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रविवार, 26 जुलाई 2020

प्रभु शरण



कि बढ़ चले पुकार पर

त्रिशूल रख ललार पर

जो मृत्यु भी हो राह में

कर वरण तू कर वरण


हो पार्थ सबकी मुक्ति में

रख हौसले को शक्ति में

जो शत्रु को पछाड़ दें

वो तेरे चरण, तेरे चरण


जब तेरे आगे सर झुकें

हाथ कभी रिक्त मिलें

बाधाओं से टकरा के

बन करण तू बन करण


पछाड़ दे तू हर दहाड़

ऐसी हो तेरी हुँकार

चीर किसी द्रोपदी का

ना हो हरण, ना हो हरण


न हो जटिलता का अंत

बस मौन रहे दिग-दिगन्त

हो पथ का भार तेरे सर

प्रभु शरण ले प्रभु शरण

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर और उपयोगी सृजन।

अभिलाषा ने कहा…

आभार आपका!

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

अभिलाषा ने कहा…

आभार मान्यवर!

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