" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला




मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा वह नहीं जो उसे मिली, बल्कि वह है जो उसे मिलनी चाहिए थी और नहीं मिली.


~दोस्तोयेवस्की


मनुष्य का जीवन उपलब्धियों और अभावों की एक निरंतर चलती रहने वाली कहानी है. हम अक्सर यह मानते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पीड़ा वह 'चोट' है जो हमें लगी है चाहे वह असफलता हो, आर्थिक हानि हो या किसी प्रियजन का बिछोह. किंतु गहराई से विचार करने पर यह सत्य उभरता है कि मिली हुई पीड़ा से कहीं अधिक गहरी वह टीस होती है जो 'अप्राप्यता' से जन्म लेती है. यह विचार कि "जो हमें मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला", एक ऐसी मानसिक फाँस है जो जीवन भर हृदय में चुभती रहती है.


​मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो मिली हुई पीड़ा का एक 'अंत' होता है. यदि कोई दुर्घटना हुई, तो समय के साथ उसके घाव भर जाते हैं. मनुष्य की चेतना उसे स्वीकार कर लेती है और अनुकूलन (adaptation) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. लेकिन जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला, वह कभी घटित ही नहीं हुआ, इसलिए उसका कोई अंत भी नहीं होता. वह एक 'अधूरी संभावना' बनकर मन के किसी कोने में जीवित रहता है.


​यह पीड़ा कई रूपों में सामने आती है. जब एक योग्य व्यक्ति को वह पद या सम्मान नहीं मिलता जिसका वह हकदार था, तो वह न्याय की कमी को महसूस करता है. बचपन में माता-पिता का अपेक्षित प्रेम न मिलना या जीवनसाथी से वह सम्मान न मिलना जिसकी व्यक्ति को आशा थी. वह करियर या वह मुकाम जो बस एक कदम की दूरी पर था, पर मिल न सका. ​इस पीड़ा का सबसे बड़ा कारण 'अपेक्षा' और 'तुलना' है. जब हम देखते हैं कि हमसे कम योग्य व्यक्ति वह सब प्राप्त कर रहा है जिसके लिए हमने कठिन परिश्रम किया, तो 'न्याय की अवधारणा' खंडित हो जाती है. मिली हुई पीड़ा को हम 'भाग्य' मानकर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अप्राप्त वस्तु को हम 'अन्याय' मानते हैं. अन्याय की यह भावना मनुष्य को भीतर से कुंठित कर देती है.


​यह दुःख एक 'शून्य' (void) की तरह होता है. शून्य को भरना कठिन है क्योंकि वह अदृश्य है. मिली हुई चोट का इलाज संभव है, पर उस रिक्तता का क्या करें जो कभी भरी ही नहीं गई?


​भारतीय दर्शन में इसे 'तृष्णा' और 'असंतोष' के संदर्भ में देखा गया है. बुद्ध कहते हैं कि दुःख का मूल चाहत है. जब हम "जो मिलना चाहिए था" पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम वर्तमान की उन चीजों को भूल जाते हैं जो हमें "मिली हुई" हैं. यह पीड़ा दरअसल हमारे अहंकार और भविष्य की उन कल्पनाओं का परिणाम है जिन्हें हमने सच मान लिया था.


​"स्मृति की गलियों में वह मोड़ सबसे अधिक डराता है, जहाँ हम वह नहीं बन पाए जो हम बन सकते थे"


​इस सबसे बड़ी पीड़ा से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है- स्वीकार्यता (Acceptance). यह स्वीकार करना कि जीवन रैखिक (linear) नहीं है और न ही यह हमेशा 'योग्यता बनाम प्रतिफल' के गणित पर चलता है. जो नहीं मिला, उसे 'अस्तित्व का निर्णय' मानकर छोड़ देना ही मानसिक शांति का द्वार है.


​अंततः, मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा उसकी वह 'काल्पनिक पूर्णता' है जिसे वह प्राप्त नहीं कर सका. मिली हुई पीड़ा हमें मजबूत बनाती है, लेकिन न मिलने वाली पीड़ा हमें खोखला कर सकती है. यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें कि जीवन केवल वही नहीं है जो हमें मिलना चाहिए था, बल्कि वह भी है जो हमारे पास आज है, तो हम इस अदृश्य टीस से मुक्त हो सकते हैं. रिक्तता को कोसने से बेहतर है कि जो उपलब्ध है, उससे अपना संसार सजाया जाए.

