Thursday, 28 September 2017

अब मोमोज़ हो गई है।



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पहले रिश्तों को
धुला, सुखाया और फिर
तला जाता था,
अब सेंकने का भी
समय नहीं मिलता है;
तब जो
कुरमुरे से हुआ करते थे,
अब विद्युत यन्त्र में
मरे से पड़े हैं:
वो वक़्त नहीं रहा
जब जायका था
अब तो दिखावे की तस्करी है,
जिसका जितना महंगा चूल्हा
उसकी उतनी दाल गली है:
तब स्वादानुसार थे
अब सेहतानुसार हैं,
तबियत की कहाँ रही थाली
आँखों की सोज हो गयी है;
क्या खाया गिनते-गिनते
टेंशन की डबल डोज़ हो गयी है;
वक़्त की आंच पर
मद्धिम-मद्धिम सी तली
पहले समोसा सी थी ज़िंदगी
और अब
मोमोज़ हो गई है।

Tuesday, 26 September 2017

एक रिश्ते की मौत


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रोज़ की तरह उस दिन भी मैं रात लगभग 10 बजे घर वापसी कर रहा था। रास्ते सुनसान थे पर लगातार हो रही भयंकर बारिश ने मेरी गाड़ी की स्पीड बहुत कम कर दी थी। मुझे रह-रह कर माँ का खयाल आ रहा था कि आज भी गरमागरम चाय के साथ उसकी प्यार भरी डाँट सुनूँगा...'कितनी बार कहा है शादी कर ले फिर टाइम पे हर काम होगा। अभी न तो तेरा आने का कोई वक़्त है न जाने का, इस दिन के लिए तुझे डॉक्टर थोड़ी बनाया था कि समाज सेवा के नाम पर अपनी मनमर्जी करता रहे।'
शहर से दूर क्लीनिक बनाने के बारे में सुनकर कितना गुस्साई थी कि इतनी दूर जंगल में नहीं भेजूँगी तुझे। क्या और सारे डॉक्टर मर गए हैं जो तू जाएगा...। किसी तरह से मनाया था मैंने उन्हें, कितने ही दिन बात नहीं की थी मुझसे। मैं खयालों में डूबा हुआ ही था कि अचानक गाड़ी के सामने एक बच्ची आ गयी। इमरजेंसी ब्रेक लगाया, उतर कर नीचे तक गया।
'कहाँ घूम रही इतनी रात अकेले, जाने कैसे पैरेंट्स हैं जो रोड पर छोड़ देते हैं, कहाँ जाना है तुम्हें?' मेरे इतना पूछते ही वो चीख-चीख कर रोने लगी और मेरे पैरों से लिपट गयी।
'अजीब मुसीबत है...' मैनें उसे पैरो से अलग करते हुए कहा। फिर महसूस किया कि बच्ची न तो बोल सकती है न ही सुन सकती है। आस-पास नज़र दौड़ाते वीराने के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था। मैं अजीब कशमकश में था। कोई और रास्ता न दिखते हुए उसे गाड़ी में बिठाया। उस दिन रोज़ से भी ज़्यादा देर होने पर माँ का जायज़ मगर अति क्रोध देखकर मैंने सरेंडर करना ही ठीक समझा। फिर उस बच्ची को देखते ही माँ एक साथ हज़ारों सवाल कर बैठी पर मैं चुप ही रहा क्योंकि जवाब तो मेरे पास भी नहीं थे सिवाय इसके कि मुझे कब और कैसे मिली। ख़ैर सारी बात जानने के बाद हम लोगों ने ये निश्चय किया कि सुबह होते ही पुलिस स्टेशन छोड़ आएंगे। माँ ने उस बच्ची को पहले तो नहलाया फिर खूब खिलाया पिलाया। बच्ची भी ऐसे खा रही थी जैसे हफ्तों से भरपेट न खाया हो। मैंने देखा माँ के साथ वो कुछ ज़्यादा ही सामान्य लग रही थी। बिस्तर पर लेटते ही सो गई।
