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रविवार, 6 जुलाई 2025

अहमदाबाद टु लंदन

 •एक उचाट सा मन लिए

कोने कोने घूमता हूँ

मैं गैटविक हवाई अड्डा

हर गुज़रने वाले चेहरों में

ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ

जो उस रोज उड़ा था

सरदार वल्लभभाई पटेल हवाई अड्डे से

एक सामान्य सी उड़ान “अहमदाबाद टु लंदन”

मगर पहुँच न पाया

न ही कभी पहुँचेगा

कुछ तो हुआ होगा असामान्य

कि वो नहीं पहुँचा अपने गंतव्य

सबने कंधे झाड़ लिए कहकर

‘सब कुछ तो ठीक था हमारे एण्ड से’

फिर क्यों हुआ उसका द एण्ड

आस थी भरपूर उसके डैनों में

अपनी इच्छा का आसमान मापने की

फिर क्यों न चल सकी

दस घंटों की उड़ान दस मिनट भी

ध्वस्त हो गये प्रतीक्षांकुर

हँसी मरी

दुःख जमा

पिघल गयी आँसुओं की लैबोरेट्री

देहों का खून हो गया काला

दरकी खिड़कियों पर पसरी गूँज

दरवाजों ने फेंके क्षत विक्षत शव

दुत्कारे गये प्रार्थनाओं के नियम

इतनी निष्ठुर नियति

कि निगल गयी

एक उस दोपहर के साथ अंतहीन दिनों को

कुछ जीवन से विदा हो गया

भोर का लालित्य

सांझ का स्मित

बदले में देकर अवसाद का ब्लैकहोल


सोचो मौन के दीर्घायु होने से पहले

कितना चीखी होगी बेबसी


एक ग़ैरजरुरी बात की तरह

कितनी जल्दी भुला दिया तुमने


कैसे भूल गये तुम

और कैसे भूल जाऊँ मैं

मेरी छाती पर लोटती है फुसफुसाहट

कि वो नहीं आये

शापित महसूसता हूँ


कौन देगा मुआवजा

मेरी उम्मीद को ओवरटाइम का

जो सुस्ताती नहीं, रुकती भी नहीं

मैं गैटविक हवाई अड्डा, लंदन

उन आगंतुकों की फाइल्स में

तमाम थ्योरीज पढ़कर भी नहीं होऊँगा संतुष्ट

जिनकी पदचाप जब्त कर गया समय

जिन्हें घटना था

मगर घटकर रह गया

सामान्य तो नहीं हो सकता

एक साथ इतनी पदचापों का ठहर जाना

किसने रोका होगा

किसने किया होगा स्वागत

रुकने से पहुँचने के अंतराल तक

जाते हुओं को यदि कोई दे सका प्रगाढ़ आलिंगन

तो वो थीं उस छात्रावास की दीवारें, छत

और वो चुनिंदा लोग

जो कल चिकित्सक कहलाते

उन्हें भी असमय पहनना पड़ा

मृत्यु का ताबीज


मेरी आतुरता

कातर दृष्टि में कलप कर रह गयी

जीवन के सिलेबस में

अजीवित हो जाने की ऐसी दारुण कथा


कभी कभी लगता है

कि मनुष्यों को बनाकर ईश्वर

स्वयं भी सीख रहा है मनुष्य होने की कला

भाव प्रणव मनुज से अनसाॅल्व्ड रुब्रिक तक की

अकथनीय टीस का मर्म

जरुर सुलझा सकोगे तुम

पर बागेश्वर से ग्रोक तक

कोई मत कहना

कि तुम्हें सब है पता

इंसान होकर इंसान बने रहने को चाहिए

टाइटैनियम का कलेजा

फिर मेरे वेटिंग एरिया में भी हो सकेगा 

दर्द का एटमिक टेस्ट




शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

एक पिता की चुपचाप मौत

मूक हो जाते हैं उस पिता के शब्द
और पाषाण हो जाती है देह
जो अभी-अभी लौटा हो
अपने युवा पुत्र को मुखाग्नि देकर.
न बचपन याद रह जाता है
न अतीत की बहँगी में लटके सपने
आँखें शून्य हो जाती हैं
ब्रह्मांड निर्वात,
बूँद-बूँद रिसता है दर्द का अम्ल
हृदय की धमनियों से,
सब कुछ तो है
और कुछ भी नहीं है,
फफक पड़ती है मेरु रज्जु
किस पर झुकेगी बुढ़ापे में,
रिस जाती है फेफड़ों की नमी
किन हाथों में थमाएगा दवा का पर्चा,
सहसा ही निकाल फेंकता है
आँखों पर लगा चश्मा
कि बचा ही क्या दुनिया में देखने को;
अंत्येष्टि कर लौटा पिता
मरघट हो जाता है स्वयं में
हर आग चिता की तरह डराती है उसे,
चुकी हुई रोटी की भूख
चिपका देती है उसकी अंतड़ियाँ,
पल भर में लाश बने उस देह की आग ठंडी होने तक
मर चुका होता है पिता भी;
बची-खुची देह भी समा जाना चाहती है
किसी कूप में
जब जमाना करने लगता है
पाप और पुण्य का हिसाब-किताब.