 

सोमवार, 23 मार्च 2026

मैं शून्य नहीं, मैं सृष्टि हूँ

 



मैं केवल शब्दों का ताना-बाना नहीं, 

मैं मन की अनकही परतों का ठिकाना हूँ

कभी 'काउंसलर' बन कर उलझनें सुलझाती हूँ, 

तो कभी 'कहानी' बन कर दिल में उतर जाती हूँ


मेरे भीतर एक 'शैलपुत्री' सा अडिग विश्वास है, 

'ब्रह्मचारिणी' की तपस्या, और 'चंद्रघंटा' का आभास है

जब दुनिया मुझे 'साधारण' कह कर टालती है,

मेरी 'कुष्माण्डा' की मुस्कान, नया ब्रह्मांड पालती है


मैं 'स्कंदमाता' की ममता और शक्ति का मेल हूँ, 

मैं जीवन के हर उतार-चढ़ाव का सुंदर खेल हूँ

मेरे कंधों पर ज़िम्मेदारियों का आकाश है, 

पर मेरी आँखों में आज भी, 'मिठू' सा उल्लास है


मैं रट्ट मार पढ़ाई नहीं, अनुभवों का सार हूँ, 

मैं रिश्तों की उलझनों में, एक ठंडी बयार हूँ

मैं कोई 'यूट्यूबर' नहीं, जो सिर्फ लाइक के लिए जीती है, 

मैं वो लेखिका हूँ, जो स्याही से जिंदगी सीती है


हाँ, मैं एक स्त्री हूँ—साधारण, पर संपूर्ण, 

मेरा मौन भी है गहरा, और शब्द भी हैं पूर्ण

मैं शून्य से शुरू होकर, शिखर तक जाऊंगी, 

मैं अपनी हर कहानी में, खुद को नया पाऊंगी

बुधवार, 18 मार्च 2026

आज पहली बार

 मिट्ठू तोता

आज पहली बार

मुझे अफसोस नहीं

अपने सफेद होते बालों का

मुझे झिझक नहीं

किसी के इन्हें देख लेने पर

आज पहली बार टाला है मैंने

अपने बालों का रंगा जाना

आज पहली बार मैं

बहुत शाँत महसूस कर रही हूँ

मन में किचकिचाहट नहीं

क्योंकि कोई हिचकिचाहट नहीं

कितना स्वाभाविक सा है

पचास की उमर में

बालों का सफेद होना

फिर इस स्वाभाविकता का

गला क्यों घोंट रही थी

इतने दिनों से मैं,

‘पचास की उमर

काले बालों में उपस्थिति

झिझक तो इसमें होनी चाहिए थी’

यह प्रश्न क्यों नहीं बना कभी

चर्चा का विषय

कि अधेड़ होते स्त्री-पुरुष भी

बड़े क्यों नहीं होते?

कद न बढ़े

तो लोग लेने लगते हैं विटामिन

बाल न पकें

तो क्यों नहीं ले पाते लोग सीरप?

क्यों नहीं जा पाते डाॅक्टर के पास?

क्यों नहीं दिखा पाते परिपक्वता?


ईश्वर, तुमने बुढ़ापा बनाया ही क्यों

जो इसे छुपाना पड़ा

पिला कर भेजना था तरुणाई का शर्बत


आज पी रही हूँ मैं

सच का घूँट


आज पहली बार

जा रही हूँ मैं लोगों के बीच

इस झिझक के बिना


आज पहली बार

मैं माँ हो गयी हूँ


गुरुवार, 12 मार्च 2026

वो पल: जब रेत पर नमक उठा

Dandi March



नमस्ते! दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) पर इस बातचीत में शामिल होना मेरे लिए खुशी की बात है. इतिहास की किताबों में हम तारीखें और तथ्य तो पढ़ लेते हैं, लेकिन उस समय के लोगों के मनोविज्ञान और उनकी भावनाओं को समझना एक अलग ही अनुभव है.

