" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

शनिवार, 4 जुलाई 2026

नीलकुरिंजी एक उत्सव

 

“हाउ ब्यूटीफुल कितना हर्बल मौसम है ना”


“भला मौसम भी कभी हर्बल होता है”


“हाँ हाँ क्यों नहीं! होता है ना हर्बल.”


“अच्छा तो तुम्हारे शहर की भाषा में इसे हर्बल मौसम कहते हैं?”


“हाँ हमारे शहर की भाषा में इसे हर्बल कहते हैं. अच्छा एक बात तो बताओ कितने दिनों के बाद आज तुम हमारे सो कॉल्ड शहर जा रहे हो?”


“मुझे ठीक-ठाक याद नहीं”


“मतलब?”


“मतलब यह है कि मैं भूल गया”


“ओह वह तो मुझे समझ में आ गया. लेकिन ऐसा क्यों?”


“तुम ही बताओ, तुम्हें कैसे पता चलता है समय का, तारीख का, महीने का, दिन का?”


“ऑफकोर्स कैलेंडर. हमारे पैर तो कैलेंडर की रिदम पर चलते हैं. तुम्हें पता है एक भी मिनट की देरी कितनी बड़ी प्रॉब्लम बन जाती है और एक घंटे की देरी एक दिन को भी आगे बढ़ा सकती है.”


“और अगर एक दिन लेट हो जाए तो?”


तो कभी-कभी तो जीवन ही...इतना कहकर कुरिंजी खो गयी थी अपने कल में. कल की ही तो बात है जब पापा और मम्मा ने यहाँ की कितनी यादें साझा की थीं. किस तरह वो दोनों पहली बार यहाँ मिले थे जब इन पहाड़ियों ने नीली चादर ओढ़ रखी थी और पूरे बारह साल की कोर्टशिप के बाद दोनों ने इन्हीं वादियों को साक्षी मानकर सप्तपदी की रस्में निभायी थीं.


उसकी आँखें सामने फैले नीलकुरिंजी को देख रही थीं. यह उस जादुई पल का दृश्य है जब कुरिंजी अपने साथी के साथ बैंगनी रंग के नीलकुरिंजी फूलों से ढकी हसीन वादियों को निहार रही है. फूलों की यह चादर पहाड़ियों पर दूर तक फैली हुई है, जो इस दृश्य को और भी शांत और खूबसूरत बना रही है लेकिन उसकी दृष्टि कहीं बहुत दूर, अतीत के उस धुंधले और खौफनाक पन्ने पर अटकी हुई थी जिसे वह पिछले दो सालों से पलटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ चुकी थीं और हाथों की उंगलियाँ अनजाने में ही कसकर मुट्ठी में तब्दील हो गई थीं.


"कुरिंजी? कहाँ खो गई तुम?" उसके साथी ने उसके चेहरे के सामने हाथ हिलाते हुए पूछा.


लेकिन कुरिंजी उस समय एक ऐसे भंवर में थी, जहाँ से बाहर आना आसान नहीं था. उसके कानों में आज भी वह सायरन गूंज रहा था. एम्बुलेंस का वह चीखता हुआ सायरन, जो मदद की गुहार लगा रहा था, लेकिन सुनने वाला उस दिन कोई नहीं था.


दो साल पहले की ही तो बात थी. कुरिंजी तब 19 साल की थी. उसकी आँखों में चमक थी, दिल में एक जुनून था और भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा सपना, डॉक्टर बनने का सपना. उसने दिन-रात एक करके NEET की परीक्षा पास की थी. रिजल्ट वाले दिन पूरे घर में मानो दीवाली मन रही थी. पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था और माँ ने तो मोहल्ले भर में मिठाइयाँ बाँट दी थीं.


लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुरिंजी के पैरों की लय जो हमेशा 'कैलेंडर की रिदम' पर चलती थी, उसे वक्त ने एक ऐसा झटका दिया कि सारी रिदम ही टूट गई.


वह एक मनहूस मंगलवार की सुबह थी. पापा को अचानक सीने में तेज दर्द हुआ. दर्द इतना भयानक था कि वह पसीने से तर-बतर होकर जमीन पर गिर पड़े. कुरिंजी और उसकी माँ ने बिना एक पल गँवाए एम्बुलेंस बुलाई. कुरिंजी ने अपने मेडिकल नाॅलेज के आधार पर पापा को सीपीआर देने की भरसक कोशिश की थी. एम्बुलेंस आयी और वे अस्पताल की ओर भागे. माँ घर पर रुक गयी थीं ताकि पापा के मेडिकल पेपर्स और कुछ पैसे लेकर स्कूटी से सीधे अस्पताल पहुँच सकें. हमेशा साथ रहने वाली मासी और उनका परिवार कल ही तो गया था बाहर छुट्टियाँ मनाने. किसी को क्या पता था कि आज यह हो जायेगा.


एम्बुलेंस सायरन बजाते हुए शहर की सड़कों को चीर रही थी. कुरिंजी पापा का हाथ पकड़े, उन्हें ढांढस बंधा रही थी, "बस पाँच मिनट पापा, हम अस्पताल पहुँचने वाले हैं. सब ठीक हो जायेगा."


तभी एम्बुलेंस अचानक एक चौराहे पर आकर रुक गयी. ब्रेक की तेज आवाज से कुरिंजी का दिल दहल गया. उसने खिड़की से बाहर देखा तो पाया कि पुलिस ने चारों तरफ से रास्ता बंद कर रखा था। बैरिकेड्स लगे हुए थे और भारी पुलिस बल तैनात था.