सुबह होते ही मैं उसे लेकर थाने पहुंचा। वहाँ किसी बच्ची की गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं दर्ज थी। वो बोले शहर से थोड़ी दूर पर एक मलिन बस्ती है शायद ये वहाँ की हो। आप इसे यहाँ बिठा दीजिये हम कोशिश करते हैं इसके घर पहुंचाने की नहीं तो बाल-गृह भेज देंगे। आप जा सकते हैं।
मैं गेट तक आया ही था कि मेरी आत्मा कचोटने लगी, इतनी छोटी बच्ची न बोल सकती है न सुन सकती है इन लोगों का रवैया इतना ख़राब है। जाने कब तक ये कुछ करें। इतना खयाल आते ही मैं उल्टे पाँव लौट गया।
'देखिए इंस्पेक्टर साहब, मैं इस बच्ची को तब तक घर ले जाना चाहता हूँ जब तक आप कोई अरेंजमेन्ट न कर लें।'
'जी, बिल्कुल।' इंस्पेक्टर का जवाब सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे वो इसी बात की प्रतीक्षा कर रहा था। फिर घर आकर मैंने माँ को सारी बात बताई, वो भी मेरी बात से पूरी तरह सहमत थीं।
हम लोग उसके लिए कुछ कपड़े और भी जरूरी सामान लेकर आए। मुझे ऐसा लगने लगा एक हफ्ते के अंतराल में बच्ची हम लोगों के साथ कम्फ़र्टेबल हो गयी है। वो दिन भर माँ की उँगली पकड़कर घूमती रहती।इस दौरान मैं रोज़ पुलिस स्टेशन जाता पर महज औपचारिकता पूरी करने। इस घर में मैं और मेरी माँ की वीरानियाँ बांटने वाला एक खिलौना आ गया था। उसकी मूक सी पर चपल हँसी पूरे घर में गूँजती। कभी-कभी मैं ये महसूस करता जैसे उसका कोई ऐसा रिश्ता ही नहीं जिसे वो मिस करती। फिर तो उसे कभी कोई ढूँढने ही नहीं आएगा। ये भी ठीक है। बिना नाम का एक रिश्ता था उससे पर उस रिश्ते को एक नाम तो देना ही था। प्यार से उसे जोई बुलाते लगे।  एक अलग तरह का रिश्ता बन गया था उससे। यही लगता था उसकी खिलखिलाहट से ये घर भरा रहे। हम लोगों ने सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया था।
हर दिन के जैसी वो भी एक सुबह थी। मैं ब्रेकफास्ट कर रहा था तभी माँ ने बताया कि जोई को बहुत तेज़ बुखार है। मैंने देखा हाई ग्रेड फीवर था। फीवर कम करने की दवाई देकर क्लिनिक चला गया। वहाँ मन नहीं लगा तो कुछ जल्दी ही घर आ गया। उसे बुख़ार कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। मैंने शाम को ही होस्पिटलाइज़ कराया। मैं और माँ उसकी तीमारदारी में लगे रहे। बुखार और बढ़ता देख डॉ ने कुछ टेस्ट कराए। अगले दिन टेस्ट की रिपोर्ट हाथ में आते ही होश उड़ गए। वो नन्हीं सी मासूम बच्ची एच आई वी पॉजिटिव थी। हम लोगों के चेहरे लटक गये थे। उस मासूम सी बच्ची की आंखों में कई सवाल उमड़ रहे थे मग़र जवाब कोई नहीं था। मैं बार-बार ईश्वर से यही सवाल कर रहा था कि जब इतनी जल्दी छीनना था उसे तो हमसे मिलाया ही क्यों? माँ भी अलग परेशान थी। किसी की हिम्मत नही हो रही थी कि उस बच्ची को तसल्ली देता। क्या क़ुसूर था उसका जो उसे इतनी बड़ी सजा मिल रही।
उसे दवाइयां देना भी एक औपचारिकता पूरी करना रह गया था। फिर भी हम कर रहे थे, उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश कर रहे थे। अंततः वो समय भी आ गया। दस दिन के एक रिश्ते की मौत हो गयी। नियति के समक्ष सारे समीकरण बौने हो गए थे। रिश्ते के गणित से निकलकर मैं पुनः जीवन की तारकोल वाली सड़क पर आ गया था एक मुसाफ़िर की तरह।

