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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

आओ न प्रेम को अमर कर दो

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तुम्हारे लिए कोई कसम न हो
फिर भी पूरा जनम है
सात फेरे न सही
हम तेरे तो हैं,
सुहाग का चूड़ा, बिछुआ, महावर
आरती का थाल
सब कुछ सजाया है
अब मान भी जाओ हमारी मनुहार
आज चंदा को अपनी नथ बनाना है
चाँदनी की पालकी में
प्रेम डगरिया जाना है,
पीपल की ओट से
स्नेह का दिया मत दिखाना
छत पर चाँद उतरने का भ्रम मत बनाना,
हमें तो दूर आसमानों में फैली
वो लाली चाहिए,
पूरा चाँद तो तुम ही हो मेरे;
कभी मन में पसर जाती है
उम्मीदों की अमावस
तब तुम्हीं तो हो न जब आँखें झुकाकर
स्वीकारोक्ति देते हो
अपने होने की, हमारे साथ हर पल,
हम नेह के सूत पर
आँखें मूँदकर चल पड़ते हैं,
तुम्हारा होना हमारे मन का उजाला जो है,
तुम हो तो हम हैं
अब आओ भी
मन कितना प्रेम-पिपासु हो रहा,
शब्दों के छज्जे पर
इसकी वय न ढ़लाओ,
श्री-गणेश कर दो कि
मन से मन का एकाकार तो हो गया
देह को हमारे नाम से मुक्त कर दो
हमें पतिता बना दो,
समा लो हमें खुद में
समर्पण का गठबंधन करा दो,
सोंख लो बून्द-बून्द हमारे कौमार्य की
हमें ईश की ब्याहता बना दो
बहुत हो गया बातों का परिणय
अब तो हमें अमरपान करा दो!

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

ख़ुदा हाफ़िज़

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ज़िन्दगी चाहती है एक बदलाव मुक़म्मल
गर खो जायें तो अब इंतज़ार मत करना।



रेत के घरौंदों सी ढह गयीं ख्वाहिशों की इमारतें
दर्द मुक़द्दस तू कहीं खुद में समा ले मुझको।



तू गया औ जीने का सामान भी ले गया
रुक ये कलम ये सियाही तो मुझे दे दे।

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

बस इतनी सी ख्वाहिश थी मेरी
तुम सबकी खुशी में शामिल रहो
मग़र ए ज़िन्दगी!
तुम्हारी खुशी तो
मेरी मय्यत पर भी
मुकम्मल नहीं,
अब क्या करूँ इस रूह का
जो जनाज़े को तरसती है
सुबह कर दो मेरे ग़मों की
मेरी रूह को अफज़ा कर दो.

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मैं अपनी फ़ेवरिट हूँ.


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कितना खूबसूरत है
मेरे मैं से मेरा रूबरू होना
वो हर शब्द
भावनाओं की झीनी चादर से ढ़के
मैं पढ़ती रही जो तुमने कहे
कभी खुलकर
तुमने अहसास की बारिश कर दी
मेरे दिल के मोती कभी
अपने नेह की चाशनी में पगे,
तुम तो तुम हो
ये जानती थी मैं हरदम
मैं क्या हूँ खुद में
वो लम्हे जादू के तुमने रचे,
शब्दों की दहलीज पर
कदमों की हलचल कर दी,
सरसों उगाने को
अपनी हथेली रख दी,
मुझमें कविता है मेरी
सीप में मोती की मानिंद,
समंदर की सहर पर तुमने
शाम की इबारत रच दी,
तुम हो
तो गुमां होता है खुद पर
तुम्हें खुद में
सोचती रह जाती हूँ अक्सर
तुम्हारे इन शब्दों में उलझ गयी हूँ
कि मैं अपनी फ़ेवरिट हो गयी हूँ।

रविवार, 12 नवंबर 2017

मैं तुम्हारी ही तो हूँ।

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तुमने मुझे
रंगों में जाना,
छन्दों में जाना, 
काग़ज़ के हर
अनुबंधों में जाना;
पर जहाँ मैं तुम्हारी
बस तुम्हारे लिए हूँ,
तुमने न जाना,
वहीं बस न माना.