"क्या हुआ भइया? गाड़ी क्यों रोक दी?" कुरिंजी ने घबराते हुए ड्राइवर से पूछा.


"मैडम, आगे वीआईपी मूवमेंट है. किसी बड़े नेता का काफिला गुजरने वाला है. ट्रैफिक रोक दिया गया है."


‘लेकिन यह एम्बुलेंस है! मेरे पापा को कार्डियक अरेस्ट हुआ है, उन्हें तुरंत मेडिकल अटेंशन की जरूरत है. प्लीज, उन्हें कहिए हमें जाने दें! कुरिंजी लगभग चीख पड़ी.


ड्राइवर ने सायरन की आवाज और तेज कर दी उसने नीचे उतरकर पुलिस वाले से मिन्नतें भी कीं, लेकिन वर्दी की हनक और प्रोटोकॉल के आगे एक आम इंसान की जान की क्या कीमत थी? "पीछे से ऑर्डर है, जब तक काफिला नहीं निकल जाता, यहाँ से एक पत्ता भी नहीं हिल सकता," पुलिस वाले का रूखा जवाब था.


कुरिंजी एम्बुलेंस के अंदर वापस आई. पापा की साँसें उखड़ रही थीं. मॉनिटर पर ईसीजी की लाइनें बेतरतीब हो रही थीं. वह एक-एक सेकंड गिन रही थी. समय, जिसे वह अपनी मुट्ठी में समझती थी, आज रेत की तरह फिसल रहा था. पापा को इसी हालत में छोड़ वह एक बार फिर एंबुलेंस से नीचे उतरी. उसे पता था कि इन छोटे पुलिस वालों से कहकर कुछ नहीं होगा वो तो आदेश का पालन कर रहे हैं. वह सीधे इंस्पेक्टर के पास पहुँची. उसने हाथ जोड़ा, रोयी, गिड़गिड़ाई. इंस्पेक्टर भी बिल्कुल गंभीर मुद्रा में आ गए थे. शायद वह कुरिंजी का दर्द समझ रहे थे. कुरिंजी ने समय न गँवाते हुए उनके पैरों पर अपना सिर रख दिया, “प्लीज मेरे पापा को बचा लीजिए.” अब इंस्पेक्टर का दिल बिल्कुल पसीज गया और उन्होंने कहा, “आप गाड़ी में बैठिए. ड्राइवर से कहिए एंबुलेंस स्टार्ट रखें और मैं अभी इसे खोलता हूँ लेकिन एक मिनट की भी देरी न हो पाए आप निकल जाइए. साहब को आने में तीन मिनट का समय लगेगा. कुरिंजी आश्वस्त होकर एंबुलेंस पर जा बैठी. सब कुछ कहे अनुसार हुआ. जैसे ही कुरिंजी के लिए वह बैरिकेड हटाया गया, एम्बुलेंस बाहर निकली. सेकंड्स में ही सब कुछ हुआ. तभी किसी कारिंदे की गाड़ी आ धमकी. अगर यहाँ साहब होते तो शायद एंबुलेंस को निकल जाने देते उन पर बहुत जिम्मेदारियाँ होती हैं. लोगों के सवाल होते हैं लेकिन वह ठहरा कारिंदे… उसने नहीं जाने दिया. कुरिंजी के पापा ने कुरिंजी का हाथ पकड़ते हुए कहा, “माँ का ध्यान रखना”


कुरिंजी कहती रही, पापा कुछ देर और कुछ मिनट्स की ही तो बात है. इस बीच वीआईपी मूवमेंट हो चुका था. एंबुलेंस जैसे ही आगे बढ़ गये थे. हमेशा के लिए चले गए इस दुनिया से. सब कुछ खत्म हो चुका था. दस मिनट... पंद्रह मिनट... बीस मिनट. सामने से सायरन बजाती हुई दर्जनों सफेद और काली गाड़ियाँ गुजरीं. उन गाड़ियों में बैठे लोगों को शायद इस बात का इल्म भी नहीं था कि उनके कुछ मिनटों के सफर की कीमत एक परिवार को अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकानी पड़ रही है.


जैसे ही आखिरी गाड़ी गुजरी और बैरिकेड्स हटे, मॉनिटर पर एक लंबी, सपाट 'बीप' की आवाज गूँज उठी. पापा का हाथ जो कुरिंजी ने कसकर पकड़ रखा था, अब ठंडा पड़ चुका था. एम्बुलेंस अस्पताल तो पहुँची, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. एक घंटे की देरी ने एक दिन को आगे नहीं बढ़ाया था, बल्कि एक जीवन को ही हमेशा के लिए खत्म कर दिया था.


अस्पताल के स्ट्रेचर पर पापा के बेजान शरीर को देखकर कुरिंजी पत्थर हो गई थी. उसके आँसू सूख गए थे. वह बस उस दीवार घड़ी को घूर रही थी, जिसकी टिक-टिक अब उसे किसी हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी.


तभी उसके फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर था.


"हैलो, क्या आप कुरिंजी बोल रही हैं?"


"जी..."


"आपकी माँ का एक्सीडेंट हो गया है. वह स्कूटी से अस्पताल की तरफ आ रही थीं, तभी चौराहे पर ट्रैफिक खुलने की वजह से मची अफरा-तफरी में एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी है. उन्हें सिटी हॉस्पिटल में लाया जा रहा है."


फोन कुरिंजी के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ा. उस दिन समय ने सिर्फ एक बार नहीं, दो बार क्रूरता दिखाई थी. जब तक कुरिंजी इमरजेंसी वॉर्ड की तरफ भागी, तब तक माँ भी दम तोड़ चुकी थीं.