Sunday, 24 September 2017

माँ हाईटेक हो गयी है

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मॉँ अब मुंडेरों पर राह नहीं तकती,
मौसम की तरह बदल सी गयी है माँ,
बहुत गर्म या बहुत ठंडी नहीं होती
मॉडरेट सी है
कोशिश करती है मेरे साथ
कदम से कदम मिलाने की.
पहले अक्सर कहा करती थी
फेसबुक, व्हाट्स एप ने
तेरी आँखों के काले घेरे बढ़ा दिए,
हर वक़्त चैटियाता रहता है.
एक पहरे का जाल बुन दिया
माँ ने मेरे चारों ओर.
फिर अचानक से लगा
जैसे माँ इग्नोर करने लगी है सब कुछ
शिकायतें भी बंद कर दीं
सोने लगी वो रातों में मुझसे अलग
जैसे मेरे बिना रह लेगी,
मुझे असहज सा लग रहा था
पर समय का बहाव सहज करता गया,
मैंने एक दिन माँ को
टूटे चश्मे के शीशे को सम्हालते देखा
जैसे इसके बगैर रह न पायेगी,
मोबाइल पर चलती मेरी उंगलियां
वो बड़े गौर से देखती,
एक दिन मेरे पैरों के नीचे से
जमीन निकल गयी,
ये जानकर कि
मेरी आँखों के काले घेरे बढ़ाने वाली,
बात-बात पर हिदायतें देने वाली,
मेरा ख्याल रखने वाली,
मेरी सुबह की नमी, 
रातों की हमनवां,
वो क्यूट सी गर्ल 
कोई और नहीं
मेरी माँ हैं.
मैंने उसे वक़्त देना बंद कर दिया
तो क्या हुआ
उसे तो आज भी आता है
मेरे करीब रहने का हुनर
एक दोस्त की तरह.
अब माँ ने खाने में घी की मात्रा बढ़ा दी
और हलवे में बादाम काजू,
जगने पर रातों को वो किट-किट नहीं करती
माँ, हाईटेक हो गयी है।

Friday, 22 September 2017

हमारे टोटके


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हार गए तुमसे प्यार जताकर,
तुम दूर जाते हो
और मुस्कराते हो,
तुम्हें पता ही है न
हम तुम्हारे बस तुम्हारे हैं,
तभी तो तुमसे हारे हैं;
सुनो, आज हम मजार वाले
फकीर बाबा के पास गए थे,
उन्होंने सुबह और रात वाली पुड़िया दी,
हमें ढाँढस बंधाते हुए बोले,
'थोड़ा-बहुत कै आये तो चिंता मत करना,
डॉ को मत दिखाना'
हमने वो पुड़िया खोलकर
लोबान में सुलगा दी,
'ऐसी शय का हम क्या करेंगे
जो उन्हीं को कै दिला दे?'
फिर एक ताबीज देते हुए बोले,
'ये अचूक है, हाँ उलझन न होने देना':
हमने वो ताबीज बिल्ली के गले डाल दी
अरे उलझे मेरा दुश्मन
तुम तो
हमें हमारे दर्द से भी ज़्यादा प्यारे हो,
हमने भी कह दिया
बिना साइड इफ़ेक्ट वाला
कोई अचूक सा नुस्ख़ा हो तो बताएं,
वो असमंजस में अंदर चले गए,
मुस्कराते हुए आकर एक चिट थमा दी,
'ये शाम तक अपने पर्स में रखो,
गोधूलि में पढ़कर फेंक देना।'
हमने यही किया
सुन रहे हो न पिया...
उस चिट पर बड़ा खूबसूरत लिखा था..
"नकेल बनकर मत रहो
तुम यौवना हो उनके मन की
सब कुछ तो तुम्हारा है
प्यार में दूरी भी जरूरी है,
एक लगाम हो,
ऐसी भी क्या मजबूरी है,
तुम तन की दासी पर
मन की स्वामिनी हो,
ये अमिट सौगात का सौदा है
नहीं कोई दूरी है"
पिया, हमारा मन भी कभी-कभी
अधकचरा सा हो जाता है,
तुम्हारा सम्मोहन
हमारा नींद-चैन, भूख-प्यास जो ले गया
तुम्हारे आस-पास होने के
अहसास का जंतर-मंतर पहनाकर।

