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बुधवार, 10 मार्च 2021

आओ शिव उद्धार करो




जब प्रेममयी धरा छलकी

तब अम्बर गहराया नभ पे

नदिया लहर निचोड़ चली

तो सागर भी रोया छल से

ज्यों वायु किलोरे मार रही

त्यों रुप प्रसून बिसूर रहा

यूँ प्रेमी हिया में आस जगी

के प्रेम का आविर्भाव हुआ


फिर प्रेम चला मुँह मोड़ एक दिन

रुठ गये खुशियों के सब पल-छिन

प्रेमी मन का प्रकट चीत्कार हुआ

कलुषित वेदना का यलगार हुआ


यूँ अगन जली हिमशिला गली

आहत हठ, भागीरथ फिसली

इक गंगा प्रलय की ओर चली

हाहाकार मचाने को, निकली


है आस शिव रौद्र रुप गर्जन वाली

किस तरह जटा में प्रलय सम्हाली

करबद्ध जप रहे हैं, सब नाम प्रभु

दिखला दो छवि अब वही निराली

मेरी पहली पुस्तक

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