चंद घंटों का फासला और कुरिंजी की पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी.


अंतिम संस्कार, रस्में, और रिश्तेदारों की भीड़, सब कुछ किसी धुंधले सपने की तरह बीत गया. कुरिंजी एक मशीन की तरह काम कर रही थी. लेकिन उसके अंदर का इंसान मर चुका था.


ठीक पंद्रह दिन बाद, उसकी NEET की काउंसलिंग थी. वही काउंसलिंग, जिसके लिए उसने और उसके माता-पिता ने इतने सपने बुने थे. काउंसलिंग का कॉल लेटर उसकी मेज पर रखा था. सुबह के 10 बज रहे थे. उसे दोपहर दो बजे तक शहर के मेडिकल कॉलेज में रिपोर्ट करना था.


कुरिंजी उस लेटर को देखती रही. उसके कानों में फिर से वही एम्बुलेंस का सायरन और पुलिस वाले की आवाज गूंजने लगी 'पीछे से ऑर्डर है.’


क्या फायदा ऐसी पढ़ाई का? क्या फायदा ऐसा डॉक्टर बनने का, जब सिस्टम और समय की बेरुखी के आगे एक डॉक्टर भी बेबस हो जाता है? क्या वह उस शहर में वापस जा सकती है जिसने उसके माता-पिता को निगल लिया? वह शहर, जिसकी सड़कें उसे अब किसी अजगर की तरह लगती थीं.


उसने घड़ी की तरफ देखा. 11 बजे. 12 बजे. एक बजे. दो बज गए. काउंसलिंग का समय निकल गया. कुरिंजी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. उसने अपने भविष्य, अपने मेडिकल करियर को अपनी आँखों के सामने खत्म होते हुए देखा और उसने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की. समय ने उससे बहुत कुछ छीना था, आज उसने भी समय को अपना सपना सौंप दिया.


"कुरिंजी! ओ कुरिंजी!"


साथी की तेज आवाज ने अंततः उस भंवर से उसे बाहर खींच लिया. कुरिंजी ने एक गहरी साँस ली. दो साल बीत चुके थे. इन दो सालों में वह शहर छोड़कर इस छोटे से पहाड़ी कस्बे में आ गई थी. यहाँ का शांत माहौल, प्रकृति, और भागदौड़ से दूर यह जीवन यही उसका सहारा बन गया था.


"क्या यार, तुम तो बोलते-बोलते ही किसी दूसरी दुनिया में चली गई," साथी ने हल्की सी झुंझलाहट और चिंता के साथ कहा.


कुरिंजी फीकी सी मुस्कान के साथ बोली, "कुछ नहीं, बस ऐसे ही पुरानी बातें याद आ गईं. तुमने पूछा था ना कि मुझे समय का कैसे पता चलता है?"


"हाँ, और तुम 'जीवन ही” कहकर चुप हो गई थीं"


कुरिंजी ने सामने बहती हुई ठंडी हवा को महसूस किया, जिसने उसके बालों को हल्का सा सहलाया.


“हाँ, जीवन ही खत्म हो जाता है, जब समय अपनी लय खो देता है. लेकिन तुम्हें पता है, यह जो मौसम है न, जिसे मैं हर्बल मौसम कहती हूँ, इसने मुझे समय का एक नया अर्थ सिखाया है."


"कैसा अर्थ?"


"हर्बल का मतलब क्या होता है? वह जो प्राकृतिक है, जो तुरंत असर नहीं दिखाता, जिसमें कोई साइड इफेक्ट नहीं होता, लेकिन जो धीरे-धीरे भीतर तक जाकर जड़ों से बीमारी को ठीक करता है. शहर का समय एलोपैथिक दवा की तरह, तुरंत असर, तेज भागदौड़, एक मिनट की देरी और भारी नुकसान. लेकिन यहाँ का समय हर्बल है. यह घावों को धीरे-धीरे भरता है. यह प्रकृति की रिदम पर चलता है, कैलेंडर की नहीं."


साथी उसे हैरानी से देख रहा था. 19 साल की उम्र में जो लड़की टूट गई थी, आज 21 साल की उम्र में उसकी बातों में एक अजीब सा ठहराव और गहराई थी. इन दो सालों में कुरिंजी ने मनोविज्ञान की किताबें पढ़नी शुरू कर दी थीं. उसने इंसानी व्यवहार, आघात (Trauma), और उसके बाद के प्रभावों को समझना शुरू कर दिया था. उसने समझा था कि हमारे आस-पास के माहौल और हमारी भावनाओं का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है.


"तो फिर आज दो साल बाद तुम वापस उसी 'सो कॉल्ड शहर' में क्यों जा रही हो? अगर तुम्हें यह हर्बल मौसम इतना ही पसंद है, तो वापस उस कंक्रीट के जंगल में क्यों?" साथी ने पूछा, क्योंकि आज वे दोनों उसी शहर की तरफ निकलने वाले थे, जहाँ जाना कुरिंजी के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था.


कुरिंजी उठी और उसने अपना बैग कंधे पर लटका लिया. उसकी आँखों में अब वह पुराना दर्द नहीं था, बल्कि एक अजीब सा संकल्प था.


