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रविवार, 26 जुलाई 2020

प्रभु शरण



कि बढ़ चले पुकार पर

त्रिशूल रख ललार पर

जो मृत्यु भी हो राह में

कर वरण तू कर वरण


हो पार्थ सबकी मुक्ति में

रख हौसले को शक्ति में

जो शत्रु को पछाड़ दें

वो तेरे चरण, तेरे चरण


जब तेरे आगे सर झुकें

हाथ कभी रिक्त मिलें

बाधाओं से टकरा के

बन करण तू बन करण


पछाड़ दे तू हर दहाड़

ऐसी हो तेरी हुँकार

चीर किसी द्रोपदी का

ना हो हरण, ना हो हरण


न हो जटिलता का अंत

बस मौन रहे दिग-दिगन्त

हो पथ का भार तेरे सर

प्रभु शरण ले प्रभु शरण

रविवार, 19 जुलाई 2020

शब्द ही शिव हैं


शब्द ही शिव हैं
कभी प्रेम के रचे जाते हैं
कभी उद्वेग
तो कभी अंत के.

आच्छादित करते हैं
मन की तृष्णा को
समय के बहाव
और नदी के वेग को.

है शब्द का अमरत्व ये
कर में सरल है
दिमाग में भुजंग हैं
मन में महत्वहीन बन जाते हैं.


कविता का शीर्षक माननीय अनूप कमल अग्रवाल जी "आग" के शब्दों से उद्धत है 🙏


शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

मैं स्मरण हूँ...


गंगा को समेटे
रखता हिमालय पे चरण हूँ,
नख से शिख तक करता
भभूत का वरण हूँ,
मैं इस सदी का
दूसरा संस्करण हूँ,
ध्यानी हूँ, दानी हूँ
और स्वाभिमानी हूँ
तांडव है मेरा मनोरम
सती का विधाता हूँ
बसता हूँ कन्दराओं में
हर मर्म का ज्ञाता हूँ
खाल को आभूषण बनाए
सौंदर्य का अलंकरण हूँ,
रंगों में नीलकंठ औ
भुजंग को लपेटे हूँ
हैं नेत्र तो कुल तीन
सारी दृष्टि मैं समेटे हूँ
भाल पे है चन्द्रमा
कान नागफनी छाई हैं
पुण्य भगीरथ के तप का
पाप धोने गंगा बुलाई हैं
दो पाँवों से करता तांडव
तीन लोकों का संचरण हूँ

मेरी पहली पुस्तक

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