ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!
To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
कौमार्य का मादक सा हँसना
मन मदन है देह वायु
भूमिजा अपलक नयन है
कर्ण कुंतल नासिका मणि
कटिबंध पर आंचल हरण है
क्षीर का बांका कोई अब
थामे नीर कंचन कामिनी को
चपलता, लालित्यता को
रुपसी मृगनयनि को
मुख लजाती माधुर्य करती
रति में रति का आवरण है
दृग से दृग का ज्यों हो मिलना
रेख अधरों का संवरना
दृष्टि में उतरा वसंती
कौमार्य का मादक सा हँसना
भाव गूँथे वेणियों में
केश बिच यामिनी का अंतरण है
रविवार, 25 जनवरी 2026
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
विद्या और चेतना का संगम: सरस्वती पूजा का मनोविज्ञान
वसंत पंचमी के दिन मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव मानस और ज्ञान के प्रति हमारे दृष्टिकोण का एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रतिबिंब है. वैदिक काल में जहाँ सरस्वती को 'नदी' के रूप में जीवनदायिनी माना जाता था, वहीं आज वे 'ज्ञान और वाणी' के रूप में हमारी बौद्धिक चेतना को सींचती हैं.
बौद्धिक जागृति का पर्व
मनोवैज्ञानिक रूप से, सरस्वती पूजा 'सर्दियों की जड़ता' से 'वसंत की सृजनात्मकता' की ओर संक्रमण का प्रतीक है. जिस प्रकार प्रकृति इस समय नए पत्तों और फूलों के साथ खुद को पुनर्जीवित करती है, उसी प्रकार यह त्यौहार मनुष्य को अपनी संज्ञानात्मक क्षमताओं (Cognitive Abilities) को ताज़ा करने का अवसर देता है. छोटे बच्चों के लिए 'विद्यारंभ' का संस्कार उनके कोमल मस्तिष्क में यह संदेश अंकित करता है कि सीखना एक पवित्र और उत्सवपूर्ण प्रक्रिया है, न कि कोई बोझ.
पीले रंग का मनोविज्ञान: स्पष्टता और ऊर्जा
इस उत्सव में पीले रंग की प्रधानता होती—पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले पकवान. रंग मनोविज्ञान (Color Psychology) के अनुसार, पीला रंग एकाग्रता, आशावाद और मानसिक स्पष्टता को बढ़ावा देता है. यह रंग मस्तिष्क के 'लेफ्ट हेमिस्फीयर' (तार्किक पक्ष) को उत्तेजित करता है, जिससे नई अवधारणाओं को सीखने और समझने की क्षमता बढ़ती है. यह रंग सामूहिक रूप से एक 'सकारात्मक मनोवैज्ञानिक माहौल' तैयार करता है.
विश्राम और पुनरावलोकन (Incubation Effect)
पूजा के दिन अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को देवी के चरणों में रखकर पढ़ाई से अवकाश लेने की परंपरा का एक ठोस मनोवैज्ञानिक आधार है. इसे मनोविज्ञान में 'इन्क्यूबेशन इफेक्ट' कहा जाता है. जब हम किसी कठिन समस्या या निरंतर अध्ययन से थोड़ा ब्रेक लेते हैं, तो हमारा अवचेतन मन उस जानकारी को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करता है. यह एक दिन का विश्राम छात्रों को मानसिक थकान (Burnout) से बचाता है और अगले दिन नए उत्साह के साथ लौटने की प्रेरणा देता है.
प्रतीकों के पीछे का मानसिक संतुलन
देवी सरस्वती के हाथ में वीणा जीवन में सामंजस्य और लय का प्रतीक है, जबकि हंस (नीर-क्षीर विवेक) सही और गलत के बीच भेद करने वाली 'निर्णायक बुद्धि' का प्रतिनिधित्व करता है. आज के सूचना विस्फोट (Information Overload) के युग में, सरस्वती पूजा हमें यह सिखाती है कि केवल सूचना एकत्रित करना पर्याप्त नहीं है; उसे ज्ञान में बदलने के लिए विवेक की आवश्यकता है.
सरस्वती पूजा हमारे भीतर के 'सीखने वाले' (Learner) को जीवित रखने का एक वार्षिक अनुष्ठान है. यह हमें सिखाता है कि विनम्रता और अनुशासन ही ज्ञान प्राप्ति के द्वार हैं. यह पर्व भारतीय जनमानस को यह विश्वास दिलाता है कि अंधेरे को मिटाने का एकमात्र तरीका 'अक्षर' और 'स्वर' की ज्योति जलाना है.
गुरुवार, 22 जनवरी 2026
आईने वाली राजकुमारी- एक लंबी कहानी: पहला भाग
"तो आप आज ये प्रमाणित कीजिए कि आप हमारी मित्र हैं"
"इसके लिए क्या करना होगा हमें?"