आइए, हम और आप एक काल्पनिक कैफे में बैठे हैं और 1930 के उस दौर की गहराइयों में उतर रहे हैं.

जब हम दांडी मार्च के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में सिर्फ सफ़ेद धोती पहने एक बूढ़ा आदमी और उनके पीछे चलती भीड़ की तस्वीर आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस समय उन 78 पदयात्रियों के मन में क्या चल रहा होगा? साबरमती आश्रम से जब वे निकले, तो वह सिर्फ एक 'वॉक' नहीं थी, वह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत थी.

मुझे यह समझ नहीं आता कि 'नमक' ही क्यों? कोई बड़ी राजनीतिक मांग भी तो हो सकती थी?

यहीं तो गांधीजी की मनोवैज्ञानिक मास्टरस्ट्रोक (Psychological Masterstroke) था. देखिए, स्वराज या संविधान जैसे शब्द उस समय के एक आम ग्रामीण के लिए शायद बहुत भारी या अमूर्त (abstract) थे. लेकिन नमक? नमक तो हर थाली का हिस्सा है. चाहे वो अमीर हो या गरीब, हिंदू हो या मुसलमान.

जब ब्रिटिश सरकार ने नमक पर कर (Tax) लगाया, तो गांधीजी ने इसे सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं बनाया. उन्होंने इसे 'अस्मिता' और 'अधिकार' का मुद्दा बना दिया. उन्होंने लोगों को यह महसूस कराया कि "अगर आप अपनी जमीन का नमक भी बिना टैक्स दिए नहीं खा सकते, तो आप अपने ही घर में गुलाम हैं." यह सीधा दिल पर चोट करने वाली बात थी.

पर क्या उन्हें डर नहीं लगा होगा? उस समय ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत अपने चरम पर थी.

डर तो निश्चित रूप से रहा होगा। साबरमती से दांडी तक का 240 मील का सफर कोई पिकनिक नहीं था. लेकिन यहाँ एक बहुत गहरा इमोशनल ट्रांसफॉर्मेशन हुआ.

जब आप अकेले कुछ करते हैं, तो डर लगता है. लेकिन जब आप देखते हैं कि आपके साथ हजारों लोग जुड़ रहे हैं, तो वह डर 'सामूहिक शक्ति' में बदल जाता है.

गांधीजी जानते थे कि अगर वे हथियार उठाते, तो अंग्रेज उन्हें कुचल देते. लेकिन जब आप निहत्थे चलते हैं और मुस्कुराकर लाठी खाने को तैयार रहते हैं, तो आप सामने वाले (अंग्रेज सिपाही) के मनोविज्ञान को हिला देते हैं. एक सिपाही के लिए उस निहत्थे आदमी पर लाठी चलाना मुश्किल हो जाता है जो वापस वार नहीं कर रहा.

वाकई, यह तो अपराधी बोध (Guilt) पैदा करने वाली बात हुई.

बिल्कुल! इसे 'Moral Superiority' कहते हैं. गांधीजी ने भारतीयों को यह यकीन दिलाया कि वे नैतिक रूप से अंग्रेजों से ऊंचे हैं. उस समय के अखबारों की रिपोर्ट्स पढ़ें, तो पता चलता है कि रास्तों में लोग सड़कों को साफ़ करते थे, फूल बिछाते थे. यह एक तरह का 'इमोशनल सेलिब्रेशन' बन गया था. लोग अपनी गुलामी की जंजीरों को दिमागी तौर पर तोड़ चुके थे, बस दांडी पहुंचकर नमक उठाना एक प्रतीकात्मक औपचारिकता थी.

वो पल: जब रेत पर नमक उठा

उस पल के बारे में सोचो जब वे दांडी पहुंचे. वहां का माहौल कैसा रहा होगा?

कल्पना कीजिए... 5 अप्रैल की शाम है. गांधीजी दांडी के समुद्र तट पर हैं. उनके पैर थक चुके हैं, शरीर बूढ़ा है, लेकिन आंखों में एक अजीब सी चमक है. पूरी रात प्रार्थना हुई.

