हम प्रेम में थे, लव-बर्डस की उपमा दी जाती थी पर आज मैं समय हूँ और ये पहिया......

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क्रमश:
मित्रों, अगर आपको मेरे बारे में आगे जानने की इच्छा है तो कृपया comment box में लिखें।
कहानी जारी रहेगी।

Monday, 1 January 2018

समय तेरा जवाब क्या.....!

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आते हुए उसने खटकाया भी नहीं
जैसे दबे पाँव मगर
निडर चला आया हो कोई,
एक सवाल था उसकी आँखों में
कि मैं उसके आने के जश्न में
शामिल क्यों नहीं औरों की तरह,
कैसे बताऊँ उसे 
जब स्वागत और प्रतिकार में
कोई फर्क ही नहीं
कौन रुकने वाला है मेरे रोकने से
न घड़ी की सुइयाँ, 
न ही समय में लिप्त दर्द,
इस रूह कँपाती सर्दी में
नए वर्ष का जश्न
एक सुखन दे गया,
आज वो भी खुले आसमान के नीचे
बिना कपड़ों के आवारा थिरक रहे हैं,
जिनकी तिजोरियाँ बोझ से दरक रही हैं,
कल सुबह यहीं से बच्चे
बीनकर ले जाएंगे
खाली ब्रांडेड बोतलें;
वो आ गया है अपना समय पूरा करने
उसे भी तो देखना है
कितनी हाँड़ी बिना भात की हैं,
कितने नन्हे भूखे सोये,
कितनी माँओ ने पानी डालकर
दाल दोगुनी कर दी,
कितने लाल रेस्टोरेंट के नाम पर
पानी में दाल का बिल भरते हैं:
उसे अपना चक्र पूरा करके
चले जाना है,
क्या फर्क पड़ता उसे विषमताओं से,
उसमें संवेदना की बूंद तक नहीं
वो तो है हर रोज़
कैलेंडर पर बदलती एक नयी तारीख।