Monday, 18 September 2017

मुक्ति

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हर कविता में शब्द तुम्ही हो
गीतों में लय है गर तुम हो
दिन तुम्हारे नाम से होता है
शाम तुम्हारी यादों के साथ ढलती है,
तुम्हारे सुख-दुःख से मौसम बदलता है,
बारिश हो या तेज धूप चमके
मेरे मन का इन्द्रधनुष
तुम्हे देखकर खिलता है,
तुम जाड़ों की गुनगुनी धूप हो,
गर्मियों की भीनी हवा हो,
हवा में सुगंध हो,
सुगंध में अनुभव हो,
अनुभव में ऊर्जा हो,
मेरा तम भी तुम्हीं हो,
मन की उजास भी तुम हो,
मैं धरा हूँ,
मेरा आकाश भी तुम हो,
मन के नील-गगन में
तुम्हीं तो सहारा देते हो
जब मैं फैलाती हूँ
विश्वास से भी मजबूत डैने,
आसरा होता है तुम्हारा,
जैसे मेरा मोह, मेरा अर्पण हो,
जीवन में तर्पण हो,
अभिशप्त हूँ मैं
तुम्हारे पास नहीं आ सकती,
तुम्हे स्पर्श नहीं कर सकती,
तुम्हे अपना नहीं बना सकती,
अपनी संवेदनाओ से
तुम्हारा दर्द नहीं सहला सकती,
मैं आती थी हर रोज़
गहरी रात में
सन्नाटे के साये से लिपटकर
घंटों बैठी रहती थी तुम्हारे सिरहाने
सहलाती थी तुम्हारा माथा
अपनी अधखुली पलकों से
अनुभव करती थी
तुम्हारे देह की ऊष्मा,
करवट बदलते थे तुम
सही करती थी चादर की सिलवटें,
कभी छू न पाई तुमको
न जी भरके देख ही पाई,
हर रात ढल जाती थी,
दिन सौतन की तरह
हमारे बीच आ जाता था
अब नहीं होता आना-जाना
आत्मा तो अब भी हर पल तुम्हारी है
बस इस देह से मुक्ति मिल जाए.

Sunday, 17 September 2017

तुम्हारी सैलरी

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सुनो, जो तुम अपने मुस्कान वाली सैलरी
दिया करते थे न हर रोज़ हमको
वो बिना बताए ही क्यों बन्द कर दी?
कुछ कहें तो अगले महीने का वादा,
उस पर भी ऐसी अदा से कहते हो
कि हम सच्ची
अगले महीने की बाट जोहने लग जाते हैं;
क्या तुम भी
सरकारी दफ़्तर के बाबू की तरह
झूठा दिलासा देकर टरकाते हो,
अब आकर बता ही दो
कब आएगा ये 'अगला महीना'
सूखे सावन में
ठिठुरते भादों में
या फिर अमावस के चाँद में?
क्या फर्क पड़ता है हमें
तुम्हारी जेब गर्म हो या नर्म
बस अपने अहसासों को जवां रखो,
तुम्हारे माथे पर शिकन
डरावनी लगती है हमे,
हम पूस की रातों में बारिश का पानी
ऊपर न टपकने देंगें
इन हथेलियों की छाँव रखेंगे तुम पर,
बस बिना रस्मों-कसमों के
इस अधूरे मगर अटूट बन्धन को
अपने संवेदनाओं के अहसास से सींचते रहना,
हमें छुपा लेना अपने अंदर कहीं
तिनका-तिनका न बिखरने देना,
हमारे स्नेह के कोटर में नहीं ठहरोगे
तब भी हम तो सर्वस्व तुम्हारे हैं
अपनी आंखों के प्रेम से
पिला दो पूर्णता का अमृत।

Saturday, 16 September 2017

मित्र, बस तुम ही तो थे!