"क्योंकि दर्द से भागना इलाज नहीं है," कुरिंजी ने शांत स्वर में कहा. "मैंने नीट की काउंसलिंग भले ही छोड़ दी हो, लेकिन मैंने जीवन की काउंसलिंग नहीं छोड़ी है. जब इंसान किसी बहुत बड़े आघात से गुजरता है, तो या तो वह खुद को खत्म कर लेता है, या फिर वह दूसरों के लिए एक ढाल बन जाता है. मेरे माता-पिता सिस्टम की संवेदनहीनता और वीआईपी कल्चर की भेंट चढ़ गए. मैं डॉक्टर नहीं बन सकी, जो शायद शरीर का इलाज करती. लेकिन मैंने साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन के लिए फॉर्म भरा है."


वह कुछ कदम आगे बढ़ी और मुड़कर अपने साथी की ओर देखते हुए बोली, "मुझे शरीर का डॉक्टर नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का इलाज करना है. मुझे समझना है कि कैसे सत्ता के नशे में लोग एक एम्बुलेंस की आवाज को अनसुना कर देते हैं. मुझे उन लोगों के लिए काम करना है जो मेरी तरह किसी अचानक आए तूफान में सब कुछ खो देते हैं और डिप्रेशन के अंधेरे में चले जाते हैं. मुझे उनके लिए एक 'हर्बल' इंसान बनना है, जो उनके घावों को बिना किसी साइड इफेक्ट के भर सके.


साथी अवाक रह गया. उसने कुरिंजी के भीतर एक ऐसी ताकत को महसूस किया जो शायद पहले कभी नहीं थी. वह लड़की जो समय के हाथों हार गई थी, आज समय की आँखों में आँखें डालकर उसे एक नया आकार देने जा रही थी.


"चलो," कुरिंजी ने मुस्कुराते हुए कहा. "देर हो रही है. और हाँ, आज मैं कैलेंडर या घड़ी देखकर नहीं जा रही हूँ. आज मैं अपनी खुद की रिदम पर उस शहर जा रही हूँ. शहर वही है, पर अब कुरिंजी बदल गई है"


दोनों ने पहाड़ी पगडंडी से नीचे उतरना शुरू किया. हवा अब भी ठंडी और 'हर्बल' थी, लेकिन अब उसमें अतीत की उदासी नहीं, बल्कि भविष्य की एक ताज़ा महक थी। कुरिंजी जानती थी कि शहर की सड़कें उसे फिर से डराएंगी, उस चौराहे से गुजरना उसके दिल में फिर से एक हूक उठाएगा, लेकिन इस बार वह अपनी आँखें बंद नहीं करेगी.


वह जानती थी कि किसी का बुरा बर्ताव और संवेदनहीनता लहरों की तरह फैलकर किसी की जिंदगी तबाह कर सकती है, लेकिन उसने यह भी सीख लिया था कि समानुभूति और करुणा भी उसी तरह लहरों की तरह फैलती है, और वह अब वही करुणा की लहर बनने जा रही थी.


शहर की ओर जाती बस में बैठते हुए कुरिंजी ने खिड़की से बाहर देखा. अब उसे समय की भागती हुई सुइयाँ नहीं, बल्कि आसमान में धीरे-धीरे उजला होता हुआ सूरज दिखाई दे रहा था. समय ने उससे उसका कल छीना था, लेकिन उसका आज और आने वाला कल अब पूरी तरह से उसके अपने हाथों में था.


कहानी अब शुरु होगी...

रविवार, 7 जून 2026

"आधुनिक भारत के मंदिर" का दृष्टिकोण (Vision) और नेहरू जी


भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का आईआईटी खड़गपुर (और पूरे आईआईटी तंत्र) की स्थापना में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और बुनियादी योगदान था. उनके बिना भारत में तकनीकी शिक्षा के इस सबसे बड़े संस्थान का सपना इतनी जल्दी साकार होना संभव नहीं था.


आईआईटी खड़गपुर के निर्माण में उनका योगदान मुख्य रूप से इन पहलुओं में देखा जा सकता है.


"आधुनिक भारत के मंदिर" का दृष्टिकोण (Vision)

नेहरू जी की यह दृढ़ मान्यता थी कि एक नव-स्वतंत्र, गरीब और कृषि-प्रधान देश को आगे ले जाने का एकमात्र रास्ता विज्ञान और प्रौद्योगिकी (Science and Technology) है. उनका विजन था कि भारत को अपने विकास के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बजाय खुद के इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करने चाहिए. उन्होंने इन संस्थानों को आधुनिक भारत के मंदिर के रूप में देखा.


1946 में 'नलिनी रंजन सरकार समिति' ने भारत में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की तर्ज पर उच्च तकनीकी संस्थानों की स्थापना की सिफारिश की थी. 1947 में आज़ादी मिलने के बाद, प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू ने इस विजन को सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहने दिया. उन्होंने इसे प्राथमिकता दी और अपने राजनीतिक प्रभाव और इच्छाशक्ति का इस्तेमाल करते हुए 1951 में भारत के पहले आईआईटी की स्थापना सुनिश्चित की.


हिजली डिटेंशन कैंप के महत्व को दुनिया के सामने रखना. 1956 में जब आईआईटी खड़गपुर का पहला दीक्षांत समारोह (Convocation) हुआ, तब नेहरू जी ने ही वहां ऐतिहासिक भाषण दिया था. उन्होंने जेल से विद्या के मंदिर तक के इस सफर को शब्दों में पिरोते हुए कहा था:


"यहाँ उस हिजली डिटेंशन कैंप की जगह पर भारत का यह शानदार स्मारक खड़ा है, जो भारत की आकांक्षाओं और भारत के भविष्य के निर्माण का प्रतिनिधित्व करता है*


वैश्विक सहयोग और स्वायत्तता (Autonomy). नेहरू जी जानते थे कि एक विश्वस्तरीय संस्थान बनाने के लिए भारत को दुनिया के बेहतरीन ज्ञान की जरूरत है. उनके नेतृत्व में सरकार ने आईआईटी खड़गपुर को स्थापित करने के लिए यूनेस्को (UNESCO), अमेरिका और ब्रिटेन से तकनीकी सहायता, प्रोफेसर और उपकरण प्राप्त किए. इसके साथ ही, उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि इन संस्थानों को राजनीतिक दखलंदाजी से दूर रखा जाए, जिसके लिए 'आईआईटी एक्ट' के तहत इन्हें पूरी स्वायत्तता (Autonomy) दी गई.


