कान्हा का बचपन
To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
मन मदन है देह वायु
भूमिजा अपलक नयन है
कर्ण कुंतल नासिका मणि
कटिबंध पर आंचल हरण है
क्षीर का बांका कोई अब
थामे नीर कंचन कामिनी को
चपलता, लालित्यता को
रुपसी मृगनयनि को
मुख लजाती माधुर्य करती
रति में रति का आवरण है
दृग से दृग का ज्यों हो मिलना
रेख अधरों का संवरना
दृष्टि में उतरा वसंती
कौमार्य का मादक सा हँसना
भाव गूँथे वेणियों में
केश बिच यामिनी का अंतरण है
लेबल: कविता, प्रेम कविता
मनोवैज्ञानिक रूप से, सरस्वती पूजा 'सर्दियों की जड़ता' से 'वसंत की सृजनात्मकता' की ओर संक्रमण का प्रतीक है. जिस प्रकार प्रकृति इस समय नए पत्तों और फूलों के साथ खुद को पुनर्जीवित करती है, उसी प्रकार यह त्यौहार मनुष्य को अपनी संज्ञानात्मक क्षमताओं (Cognitive Abilities) को ताज़ा करने का अवसर देता है. छोटे बच्चों के लिए 'विद्यारंभ' का संस्कार उनके कोमल मस्तिष्क में यह संदेश अंकित करता है कि सीखना एक पवित्र और उत्सवपूर्ण प्रक्रिया है, न कि कोई बोझ.
इस उत्सव में पीले रंग की प्रधानता होती—पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले पकवान. रंग मनोविज्ञान (Color Psychology) के अनुसार, पीला रंग एकाग्रता, आशावाद और मानसिक स्पष्टता को बढ़ावा देता है. यह रंग मस्तिष्क के 'लेफ्ट हेमिस्फीयर' (तार्किक पक्ष) को उत्तेजित करता है, जिससे नई अवधारणाओं को सीखने और समझने की क्षमता बढ़ती है. यह रंग सामूहिक रूप से एक 'सकारात्मक मनोवैज्ञानिक माहौल' तैयार करता है.
पूजा के दिन अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को देवी के चरणों में रखकर पढ़ाई से अवकाश लेने की परंपरा का एक ठोस मनोवैज्ञानिक आधार है. इसे मनोविज्ञान में 'इन्क्यूबेशन इफेक्ट' कहा जाता है. जब हम किसी कठिन समस्या या निरंतर अध्ययन से थोड़ा ब्रेक लेते हैं, तो हमारा अवचेतन मन उस जानकारी को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करता है. यह एक दिन का विश्राम छात्रों को मानसिक थकान (Burnout) से बचाता है और अगले दिन नए उत्साह के साथ लौटने की प्रेरणा देता है.
देवी सरस्वती के हाथ में वीणा जीवन में सामंजस्य और लय का प्रतीक है, जबकि हंस (नीर-क्षीर विवेक) सही और गलत के बीच भेद करने वाली 'निर्णायक बुद्धि' का प्रतिनिधित्व करता है. आज के सूचना विस्फोट (Information Overload) के युग में, सरस्वती पूजा हमें यह सिखाती है कि केवल सूचना एकत्रित करना पर्याप्त नहीं है; उसे ज्ञान में बदलने के लिए विवेक की आवश्यकता है.
लेबल: वसंत, सरस्वती, सरस्वती-वंदना, Vasant Panchami
मैं हवा हूँ
उठाती हूँ गिराती हूँ
नज़र नहीं आती हूँ
प्रदूषित नहीं होना चाहती हूं
मुझे बचाओ
प्रथ्वी के प्राणियों मुझे नज़र न लगाओ
मुझे बचाओ
मैं जल हूँ
घर से नदी-नालों तक
करता कल-कल हूँ
उत्तर से दक्षिण तक
चलता पल-पल हूँ
मुझमें कचरा न फैलाओ
मुझे बचाओ
घने बादल न चुराओ
मुझे बचाओ
मैं जंगल हूँ
वृक्ष-वृक्ष से मैं बनता
तूफानों में सीधा तनता
औषधि, वायु और फूल-फल
लेती मुझसे सारी जनता
मुझ पर आरी न चलवाओ
मुझे बचाओ
मैं तारा हूँ
रातों का दुलारा हूँ
खो गया चकाचौंध में
खोज पाओगे, तो प्यारा हूँ
मैं सूरज हूँ
आता हर रोज हूँ
ग्रीष्म में दिखाते हो आँखें
शीत में खोज हूँ
मैं चंदा
कहलाता मामा हूँ
और हूँ अच्छा बंदा
मैं धरती हूँ
माता कहते मुझको
मेरे बच्चों, तुम्हारा भार सहती हूँ
मुझसे हवा, जल, जंगल न चुराओ
मुझे बचाओ
सब की सखी
तुम सभी के जैसी
मैं भी हूँ दुःखी
मैं पर्वत अरावली
लेकर मशीनें घूम रहे तुम
मैं सीना तान खड़ा हूँ
तुम सबके लिए
प्रदूषण से लड़ा हूँ
अब तुम मुझी से लड़ रहे हो
कर जीवन को मरण रहे हो
मैं मानव
मुझे इतना न करो लज्जित
मैं सबसे पराजित
लेता हूँ शपथ
स्वच्छ रखूँगा जगत
त्राहिमाम न करो
मुझे अपनी शरण लो
यदि जंगल कटे तो औषधि नहीं
पर्वत कटे तो परिधि नहीं
सूरज चाचू, चंदा मामा, धरा हमारी माता है
मौसम और जलवायु से गहरा हमारा नाता है
जिसने हमको जीवन दिया, उसे बचाने की बारी
कसकर कमर कर ली है तैयारी
लेबल: AQI
स्वामी विवेकानंद केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक इतिहास के सबसे गहरे "आत्मा के मनोवैज्ञानिक" और सामाजिक इंजीनियरों में से एक थे. उनका दर्शन केवल दुनिया की व्याख्या करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य व्यक्ति के आंतरिक परिदृश्य को बदलकर बाहरी सामाजिक परिवर्तन लाना था. प्राचीन वेदांतिक ज्ञान और आधुनिक समाज की जरूरतों के बीच सेतु बनाकर, विवेकानंद ने एक ऐसे जीवन का खाका तैयार किया जो गहरा आत्मनिरीक्षण और सक्रिय कर्म दोनों का मिश्रण है.