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जब तपती दोपहरी में
रेत पर नंगे पाँव चल रही थी मैं,
ठंडी हवा के झोंके के मानिंद,
हौले से आये और
अहसास बनकर ठहर गए पास मेरे
मित्र, तुम ही तो थे!
तुम्हीं तो महसूसते हो मेरी ठिठुरता
दे जाते हो सर्द रातों में
अपना नर्म, गुलाबी अहसास,
तुम्हारे शब्द कड़कते हैं रातों में
और अहसासों की रजाई दे जाते मुझे
मित्र, तुम ही तो थे!
तुम्हारे स्नेह की चितवन
बस मुझपे ही ठहर जाती है,
कड़कती बारिशों में तुम अपनी
छतरी नई मुझपे लगा गए
तुमपे बरसता रहा मौसम जार-जार
मित्र, तुम ही तो थे!
कल्पनाओं से पगी है ये दुनिया
किंतु तुम्हारा होना यथार्थ है,
मेरे होने में तो बस मैं होती हूँ,
तुम हो तो हम है,
थी टूटी शाख पर नाउम्मीदी की मानिंद
तरु नया बना गए
मित्र, तुम ही तो थे!

मुझे स्त्री ही बने रहने दो!

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स्त्री हूँ मैं
और जीना चाहती हूँ
अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के साथ;
क्यों करूँ मैं बराबरी पुरुष की,
किस मायने में वो श्रेष्ट
और मैं तुच्छ!
वो वो है
तो मैं भी मैं हूँ,
ये मेरा अहम नहीं
मुझे मेरे जैसा
देखने की तीक्ष्णता है
स्वीकारते हो न,
मैं और तुम
ये दो पहिये हैं हम के;
अगर तुम्हारे बेरिंग घिस रहे जीवनपर्यंत
तो मेरे कौन सा
गुणवत्ता की कसौटी से परे हैं,
इन्हें श्रेष्ठता के तराजू में
नहीं तोलना है मुझे,
ये तो ज़िन्दगी के कोल्हू में
पहले से मंझे हुए हैं;
एक द्वंद जो चल रहा मैं के भीतर
उसका समूल विनाश ही तो बनाएगा
हम का संतुलन:
मैं तुच्छ नहीं
वही तो है इस सृष्टि की सृजक
और तुम पालक हो इस सत्ता के
तभी तो हम से सन्तुलन है,
और अहम विनाश की
व्यापक स्वरूपता।

Thursday, 14 September 2017

स्त्री रक्त पिलाकर क्या रक्तबीज पालती है?

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स्त्री को मानव न समझकर
अबला समझने वाले ए सबल पुरुषार्थियों,
रे दम्भी समाज,
मत पिला इन कानों को तेजाब का अमृत,
अगर ये आंखें बेकाबू हो गयी
तो मेरे सीने का दर्द
तेरी ज़िंदगी पर
ज्वालामुखी की मानिंद बरसेगा,
कब तक बिठाएगा मुझे
परीक्षा की वेदी पर ये समाज,
जिस दिन कदम उठ गया
रौंद जाएगी
दुष्टता की ये सत्ता खुद-ब-खुद,
मूकदर्शक होकर देखोगे तमाशा,
उस दिन ये मत कहना कि 
मेरे अवचेतन मन को जगाया क्यों नहीं,
मौका है अब भी सुधार खुद को
और संवारने दे मुझे
सृष्टि के नए सृजन की कहानी,
तुझे कोख में पालते वक़्त ही इतिश्री की होती,
अगर भान होता तू कलंकित करेगा,
एक स्त्री ने पुरुष को
बंधक बनाकर नहीं
रक्त पिलाकर नौ महीने सींचा,
मत कर अपमान उस ममता का,
मत जमा पाँव गुनाह के दलदल में,
तेरे घर में भी एक राजकुमारी होगी 
उसका सोच,
तेरे जैसी जाने कितनी
निगाहों के हवस के दायरे में होगी,
सोच एक बार
एक मासूम लड़की
ज़िल्लत में जी रही
तू हरकत पे हरकत किये जा रहा,
अगर अब भी न सुधरा
तो डूब जाएगा
उसके आंसुओं की बाढ़ में,
क्या बोला था, 'नपुंसक हो जाऊं'
अरे नपुंसक नहीं
तेरा दिमाग बंजर हो जाएगा,
अगर रक्तबीज से
किसी दर्द की फसल लहलाहएगा।

Wednesday, 13 September 2017

हिंदी से है हिन्दोस्तान!