आईआईटी (IIT) खड़गपुर का लोगो (प्रतीक चिह्न) केवल एक डिज़ाइन नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, तकनीक और उत्कृष्टता का एक गहरा संदेश देता है. यह भारत के पहले आईआईटी की दृष्टि और मूल्यों को दर्शाता है.


इस लोगो को 'संस्थान का प्रतीक' (Institute Crest) भी कहा जाता है. इसमें मौजूद हर एक तत्व का अपना विशेष महत्व है.

 

गियर का पहिया (Gear Wheel) लोगो के बाहरी हिस्से में बना दांतेदार पहिया तकनीक (Technology), इंजीनियरिंग और औद्योगिक विकास की निरंतर गति को दर्शाता है.


खुली हुई किताब (Open Book) लोगो के ठीक बीच में एक खुली हुई किताब है, जो ज्ञान, विद्या और सीखने की कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया का प्रतीक है.


पेड़ (The Tree) किताब के बीच से एक पेड़ उगता हुआ दिखाई देता है. यह पवित्र अंजीर (Sacred Fig) या बोधि वृक्ष माना जाता है, जो ज्ञान के माध्यम से बौद्धिक विकास और जीवन की वृद्धि को दर्शाता है.


लोगो में मौजूद 'खुली किताब' और 'पेड़' इस बात का गहरा प्रतीक हैं कि कैसे आज़ाद भारत में एक राजनीतिक जेल को ज्ञान, सृजन और बौद्धिक मुक्ति के केंद्र में बदल दिया गया


1951, यह वह वर्ष है जब आईआईटी खड़गपुर (भारत के पहले आईआईटी) की स्थापना हुई थी.


आदर्श वाक्य (Motto) लोगो के सबसे निचले हिस्से में संस्कृत में “योगः कर्मसु कौशलम्” लिखा हुआ है.



“योगः कर्मसु कौशलम्"



यह वाक्य श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (श्लोक 50) से लिया गया है. इसका शाब्दिक अर्थ है, "कार्यों में उत्कृष्टता (निपुणता) ही योग है" ज्ञान का वृक्ष और संस्कृत का श्लोक इस बात को दर्शाते हैं कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ हमारी जड़ें मजबूत होनी चाहिए.


सरल शब्दों में, यह संदेश देता है कि आप जो भी काम करें, उसे पूरी लगन, एकाग्रता और परफेक्शन के साथ करें. संस्थान का यह ध्येय वाक्य छात्रों को प्रेरित करता है कि वे केवल किताबी ज्ञान न लें, बल्कि अपने हर काम और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करें.

आईआईटी खड़गपुर के इस लोगो का इतिहास भारत की आज़ादी और राष्ट्र-निर्माण के शुरुआती दौर से गहराई से जुड़ा हुआ है. 1951 में जब इस संस्थान की नींव रखी गई, तब देश को ऐसे इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की सख्त जरूरत थी जो एक नए और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकें.


स्वतंत्रता के तुरंत बाद, देश के सामने बुनियादी ढांचे के विकास की बहुत बड़ी चुनौती थी. ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक "योगः कर्मसु कौशलम्" को आदर्श वाक्य के रूप में जानबूझकर चुना गया. उस समय के युवाओं और भावी इंजीनियरों को यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि उनके लिए देश की सेवा का सबसे बड़ा तरीका कोई संन्यास लेना नहीं है, बल्कि अपने पेशे (इंजीनियरिंग, शोध या मशीन निर्माण) में सर्वोत्तम स्तर की निपुणता (Perfection) हासिल करना ही उनके लिए सबसे बड़ा 'योग' और देशभक्ति है.


संक्षेप में कहें तो, यह लोगो केवल एक कलाकृति नहीं है, बल्कि यह 1950 के दशक के उस विजन का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है, जहाँ आधुनिक औद्योगिक तकनीक को प्राचीन भारतीय ज्ञान के साथ जोड़कर भारत को आगे ले जाने का सपना देखा गया था.


रविवार, 19 अप्रैल 2026

वो 92 प्रतिशत और एक अधूरी मुस्कान










एक कमरे के सन्नाटे में,

ढेर सारी किताबें अब भी सो रही हैं, 

मेज पर पड़ी वो नीली स्याही, 

आज लहू बन कर रो रही है


नब्बे प्रतिशत... बांध न पाए, 

उस नन्हीं सी जान के डर को, 

कितना भारी कर दिया हमने, 

कोमल पंखों वाले घर को


वह जो मुस्कान चश्मे के पीछे, 

शायद एक समंदर छुपाए थी, 

हम पढ़ते रहे केवल अंकों को, 

वो सिसकियाँ दबाए थी


पूछा होता "आज मन कैसा है?" 