"हम आज मयूरी विहार जाना चाहते हैं, आप अनुमति दीजिए"
"बस कुछ क्षण प्रतीक्षा कर लो. तुम्हारे भाई सा आ रहे होंगे"
"नहीं, हम अभी इसी क्षण और अपने चेतक पर अकेले जाना चाहते हैं"
"यह इच्छा हम पूरी नहीं कर सकते"
..
"यह मत भूलो कि तुम सौंदर्य कला से पूर्ण एक युवती भी हो"
"परन्तु अपनी सुरक्षा तो कर सकते हैं"
"कुछ भी हो… महाराज के आने तक तुम्हें ठहरना ही होगा"
"ठीक है हम भी अब अन्न जल तब तक नहीं ग्रहण करेंगे, जब तक महाराज नहीं आते"
"पुत्री तुम नाहक ही वाद कर रही हो"
"माँ सा… हमारा चेतक बाहर प्रतीक्षा कर रहा"
"हम निर्लज्ज तो नहीं आप निर्मोहिनी अवश्य प्रतीत होती हैं. एक भटकते हुए पथिक पर तनिक भी दया नहीं"
"दया या निर्दयता का कोई प्रश्न ही नहीं. आइये हमने झील का स्थान रिक्त कर दिया. जल गृहण कीजिए"
"ऐसे नहीं राजकुमारी हम तो आपकी अंजुरि से गृहण करेंगे"
"आप तो बहुत हठी प्रतीत होते हैं"
वेश भूषा और वार्तालाप से पूरा संकेत मिल रहा था कि वो एक साधारण व्यक्ति न होकर राजकुमार हैं.
"तो आप द्वैत गढ़ की राजकुमारी हैं?" उन अपरिचित ने प्रश्न कर राजकुमारी का ध्यान भंग करने की चेष्टा की.
"हम किन शब्दों में अपना परिचय दें तो आप समझेंगे?"
राजकुमारी ने भी अपनी हठ नहीं छोड़ी.
"आप अपनी जिह्वा को अधिक विश्राम नहीं देती हैं?"
"आप प्रश्न अधिक नहीं करते हैं?"
"हमें आपके प्रत्युत्तर भाते हैं"
राजकुमारी के नेत्रों में न परन्तु हृदय पर हाँ की छाप लग चुकी थी.
"आप यहाँ आती रहती हैं क्या?"
"हम क्यों बताएँ?"
"हम पूछ रहे क्या ये कारण पर्याप्त नहीं?"
"आप तो हमसे ऐसे कह रहे जैसे हमारे सखा हों!"
"आप हमारी सखी तो हैं"
"हमने कब ऐसा कहा? हम तो आपसे वार्तालाप नहीं कर रहे"
"वार्तालाप तो आप अब भी कर रहीं और तो और हमें अंजुरि में जल भरकर दिया"
"बात करने का तो कुछ और ही प्रयोजन है और जल देकर तृषा बुझायी"
"आपको देखते ही रेत का एक जलजला हमारे भीतर ठहर गया और आप कहती हैं तृष्णा बुझ गयी"
"आप हमें बातों के जाल में उलझा रहे हैं"
"आपके नेत्रों ने हमारा आखेट किया है"
"यह कैसा आरोप है?"
"क्या प्रमाण नहीं चाहेंगी?"
"---"
"हमें अनुमति दीजिए कि हम आपके हृदय के स्पंदन की अनुभूति कर आपको प्रमाण दे सकें!"
"हमारा हृदय...स्पंदन...प्रमाण...बेसिरपैर की बात कर रहे हैं आप"
"विवाद नहीं सुंदरी अनुभव कीजिए"
.
"तुम चेतक के साथ दौड़ की स्पर्धा करने गयीं थी क्या?"
"क्यों माँ सा, आपने ये प्रश्न क्यों किया? हम तो चेतक की लगाम थामकर उड़ते चले आए"
"तुम्हारी बढ़ी हुई श्वांस को देखकर कहा. कहीं कुछ अघटित तो नहीं घटित हुआ?"
"कैसा अघटित माँ सा? वैसे भी जो होता है वो पूर्व निर्धारित ही होता है फिर उसे अघटित क्यों कहें?"
"राजकुमारी हम आपके बिखरे केशों को सुलझा दें. अगर न चाहें तो शृंगार न करवाईयेगा"
"नहीं गेंदा रहने दे. उलझनें तो जीवन में हैं, क्या-क्या सुलझायेगी"
"पहले केश फिर कुछ और…" इस पर दोनों मुस्करा दीं. राजकुमारी अपने शयनकक्ष के एक कोने में लगे आईने के सामने बैठ गयीं.
"नहीं मानती है तो आ जा बना दे केश" गेंदा अपने दोनों हाथों में चमेली का तेल लेकर राजकुमारी के केशों में लगाने लगी.
"राजकुमारी जी, एक बात पूछें?"
"हाँ बोलो गेंदा"
"उलझनें तो उनको होती हैं जो प्रेम में होते हैं"
"अच्छा तुझे तो बड़ा पता है"
"नहीं हमने देखा है न"
"क्या देखा है बोल"
"कुछ नहीं" कहकर गेंदा चुपचाप तेल लगाने लगी. राजकुमारी बहुत कुछ सोचने पर विवश हो गयीं.