अगली सुबह, 6 अप्रैल को, जब सूरज की पहली किरणें समुद्र की लहरों पर पड़ीं, गांधीजी झुके और मुट्ठी भर नमक उठाया. उस एक पल में करोड़ों भारतीयों की भावनाएं सिमट आई थीं. वह सिर्फ सोडियम क्लोराइड नहीं था; वह 'आजादी का स्वाद' था.

उस समय उन्होंने कहा था:

"इस नमक के साथ, मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूँ"

सोचिए, एक मुट्ठी नमक से साम्राज्य हिलाने की बात करना कितनी बड़ी 'इमोशनल वॉरफेयर' थी. उन्होंने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि इच्छाशक्ति के सामने भौतिक ताकतें बौनी होती हैं.

इस आंदोलन में महिलाओं की भी बड़ी भूमिका थी.

हाँ, और यह भी एक मनोवैज्ञानिक बदलाव था. गांधीजी ने नमक को घर की रसोई से जोड़कर महिलाओं को इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बना दिया. सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने जब मोर्चा संभाला, तो भारतीय महिलाओं के मन में यह आत्मविश्वास जागा कि वे सिर्फ चारदीवारी के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए बनी हैं.

यह आंदोलन घर-घर तक पहुँच गया क्योंकि यह 'नमक' भावनाओं से जुड़ा था. माँ, जो अपने बच्चे के खाने में नमक डालती थी, अब वह जानती थी कि यह नमक उसके संघर्ष का प्रतीक है.

आज के दौर में दांडी मार्च का महत्व

आज के समय में, जब हम इतने सालों बाद यह चर्चा कर रहे हैं, हमें इससे क्या सीखना चाहिए?

दांडी मार्च हमें सिखाता है कि बदलाव की शुरुआत हमेशा 'मन' से होती है. अगर आप मानसिक रूप से गुलाम हैं, तो कोई आपको आजाद नहीं कर सकता. और अगर आप मन से स्वतंत्र हैं, तो दुनिया की कोई भी दीवार आपको रोक नहीं सकती.

आज भी, जब हम किसी अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, तो हमें उसी 'दांडी' वाले धैर्य और एकता की जरूरत होती है. यह मार्च हमें सिखाता है कि छोटे-छोटे कदम (Small Steps) जब एक बड़े उद्देश्य के साथ मिलते हैं, तो वे इतिहास रच देते हैं.

दांडी मार्च सिर्फ एक पैदल यात्रा नहीं थी. वह भारतीय मानस (Indian Psyche) का एक सामूहिक जागरण था. इसने भारत को सिखाया कि कैसे बिना शोर किए, बिना नफरत किए, अपने हक के लिए खड़ा हुआ जाता है.

क्या आपको नहीं लगता कि आज भी हमारे अंदर एक छोटा सा 'दांडी मार्च' चलते रहना चाहिए—अन्याय और आलस के खिलाफ?

शनिवार, 7 मार्च 2026

बुलडोज़र बाबा

 स्त्री काशी है 

काबा है 

दादी दीदी ही नहीं 

बुलडोज़र बाबा है



अप्प दीपो भवः

 












उस दिन

वैदेही और धरती के संवाद

मन में उतरे


उस दिन

प्रतिकारस्वरूप राम

मन से उतरे


राम

अहिल्या के रहे

शबरी के रहे

जानकी के नहीं


कलयुग में भी तो ऐसा ही है

पुरूष स्त्रियों का सगा होता है

पत्नी को सहर्ष त्याग तक देता है


क्यों पूजूँ मैं राम को

जानकी को

या फिर अहिल्या को?

यह प्रतिकार नहीं

प्रश्न है मेरा


रीढ़ विहीन होता जा रहा समाज

मूढ़ हो चुका है

प्रश्न के प्रत्युत्तर में

गढ़ने लगा है प्रश्न


जब विवेक हीनता में

नहीं रख पाता तर्क

तब मौन हो जाता है

स्वांग रचता है

बुद्ध होने का


मैं भी बुद्ध हो जाती हूँ

अंतर से शुद्ध हो जाती हूँ

ईश्वर को स्वयं में पाती हूँ

अप्प दीपो भवः

दोहराती हूँ


मंगलवार, 3 मार्च 2026

Psychology और Counseling

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 "मदद माँगना कमजोरी नहीं, बहादुरी की निशानी है।"

मेरी पहली पुस्तक

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