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बुधवार, 6 सितंबर 2017

वक़्त की बूंद पर नाम लिखूंगी तेरा!

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तुम्हारे बग़ैर मेरी रात नहीं गुजरती है,
मेरे बिना तो तुम्हारे
दिन हफ़्ते महीने निकल जाते हैं,
मैं समय की हर बूँद पर
तुम्हारा बस तुम्हारा अक्स देखती रहती हूँ
और तुम
वक़्त की सिलवटों पर
अपनी पदचाप भी नहीं छोड़ते;
आ जाओ न कि तुम्हें
मेरी मायूस शामों का वास्ता,
मेरे फिक्र-ए-ग़म में,
ग़म के तन्हा सफ़र में,
सफ़र की मुक़द्दस मुस्कान में
बताओ न
कि मैं कब दर्द की उल्टी गिनती गिनूं,
या मैं तुम्हारे बग़ैर जियूँ
और बस जीती रहूँ।
अपने लिए न सही, मेरे लिए आ जाओ,
साथ होते हुए भी जो गुम गया
सुनो, आते हुए वो लम्हा भी ले आओ।

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मेरी पहली पुस्तक

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