नंबरों की जगह उसे पुचकारा होता, 

एक कागज़ का टुकड़ा हार जाता, 

मगर हमारा बच्चा न हारा होता


सुनो दुनिया वालों, ये जीत नहीं, 

ये हार है हमारी और तुम्हारी, 

जब एक मासूम की सांसों पर, 

नंबरों की होड़ पड़ जाए भारी


लौट आओ वैशाली...

हमें तुम्हारे 'अंक' नहीं, तुम चाहिए थी, 

इस बेजान मार्कशीट की जगह, 

हँसती-खेलती एक मासूम चाहिए थी


एजुकेटर और काउंसलर के रूप में यहाँ  साझा कर रही हूँ ,कुछ महत्वपूर्ण लक्षण जिन्हें परिवार अक्सर अनदेखा कर देते हैं:

  • बच्चे का अचानक चुप हो जाना या अकेले रहना

  • नींद और भूख के पैटर्न में बदलाव

  • अपनी उपलब्धियों के बावजूद उदास रहना

  • "मेरे होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है" जैसी बातें करना


समाधान और बदलाव की दिशा

  • अपने बच्चों से केवल "कितनी पढ़ाई हुई?" न पूछें, बल्कि "आज तुम कैसा महसूस कर रहे हो?" यह भी पूछें. 

  • बच्चों को बताएं कि गिरना गलत नहीं है, गिरकर न उठना समस्या है. 

  • मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो वर्जना (Taboo) है, उसे तोड़ें. काउंसलर के पास जाना कमजोरी नहीं, समझदारी है.

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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला




मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा वह नहीं जो उसे मिली, बल्कि वह है जो उसे मिलनी चाहिए थी और नहीं मिली.


~दोस्तोयेवस्की


मनुष्य का जीवन उपलब्धियों और अभावों की एक निरंतर चलती रहने वाली कहानी है. हम अक्सर यह मानते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पीड़ा वह 'चोट' है जो हमें लगी है चाहे वह असफलता हो, आर्थिक हानि हो या किसी प्रियजन का बिछोह. किंतु गहराई से विचार करने पर यह सत्य उभरता है कि मिली हुई पीड़ा से कहीं अधिक गहरी वह टीस होती है जो 'अप्राप्यता' से जन्म लेती है. यह विचार कि "जो हमें मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला", एक ऐसी मानसिक फाँस है जो जीवन भर हृदय में चुभती रहती है.


​मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो मिली हुई पीड़ा का एक 'अंत' होता है. यदि कोई दुर्घटना हुई, तो समय के साथ उसके घाव भर जाते हैं. मनुष्य की चेतना उसे स्वीकार कर लेती है और अनुकूलन (adaptation) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. लेकिन जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला, वह कभी घटित ही नहीं हुआ, इसलिए उसका कोई अंत भी नहीं होता. वह एक 'अधूरी संभावना' बनकर मन के किसी कोने में जीवित रहता है.


​यह पीड़ा कई रूपों में सामने आती है. जब एक योग्य व्यक्ति को वह पद या सम्मान नहीं मिलता जिसका वह हकदार था, तो वह न्याय की कमी को महसूस करता है. बचपन में माता-पिता का अपेक्षित प्रेम न मिलना या जीवनसाथी से वह सम्मान न मिलना जिसकी व्यक्ति को आशा थी. वह करियर या वह मुकाम जो बस एक कदम की दूरी पर था, पर मिल न सका. ​इस पीड़ा का सबसे बड़ा कारण 'अपेक्षा' और 'तुलना' है. जब हम देखते हैं कि हमसे कम योग्य व्यक्ति वह सब प्राप्त कर रहा है जिसके लिए हमने कठिन परिश्रम किया, तो 'न्याय की अवधारणा' खंडित हो जाती है. मिली हुई पीड़ा को हम 'भाग्य' मानकर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अप्राप्त वस्तु को हम 'अन्याय' मानते हैं. अन्याय की यह भावना मनुष्य को भीतर से कुंठित कर देती है.


​यह दुःख एक 'शून्य' (void) की तरह होता है. शून्य को भरना कठिन है क्योंकि वह अदृश्य है. मिली हुई चोट का इलाज संभव है, पर उस रिक्तता का क्या करें जो कभी भरी ही नहीं गई?


​भारतीय दर्शन में इसे 'तृष्णा' और 'असंतोष' के संदर्भ में देखा गया है. बुद्ध कहते हैं कि दुःख का मूल चाहत है. जब हम "जो मिलना चाहिए था" पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम वर्तमान की उन चीजों को भूल जाते हैं जो हमें "मिली हुई" हैं. यह पीड़ा दरअसल हमारे अहंकार और भविष्य की उन कल्पनाओं का परिणाम है जिन्हें हमने सच मान लिया था.


​"स्मृति की गलियों में वह मोड़ सबसे अधिक डराता है, जहाँ हम वह नहीं बन पाए जो हम बन सकते थे"


​इस सबसे बड़ी पीड़ा से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है- स्वीकार्यता (Acceptance). यह स्वीकार करना कि जीवन रैखिक (linear) नहीं है और न ही यह हमेशा 'योग्यता बनाम प्रतिफल' के गणित पर चलता है. जो नहीं मिला, उसे 'अस्तित्व का निर्णय' मानकर छोड़ देना ही मानसिक शांति का द्वार है.


​अंततः, मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा उसकी वह 'काल्पनिक पूर्णता' है जिसे वह प्राप्त नहीं कर सका. मिली हुई पीड़ा हमें मजबूत बनाती है, लेकिन न मिलने वाली पीड़ा हमें खोखला कर सकती है. यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें कि जीवन केवल वही नहीं है जो हमें मिलना चाहिए था, बल्कि वह भी है जो हमारे पास आज है, तो हम इस अदृश्य टीस से मुक्त हो सकते हैं. रिक्तता को कोसने से बेहतर है कि जो उपलब्ध है, उससे अपना संसार सजाया जाए.