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हम सब के माथे की शान
हिंदी से है अपना हिन्दोस्तान,
कश्मीर से कन्याकुमारी और
पोरबन्दर से सिलचर तक
हिंदी ने कभी कोई
सरहद या दीवार नहीं बनाई,
सबने वही जुबां बोली
जो समझ में आई;
फिर भी ये उपेक्षा की
दहलीज़ पे ही रहती है:
स्वर-व्यंजनों का स्नेहिल संयोजन
पहले अपनों को ही समझना होगा,
फिर हिंदी की मशाल से रोशन
समूचे विश्व को करना होगा।
ओंकार से आज सब बिस्मिल्लाह कीजिये
कोटि-कोटि इन शब्दों का नमन कीजिये।

हम बड़े क्यों हो गए

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तुम्हारे आलिंगन में
आज वो अनुभव नहीं रहा,
तुम्हारे अनुभवों में
अब वो मिठास नहीं रही.
पहले तो नहीं आते थे ऐसे
जैसे कि तुम्हारा आना
कोई बहुत बड़ी बात हो.
वो तुम्हारे
छोटे-छोटे गिफ्ट्स
मुट्ठी भर टाफी, चोकलेट्स
और हाँ
खिलौनों में छुपा
तुम्हारा चेहरा.
हर शाम
लौटते वक़्त
लाते थे
हमारे लिए 'चिज्जी'
जिसकी मिठास
अभी तक जिन्दा है.
कितना संबल मिलता था
तुम्हारी बाहों में आकर.
कितनी रिश्वत दे डालते थे
देवी-देवताओं को
मेरे एक बार खांसने पर
यही तो सच है न
पर आज
वही पुराने दिन क्यों नहीं हैं,
आज तुम्हारा आना
ऐसे क्यों लगता है
जैसे
खानापूर्ति हो?
ऐसा क्यों हो गया
'पापा'
उम्र बढ़ने से
रिश्ते छोटे क्यों हो गए,
क्यों सिमट गया
तुम्हारा प्यार
जिम्मेदारियों के बोझ तले
क्यों छिन गया हमसे
हमारा बचपन
पापा
हम बड़े क्यों हो गए?

Tuesday, 12 September 2017

प्रद्युम्न, अब तुम कभी नहीं आओगे!

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अक्सर छोटे बच्चे स्कूल जाते वक्त
अपनी माँ को इन बोलों की थपकी दे जाते हैं,
'माँ, मैं जा रहा हूँ
तुम अकेले रहोगी न घर पर,
डरना मत!
यहीं दरवाजे पर इंतज़ार करना...'
माँ कितने भी काम निपटा ले
पर उसकी चौकस नज़रें
दरवाजे पर पहुंच ही जाती हैं;
ऐसा ही कुछ साधारण सा दिन रहा होगा
जब उस नन्हें से लाल के कदम
दहलीज़ से बाहर गए होंगे
कभी वापिस न आने के लिए;
उस रोज़ भी हर रोज़ की तरह
माँ ने दी होगी जादू की झप्पी;
काश कि माँ को आभास हो जाता
और वो बच जाता
अखबारों की सुर्खियां बनने से,
वक़्त उसे तारीख़ न बनाता:
उस ममता को आभास नहीं हुआ
वो रोशनी लेकर चला गया
पर एक सबक छोड़ गया पीछे
हम सभी के लिए
कि हम अपने कलेजे के टुकड़ों की
रक्षा ख़ुद करें;
किसी और घर में दूसरा प्रद्युम्न न आये:
हर माँ का लाल देश का नौजवान है,
क्या हैवानियत निगल ही लेगी
इंसानियत को और हम याद में
कैंडल जलाते रहेंगे??