.
"हम अपनी बहना को न देखें ऐसा कभी हुआ है क्या?"
"आज अभी हुआ न! जाइये हम आपसे बात नहीं करते"
"अच्छा...कितनी देर के लिए?" भाई सा ने बहना को अपने पास बिठाते हुए पूछा.
"हुँह"
"क्या? हमारे कारण ऐसा हुआ? फिर क्या हुआ?"
"फिर उसने एक जादूगर की सहायता से हमारे प्राण इस तोते में बंद कर दिए"
"और आपका शरीर?"
"हमारा शरीर उस जादूगर के पास है"
"आने वाली अमावस्या की रात वो जादूगर हमारे शरीर की बलि दे देगा"
"ऐसा मत कहिए राजकुमार. हम यह नहीं होने देंगे"
"क्या ही कर पाओगी तुम?"
"अभी तो अमावस्या की रात में पूरे १५ दिन हैं. बस आप हमारा साहस बने रहिए"
पहुँचते ही राजकुमारी ने यह क्या देख लिया उनके भाई सा व्यग्रता से इधर-उधर टहल रहे हैं.
"भाई सा क्या बात हुई भला, आप चिंतित से लग रहे?"
"लगता है हमारी बहना ने हमारे मन की सुन ली. तुमसे कुछ वार्तालाप करनी थी हमें"
"अब इसके लिए भी आपको इतना सोचना पड़ेगा अथवा किसी से अनुमति लेनी होगी?"
"नहीं हमारा वो तात्पर्य नहीं" इतना कहते ही राजकुमार जैसे ही पीछे मुड़े उनकी हँसी छूट गयी.
"क्या हुआ भाई सा? हँसी क्यों आ गयी?"
"दर्पण...दर्पण वाली राजकुमारी"
"आ वो…" अचानक राजकुमारी को याद आया तोते को अंदर करने में वो अपना दर्पण उतारना ही भूल गयीं.
"याद आया, हमने ही कहा था अपनी सूरत देखने के लिए दर्पण साथ में रखा करो. तुमने तो गले में ही लटका लिया"
दोनों ही हँस पड़े.
"अच्छा भाई सा अपनी व्यग्रता का कारण तो बताइये हमें"
बुधवार, 21 जनवरी 2026
एक जोड़ा उम्मीद
सोमवार, 19 जनवरी 2026
और प्रदूषण मत फैलाओ
मैं हवा हूँ
उठाती हूँ गिराती हूँ
नज़र नहीं आती हूँ
प्रदूषित नहीं होना चाहती हूं
मुझे बचाओ
प्रथ्वी के प्राणियों मुझे नज़र न लगाओ
मुझे बचाओ
मैं जल हूँ
घर से नदी-नालों तक
करता कल-कल हूँ
उत्तर से दक्षिण तक
चलता पल-पल हूँ
मुझमें कचरा न फैलाओ
मुझे बचाओ
घने बादल न चुराओ
मुझे बचाओ
मैं जंगल हूँ
वृक्ष-वृक्ष से मैं बनता
तूफानों में सीधा तनता
औषधि, वायु और फूल-फल
लेती मुझसे सारी जनता
मुझ पर आरी न चलवाओ
मुझे बचाओ
मैं तारा हूँ
रातों का दुलारा हूँ
खो गया चकाचौंध में
खोज पाओगे, तो प्यारा हूँ
मैं सूरज हूँ
आता हर रोज हूँ
ग्रीष्म में दिखाते हो आँखें
शीत में खोज हूँ
मैं चंदा
कहलाता मामा हूँ
और हूँ अच्छा बंदा
मैं धरती हूँ
माता कहते मुझको
मेरे बच्चों, तुम्हारा भार सहती हूँ
मुझसे हवा, जल, जंगल न चुराओ
मुझे बचाओ
सब की सखी
तुम सभी के जैसी
मैं भी हूँ दुःखी
मैं पर्वत अरावली
लेकर मशीनें घूम रहे तुम
मैं सीना तान खड़ा हूँ
तुम सबके लिए
प्रदूषण से लड़ा हूँ
अब तुम मुझी से लड़ रहे हो
कर जीवन को मरण रहे हो
मैं मानव
मुझे इतना न करो लज्जित
मैं सबसे पराजित
लेता हूँ शपथ
स्वच्छ रखूँगा जगत
त्राहिमाम न करो
मुझे अपनी शरण लो
यदि जंगल कटे तो औषधि नहीं
पर्वत कटे तो परिधि नहीं
सूरज चाचू, चंदा मामा, धरा हमारी माता है
मौसम और जलवायु से गहरा हमारा नाता है
जिसने हमको जीवन दिया, उसे बचाने की बारी
कसकर कमर कर ली है तैयारी
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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•स्मृति क्या है? °बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि •शोर क्यों स्वर क्यों नहीं? °जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म...
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•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...
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मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...
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