 

सोमवार, 23 मार्च 2026

मैं शून्य नहीं, मैं सृष्टि हूँ

 



मैं केवल शब्दों का ताना-बाना नहीं, 

मैं मन की अनकही परतों का ठिकाना हूँ

कभी 'काउंसलर' बन कर उलझनें सुलझाती हूँ, 

तो कभी 'कहानी' बन कर दिल में उतर जाती हूँ


मेरे भीतर एक 'शैलपुत्री' सा अडिग विश्वास है, 

'ब्रह्मचारिणी' की तपस्या, और 'चंद्रघंटा' का आभास है

जब दुनिया मुझे 'साधारण' कह कर टालती है,

मेरी 'कुष्माण्डा' की मुस्कान, नया ब्रह्मांड पालती है


मैं 'स्कंदमाता' की ममता और शक्ति का मेल हूँ, 

मैं जीवन के हर उतार-चढ़ाव का सुंदर खेल हूँ

मेरे कंधों पर ज़िम्मेदारियों का आकाश है, 

पर मेरी आँखों में आज भी, 'मिठू' सा उल्लास है


मैं रट्ट मार पढ़ाई नहीं, अनुभवों का सार हूँ, 

मैं रिश्तों की उलझनों में, एक ठंडी बयार हूँ

मैं कोई 'यूट्यूबर' नहीं, जो सिर्फ लाइक के लिए जीती है, 

मैं वो लेखिका हूँ, जो स्याही से जिंदगी सीती है


हाँ, मैं एक स्त्री हूँ—साधारण, पर संपूर्ण, 

मेरा मौन भी है गहरा, और शब्द भी हैं पूर्ण

मैं शून्य से शुरू होकर, शिखर तक जाऊंगी, 

मैं अपनी हर कहानी में, खुद को नया पाऊंगी

बुधवार, 18 मार्च 2026

आज पहली बार

 मिट्ठू तोता

आज पहली बार

मुझे अफसोस नहीं

अपने सफेद होते बालों का

मुझे झिझक नहीं

किसी के इन्हें देख लेने पर

आज पहली बार टाला है मैंने

अपने बालों का रंगा जाना

आज पहली बार मैं

बहुत शाँत महसूस कर रही हूँ

मन में किचकिचाहट नहीं

क्योंकि कोई हिचकिचाहट नहीं

कितना स्वाभाविक सा है

पचास की उमर में

बालों का सफेद होना

फिर इस स्वाभाविकता का

गला क्यों घोंट रही थी

इतने दिनों से मैं,

‘पचास की उमर

काले बालों में उपस्थिति

झिझक तो इसमें होनी चाहिए थी’

यह प्रश्न क्यों नहीं बना कभी

चर्चा का विषय

कि अधेड़ होते स्त्री-पुरुष भी

बड़े क्यों नहीं होते?

कद न बढ़े

तो लोग लेने लगते हैं विटामिन

बाल न पकें

तो क्यों नहीं ले पाते लोग सीरप?

क्यों नहीं जा पाते डाॅक्टर के पास?

क्यों नहीं दिखा पाते परिपक्वता?


ईश्वर, तुमने बुढ़ापा बनाया ही क्यों

जो इसे छुपाना पड़ा

पिला कर भेजना था तरुणाई का शर्बत


आज पी रही हूँ मैं

सच का घूँट


आज पहली बार

जा रही हूँ मैं लोगों के बीच

इस झिझक के बिना


आज पहली बार

मैं माँ हो गयी हूँ


गुरुवार, 12 मार्च 2026

वो पल: जब रेत पर नमक उठा

Dandi March



नमस्ते! दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) पर इस बातचीत में शामिल होना मेरे लिए खुशी की बात है. इतिहास की किताबों में हम तारीखें और तथ्य तो पढ़ लेते हैं, लेकिन उस समय के लोगों के मनोविज्ञान और उनकी भावनाओं को समझना एक अलग ही अनुभव है.

आइए, हम और आप एक काल्पनिक कैफे में बैठे हैं और 1930 के उस दौर की गहराइयों में उतर रहे हैं.

जब हम दांडी मार्च के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में सिर्फ सफ़ेद धोती पहने एक बूढ़ा आदमी और उनके पीछे चलती भीड़ की तस्वीर आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस समय उन 78 पदयात्रियों के मन में क्या चल रहा होगा? साबरमती आश्रम से जब वे निकले, तो वह सिर्फ एक 'वॉक' नहीं थी, वह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत थी.

मुझे यह समझ नहीं आता कि 'नमक' ही क्यों? कोई बड़ी राजनीतिक मांग भी तो हो सकती थी?

यहीं तो गांधीजी की मनोवैज्ञानिक मास्टरस्ट्रोक (Psychological Masterstroke) था. देखिए, स्वराज या संविधान जैसे शब्द उस समय के एक आम ग्रामीण के लिए शायद बहुत भारी या अमूर्त (abstract) थे. लेकिन नमक? नमक तो हर थाली का हिस्सा है. चाहे वो अमीर हो या गरीब, हिंदू हो या मुसलमान.