Monday, 11 September 2017

अपना-अपना आसमान

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एक अरसे के बाद
आज माँ ने
बहुत दुलारते हुए कहा,
' जितना समेटती जाओगी
खुद को
उतनी ही
फैलती जाएगी ये दुनिया,
जितना पास जाओगी
हर किसी के
उतना ही खाली होता जायेगा
मन तुम्हारा,
कब तक पढ़ती रहोगी
दुनियादारी की किताब,
कोई आँखें चुनो
जो तुम्हें पढ़ सकें,
ज़िन्दगी एक सफर ही नहीं
मुनासिब मंज़िल भी है
महज अपना आज ही जीना
ज़िंदादिली तो है
पर समझदारी नही.……
………………… '
इसके आगे भी
बहुत कुछ कहती रही माँ
कुछ तो सुन लिया मैंने
कुछ निकलता रहा ऊपर से.
एकबारगी मन किया
माँ की गोद में सर रखकर
जार-जार रो लूँ,
पर सहम गयी मैं
कहीं माँ पढ़ न लें आज मेरा मन,
एक बार फिर मैंने
अपने सुर्ख आँखों की तपिश
अंदर ही पी ली थी,
माँ का हाथ थामा
निकल आई तारकोल की सड़क पर,
एक बच्चे की तरह
माँ से ज़िद की
एक लाल और
एक नीले गुब्बारे के लिए,
लाल पर अपना
और नीले पर
तुम्हारा नाम लिखकर
उनकी डोर छोड़ दी,
कुछ दूर साथ रहकर
उन दोनों ने अलग
अपना-अपना आसमान ढूंढ लिया.

Friday, 8 September 2017

कोई गुज़ारिश नहीं है अब तुमसे!

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निस्तेज पड़ी रगों में
लहू का संचार नहीं चाहिए
न रुमानियत को गलाने वाली ऊष्मा,
दर्द हर जड़ों से
ज़ार-ज़ार पिघल रहा है;
ढल रहा है चाँद, रात के साथ
और मैं तेरे तिलिस्म में:
हाशिये पे रखी थी जो उम्मीद तूने
वो डायरी के पन्नों की
गुज़री हुई तारीख थी,
अब कोई अहसास ज़िंदा मत करना
कि मैं दर्द की एक सुबह नहीं चाहती,
जन्नत मिले या दोज़ख़ मुझे
जिस्म को रूह से बस जुदा चाहती।

ULJHAN


हया की वो रात!

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फूट-फूट कर रोया था
वो पहली रात
उस नामुराद के लिए,
जब वो बोली थी
'तुम्हें हमबिस्तर होने का
तज़ुर्बा ही नहीं है';
उस कमरे में
एक ही बिस्तर पर
खिंच गयी थी तकिये की दीवार:
इस तरफ़ उसके अरमान
मुहाफ़िज़ बने बैठे थे
और दूसरी तरफ़ रातों की
रंगीनियां थी बेहिसाब,
न इज़्ज़त थी न अक़ीदत
बस तलब थी
आगे बढ़ते जाने की।
क़ुसूर उसका भी नहीं
कि वो जीना सीख गई,
पर क्या उसका था
कि वो कोठों की रवायतों से
अनजान क्यों था?
सुनते हैं तो कानों में
शीशे सा पिघलता है
मगर सौदायी
असभ्यता, कुसंस्कृति का तीर
बड़ी तेज़  चलता है।

Thursday, 7 September 2017

जी नहीं पाऊँगी!


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तुमसे बिछड़ना और उस पर भी जीना,
तुम्हारे लिए ही सही पर वक़्त पर
अब ये अहसान मुझसे न होगा,
रोज़ पिलाते हो न
ये इंतज़ार का पिघलता शीशा,
अम्ल की बारिश मेरे मन पर
कर दो किसी रोज़;
तुम्हारी आहट का बुत
मैं खूँटी पे टाँग दूँ,
पर बोलो न कैसे
तुम्हारी याद ताक पर रख दूँ?
तुम्हारी मुस्कराहट तो
बारिश की गीली दियासलाई की तरह है,
दिखती भी फीकी सी है,
लाख मेहनत करो पर फुस्स:
कितनी दूर ले जाते हो
मेरी यादों की मिसाइल,
मेरी आँखें दीदार-ए-शबनम नहीं माँगती,
तुम्हारी जुस्तजू, तुम्हारे मौसम
नहीं माँगती;
इन्हें रौनकें लौटा दो
अपनी सुबहों की, हमारी रातों की,
अपने जोश और नशीली बातों की,
आओ न कि दर्द की छतरी में
कुछ देर ठहरकर दो-दो बूँद
ज़िन्दगी की पी लेंगे,
तुम्हारी टूटी मुस्कान, हमारा छूटा इंतज़ार
एक साथ जी लेंगे।

Wednesday, 6 September 2017

ये तड़प बार-बार सुन लो!