सोमवार, 23 जुलाई 2018

तब भी हम होंगे...


PICTURE CREDIT:SHUTTERSTOCK

हमारे बाद हम...
क्या कहा
कहीं नहीं होंगे????
धत्त्तत..
तभी तो हम होंगे
जब भी खोलोगे यादों को
जंग लगी चूलें चरमराएँगी,
तुम उस बहँगी में लटके मुस्कराओगे,
न्यूटन की बातों में कितने टन का वजन था
हमें क्या पता
मगर बात पते की और वज़नी थी,
वो जो गुरुत्व होता है न
सारा का सारा आत्मा में होता है
ये तो धरती की छाती है
जो हमें रोके रखती है अपने ऊपर;
मन को भी न, समझो इसी तरह
चेहरे तो बहुतेरे देखे जीवन भर
हमसे अच्छे और सुंदर भी
पर आकर्षण तो मन का था,
और तब तुम
समझौते की तुला में
हमारा अपनापन न तोल पाओगे
कि हर आत्मा एक दिन निःश्वास होती है;
तुम्हारी चीखें घुट रही होंगी,
तुम तो विलाप भी न कर पाओगे
हमारी मृतप्राय काया पर,
जब हमें नहलाया जा रहा होगा
कफ़नाने को
तुम चिल्लाओगे...
'बहुत डरती है वो ठंडे पानी से..'
फिर हमारी स्थूल सी देह
बांस की डोली में लिटाओगे
शोक कम करने को
राम-नाम....बोलते जाओगे,
करने से पहले हमको अग्नि में समर्पित
तुम वो कड़वाहटें जलाओगे
जो हमको अक्सर रुलाती थीं,
कुछ हमारी गलतियाँ थीं
बाकी तुम्हारी ज़िद
जो आज बोल रही हैं,
हम कल तक एक हस्ताक्षर थे
आज दस्तावेज हो गए,
काश, कि साँसें रहते 
जीवन जी लिया होता!

सोमवार, 22 जनवरी 2018

मैं मृत्यु हूँ...

GOOGLE IMAGE

कोई भी मुझे जीत नहीं सकता 
मैं अविजित हूँ,
गांडीव, सुदर्शन, ब्रह्मास्त्र हो या
ए के-47...56
इनकी गांधारी हूँ मैं,
समता-ममता, गरिमा-उपमा
मद, मोह, लोभ-लालच,
ईर्ष्या, तृष्णा, दया,
शांति...आदि 
सभी उपमाओं से परे हूँ;
मेरा वास हर जीवन में है
जन्म के समय से पहले ही
मेरा निर्धारण हो जाता है
बूढ़ा, बच्चा और जवान 
मैं कुछ भी नहीं देखती
क्योंकि मैं निर्लज्ज हूँ;
गरीबी-अमीरी कुछ भी नहीं है
मेरे लिए,
दिन क्या रात क्या,
झोपड़ी, महल और भवन
इनके अंदर साँसे लेता जीवन
मेरी दस्तक से ओढ़ता है कफन
इमारतें हो जाती हैं बियाबान
मंजिल है हर किसी की
बस शमशान;

GOOGLE IMAGE
..........
अगर नहीं किया मेरा वरण
तो कैसे समझोगे प्रकृति का नियम
बिना पतझड़
कैसे होगा बसंत का आगमन,
पार्थ को रणक्षेत्र में
मिला है यही ज्ञान
मौत से निष्ठुर बनो
न हो संवेदनाओं का घमासान
गर डरो तो बस इतना कि 
मैं आऊँ तो मुस्करा कर मिलना
अभी और जीना है
अच्छे कर्म करने को
ये पश्चाताप मन में न रखना,
मेरा आना अवश्यम्भावी है
मैं कोई अवसर भी नहीं देती,
दबे पाँव, बिन बुलाए
आ ही जाऊंगी
करना ही होगा मेरा वरण
फिर क्यों नहीं सुधारते ये जीवन
पूर्णता तो कभी नहीं आती
अंतिम इच्छा हर व्यक्ति की
धरी ही रह जाती है,
पूरी करते जाओ
अंतिम से पहले की हर इच्छाएं,
ध्यान रखो 
औरों की भी अपेक्षाएं:
मैं तो आज तक
वो चेहरा ढूंढ रही हूँ
जिसके माथे पर
मेरे डर की सिलवटें न हों,
जिसके मन में
'कुछ पल और' जीने की
इच्छा न हो!

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php