जब ब्रिटिश सरकार ने नमक पर कर (Tax) लगाया, तो गांधीजी ने इसे सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं बनाया. उन्होंने इसे 'अस्मिता' और 'अधिकार' का मुद्दा बना दिया. उन्होंने लोगों को यह महसूस कराया कि "अगर आप अपनी जमीन का नमक भी बिना टैक्स दिए नहीं खा सकते, तो आप अपने ही घर में गुलाम हैं." यह सीधा दिल पर चोट करने वाली बात थी.

पर क्या उन्हें डर नहीं लगा होगा? उस समय ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत अपने चरम पर थी.

डर तो निश्चित रूप से रहा होगा। साबरमती से दांडी तक का 240 मील का सफर कोई पिकनिक नहीं था. लेकिन यहाँ एक बहुत गहरा इमोशनल ट्रांसफॉर्मेशन हुआ.

जब आप अकेले कुछ करते हैं, तो डर लगता है. लेकिन जब आप देखते हैं कि आपके साथ हजारों लोग जुड़ रहे हैं, तो वह डर 'सामूहिक शक्ति' में बदल जाता है.

गांधीजी जानते थे कि अगर वे हथियार उठाते, तो अंग्रेज उन्हें कुचल देते. लेकिन जब आप निहत्थे चलते हैं और मुस्कुराकर लाठी खाने को तैयार रहते हैं, तो आप सामने वाले (अंग्रेज सिपाही) के मनोविज्ञान को हिला देते हैं. एक सिपाही के लिए उस निहत्थे आदमी पर लाठी चलाना मुश्किल हो जाता है जो वापस वार नहीं कर रहा.

वाकई, यह तो अपराधी बोध (Guilt) पैदा करने वाली बात हुई.

बिल्कुल! इसे 'Moral Superiority' कहते हैं. गांधीजी ने भारतीयों को यह यकीन दिलाया कि वे नैतिक रूप से अंग्रेजों से ऊंचे हैं. उस समय के अखबारों की रिपोर्ट्स पढ़ें, तो पता चलता है कि रास्तों में लोग सड़कों को साफ़ करते थे, फूल बिछाते थे. यह एक तरह का 'इमोशनल सेलिब्रेशन' बन गया था. लोग अपनी गुलामी की जंजीरों को दिमागी तौर पर तोड़ चुके थे, बस दांडी पहुंचकर नमक उठाना एक प्रतीकात्मक औपचारिकता थी.

वो पल: जब रेत पर नमक उठा

उस पल के बारे में सोचो जब वे दांडी पहुंचे. वहां का माहौल कैसा रहा होगा?

कल्पना कीजिए... 5 अप्रैल की शाम है. गांधीजी दांडी के समुद्र तट पर हैं. उनके पैर थक चुके हैं, शरीर बूढ़ा है, लेकिन आंखों में एक अजीब सी चमक है. पूरी रात प्रार्थना हुई.

अगली सुबह, 6 अप्रैल को, जब सूरज की पहली किरणें समुद्र की लहरों पर पड़ीं, गांधीजी झुके और मुट्ठी भर नमक उठाया. उस एक पल में करोड़ों भारतीयों की भावनाएं सिमट आई थीं. वह सिर्फ सोडियम क्लोराइड नहीं था; वह 'आजादी का स्वाद' था.

उस समय उन्होंने कहा था:

"इस नमक के साथ, मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूँ"

सोचिए, एक मुट्ठी नमक से साम्राज्य हिलाने की बात करना कितनी बड़ी 'इमोशनल वॉरफेयर' थी. उन्होंने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि इच्छाशक्ति के सामने भौतिक ताकतें बौनी होती हैं.

इस आंदोलन में महिलाओं की भी बड़ी भूमिका थी.

हाँ, और यह भी एक मनोवैज्ञानिक बदलाव था. गांधीजी ने नमक को घर की रसोई से जोड़कर महिलाओं को इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बना दिया. सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने जब मोर्चा संभाला, तो भारतीय महिलाओं के मन में यह आत्मविश्वास जागा कि वे सिर्फ चारदीवारी के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए बनी हैं.

यह आंदोलन घर-घर तक पहुँच गया क्योंकि यह 'नमक' भावनाओं से जुड़ा था. माँ, जो अपने बच्चे के खाने में नमक डालती थी, अब वह जानती थी कि यह नमक उसके संघर्ष का प्रतीक है.

आज के दौर में दांडी मार्च का महत्व

आज के समय में, जब हम इतने सालों बाद यह चर्चा कर रहे हैं, हमें इससे क्या सीखना चाहिए?

दांडी मार्च हमें सिखाता है कि बदलाव की शुरुआत हमेशा 'मन' से होती है. अगर आप मानसिक रूप से गुलाम हैं, तो कोई आपको आजाद नहीं कर सकता. और अगर आप मन से स्वतंत्र हैं, तो दुनिया की कोई भी दीवार आपको रोक नहीं सकती.

आज भी, जब हम किसी अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, तो हमें उसी 'दांडी' वाले धैर्य और एकता की जरूरत होती है. यह मार्च हमें सिखाता है कि छोटे-छोटे कदम (Small Steps) जब एक बड़े उद्देश्य के साथ मिलते हैं, तो वे इतिहास रच देते हैं.

दांडी मार्च सिर्फ एक पैदल यात्रा नहीं थी. वह भारतीय मानस (Indian Psyche) का एक सामूहिक जागरण था. इसने भारत को सिखाया कि कैसे बिना शोर किए, बिना नफरत किए, अपने हक के लिए खड़ा हुआ जाता है.

क्या आपको नहीं लगता कि आज भी हमारे अंदर एक छोटा सा 'दांडी मार्च' चलते रहना चाहिए—अन्याय और आलस के खिलाफ?

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php