बस मेरी पुकार सुन लो
दर्द में है प्यार सुन लो
आओ न इधर तो देखो
ये तड़प बार बार सुन लो


वक़्त की बूंद पर नाम लिखूंगी तेरा!

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तुम्हारे बग़ैर मेरी रात नहीं गुजरती है,
मेरे बिना तो तुम्हारे
दिन हफ़्ते महीने निकल जाते हैं,
मैं समय की हर बूँद पर
तुम्हारा बस तुम्हारा अक्स देखती रहती हूँ
और तुम
वक़्त की सिलवटों पर
अपनी पदचाप भी नहीं छोड़ते;
आ जाओ न कि तुम्हें
मेरी मायूस शामों का वास्ता,
मेरे फिक्र-ए-ग़म में,
ग़म के तन्हा सफ़र में,
सफ़र की मुक़द्दस मुस्कान में
बताओ न
कि मैं कब दर्द की उल्टी गिनती गिनूं,
या मैं तुम्हारे बग़ैर जियूँ
और बस जीती रहूँ।
अपने लिए न सही, मेरे लिए आ जाओ,
साथ होते हुए भी जो गुम गया
सुनो, आते हुए वो लम्हा भी ले आओ।

Saturday, 2 September 2017

मुझे वो हर सहर उधार दे

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सरे-शाम से लिये चिराग,
तेरी याद में मैं बेहिसाब,
बैठी हूँ तेरे सिजदे को,
मुझे एक रात नवाज़ दे।
कहाँ है मुझको ये बता,
सुलग रही है मेरी जफ़ा,
फिक्र है मुझे बस तेरी,
तू कहीं से तो आवाज़ दे।
तेरे नूर को मैं चूम लूँ,
प्यारा है मेरा रहनुमा,
वरक़-वरक़ सिमट सकूँ,
बस तेरे लफ्ज़ सँवार दे।
न छाँव अपनी दे मुझे,
न नाम का तू अक्स दे,
जो शाम तुझमें हो घुली,
मुझे वो हर सहर उधार दे।

Friday, 1 September 2017

आज की रात मुझे.....


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सुनो,
जो कल दो पन्नों वाली मुलाक़ात लिखी थी न
उसमें कुछ रह सा गया है,
अभी अपनी उस दिन वाली तकरार नहीं लिखी
और हाँ इश्क़ के फफोलों पर ठंडे मरहम वाली बात
वो भी तो नहीं लिखी।
पहले तो सब मुझे कहते थे दीवानी तुम्हारी
और तुम हर बात में पगली,
मगर अपना भी मौसम बदल गया है,
इश्क़ की दुकान में भाव ऊंचे हो गए हैं,
अब कोई नहीं कहता
एक लड़की थी दीवानी मगर पागल;
अब सब कहते हैं न
मैं मज़मून हूँ मोहब्बतों का,
दर्द के गुश्ताक़ दरिया में बेज़ार बहता हुआ;
क्या समझूँ इसे मैं
बेपनाह समंदर में डूबने की हौसला-अफ़ज़ाई
या तुम्हारे नाम की आयतों का कलमा,
क्या है मेरा मुक़द्दस कल
दिन से मुतमइन मगर रोशनी से बेज़ार:
अच्छा बताओ तो सही
इस इबारत को क्या नाम दूँ?
सुनो तुम जल्दी आओ न!
मन कुछ भारी सा हो रहा
नींबू पानी और मोहब्बत की एन्टी डोज
दोनों जरूरी हैं मेरे लिए
पर आते वक्त नुक्कड़ से
अपनी पुरकशिश मुस्कराहट लाना मत भूलना
आज की रात मुझे ये फलसफा लिखना है