विवेकानंद के मनोवैज्ञानिक ढांचे के केंद्र में आत्म-शक्ति की अवधारणा है—प्रत्येक मनुष्य के भीतर निहित अनंत शक्ति. उन्होंने मानवता की प्राथमिक मनोवैज्ञानिक बीमारी "कमजोरी" को माना. उनके विचार में, अधिकांश मानसिक पीड़ा और नैतिक विफलताएं एक खंडित आत्म-छवि से पैदा होती हैं जहाँ व्यक्ति खुद को "भेड़" के रूप में देखता है, न कि "शेर" के रूप में.
सकारात्मक आत्म-छवि: उन्होंने प्रसिद्ध रूप से सिखाया कि "अपने आप को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है." उनका मनोविज्ञान मौलिक सशक्तिकरण का था, जिसने नियंत्रण के केंद्र को बाहरी भाग्य से हटाकर आंतरिक इच्छाशक्ति पर केंद्रित किया.
मन नियंत्रण का विज्ञान: आधुनिक संज्ञानात्मक-व्यवहार चिकित्सा (CBT) के उदय से बहुत पहले, विवेकानंद ने मन को एक "शराबी बंदर" कहा था जिसे राजयोग के माध्यम से पालतू बनाया जाना चाहिए. उन्होंने तर्क दिया कि एक नियंत्रित मन ही भ्रम के पर्दे को चीरने और "मनुष्य बनाने वाली शिक्षा" (Man-making education) प्राप्त करने में सक्षम है.
निर्भयता (Abhaya): उन्होंने एक "नीचे से ऊपर" वाले मनोवैज्ञानिक सुधार को प्रोत्साहित किया. अपने विचारों की पूरी जिम्मेदारी लेकर, एक व्यक्ति 'अभय' की स्थिति विकसित कर सकता है, जिसे वे किसी भी सार्थक जीवन के लिए अनिवार्य शर्त मानते थे.
विवेकानंद का सामाजिक दर्शन उनके मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि का ही विस्तार था. उन्होंने "एकत्व" की अमूर्त अवधारणा को एक व्यावहारिक सामाजिक मिशन में बदल दिया: "जीव ही शिव है" (मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है). इस "व्यावहारिक वेदांत" ने तीन प्राथमिक स्तंभों के माध्यम से सामाजिक जड़ता को तोड़ने की कोशिश की:
शिक्षा, सामाजिक समानता, सार्वभौमिकता
उन्होंने उन अंधविश्वासों और कुरीतियों की कड़ी आलोचना की जिन्होंने भारतीय समाज को पंगु बना दिया था. विवेकानंद के लिए, एक समाज उतना ही मजबूत होता है जितना उसकी सबसे कमजोर कड़ी. उन्होंने एक "वेदांतिक समाजवाद" की कल्पना की जहाँ पूर्व की आध्यात्मिक विरासत और पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति मिलकर गरीबी और निरक्षरता की समस्याओं को हल कर सकें.
विवेकानंद की प्रासंगिकता आज उनके 'आंतरिक' और 'बाहरी' के संश्लेषण में निहित है. उन्होंने सिखाया कि हम शुद्ध व्यक्तियों के बिना एक शुद्ध समाज नहीं पा सकते, और इसके विपरीत, सामाजिक सेवा के बिना व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास अधूरा है. युवाओं को "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए" का आह्वान देकर, उन्होंने एक ऐसी मनोवैज्ञानिक चिंगारी सुलगाई जो आज भी न्याय, शिक्षा और मानवीय गरिमा के आंदोलनों को प्रेरित करती है.
मैं
वही तुम्हारा भारत महान
साॅरी अब और ज़्यादा महान
चुन लेता हूँ
किस हिस्से को 'दीपू' की मौत पर
और किस हिस्से को
'चकमा' की मौत पर मातम मनाना है
मैं सिलेक्टिव दुःखनवीस हूँ
चुन लेता हूँ
किसे चाहिए अपनी
'अरावली' पर आंदोलन
किसे 'सेंगर' को बचाना है
मैं एक्सेप्ट मोड डिनायल पीस हूँ
चुन लेता हूँ
सुपरसोनिक सा मौन
तो कभी ज़ीरो डेसीबल का शोर
सनलाइट में ब्लैक आउट
रेडिएशन में लगी ग्रीस हूँ
लेबल: Kavita