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

इतिश्री.... एक बुझे हुए दिये की।

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शहर के कोलाहल से दूर
जंगल के वीरानों में
नयी सड़क से लगी हुई
पुरानी पशेमां गली पर
ज़्यादा दूर नहीं
उस पीपल के पीछे
एक टूटा-झुका सा
पर खण्डहर नहीं
हाँ उम्मीद का मारा
इस दरवाजे से जाता हुआ
उस निकास के आगे
बस बरसों में अपनी उम्र गिनकर
इतने ही कदम चलो
यही तो है वो आबो-हवा
जो तुम्हें बुला रही है
आशीष देने को
ये गूलर, ये नीम
और इनके नीचे सो रही
तुम्हारी माँ
इन्हीं के सिरहाने पापा भी तो हैं
ऊर्ध्वाधर लेटे
जब तक साँस थी
एक चम्मच पानी के भी
गुनहगार न हुए
आज उनकी समाधि पर
दीपक जलाकर दे ही दो
अपने जीवित होने का प्रमाण
फिर उल्टे पैरों लौटोगे
मुझे पता है
बीवी को शॉपिंग करानी है
जाते-जाते कहीं से लंब
तो कहीं से क्षैतिज हुए
खण्डहर नुमा हवेली के
एक पाये पर सर टिकाकर
श्रद्धांजलि दोगे।
इतिश्री।

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

उन्मुक्त होकर जीने दो न हमें!


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प्यार के बंधन में तो बंध जाते हैं सभी
आज उन्मुक्त होकर जी लेने दो न हमें,
सीने से लगा लो आज फिर हमको
कुछ न कहो लबों को सी लेने दो न हमें,

समंदर की रेत पर कुँवारी ख्वाहिश के नाम
तुमने हमको जो इक पैगाम लिखा था,
खुद को शहजादा
हमारे तन-मन का
और
हमें ज़िन्दगी का अंजाम लिखा था,
दिल में हूक वो फिर उठती है,
इक तलब सी मन में जागी है,
रेत के मकां ढह गए
अरमां तो अब भी सुलगते हैं,
बियाबान सा हर मंजर बनाकर चले गए,
आओ न कि अहसास की बारिश कर दो
जिस्म की खुशबू का असर जी लेने दो न हमें।

न पैसों की बारिश, न इज्जत न शोहरत
न खुशियों का बिस्तर न सोने की थाली
हमें जीने मरने की सुध ही कहाँ है
तुम्हारे लिए अब समाधि बना ली
लिखते हैं तुम्हारा नाम हर शाख पर बुटे पर
लेते हैं सुध तुम्हारी हर तितली हवा से
ढूंढते हैं तुम्हें हर मौसम में दर-ब-दर
मानसून सी तुम्हारी लुका-छिपी चलती है
आओ न किसी बारिश में एक छतरी तले
आधे-आधे हम तुम
तुम्हारे नूर का पानी लबों से पी लेने दो न हमें।

 आसमान की चूनर ओढ़नी बना दो हमारी
अपने कदमों की धूल से मांग सजा दो
दूर न करो पलकों का आशियाना
अपनी परछाईं में हमारा शामियाना बना दो
तुम्हारी आगोश में हर रात, सुहागरात है
आओ न कि हमारे दर्द को ढक दो
अपने छुवन की एक नूरानी रात दे दो न हमें
घुट रही तुम बिन बेसबब ज़िन्दगी
सियाह रातें हैं दिन बस एक उलझन
तुम्हारे आने की खुशी में महका है ये मन
वो घूँट मुक़द्दस खुशियों के पी लेने दो न हमें।

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

तुम्हारी उष्णता को घूँट-घूँट पियेंगे!


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हमारे मन के अधूरेपन को
आकार देती तुम्हारी पूर्णता
और तुम्हारे न होने पर
पल-पल पिघलती हमारी लघुता,
इसको साकार करना है हमें
नीलगगन का मिलन बनकर।
तुम्हें चाँद क्या कहें
तुम तो आसमान हो हमारे,
तुम्हारे फैलाये हुए डैने ही तो
हमारी छाँव हैं;
सुनो आज की रात थाल में
हमारे स्नेह का
हल्दी और अक्षत होगा,
छलनी से चमक रही हमारे चाँद की आभा
श्रंगार के यौवन को और बढ़ाएगी,
तुम रूप, रस, माधुर्य भरा घूँट पिलाओगे,
हमें प्रेम की गलियों में
दामन थामकर टहलाओगे,
तुम्हारे लिए गणेश चतुर्थी नहीं
हम तो हर वार व्रत रहेंगे,
आज की रात हम प्रेम का मधुमास जियेंगे,
तुम्हें पल-पल दिल में उतारेंगे,
तुम्हारी ऊष्णता का घूँट-घूँट पियेंगे,
अहसास की चादर तले
सुखन की धीमी आंच पर,
तुम्हारे नेह की हांडी में
जीवन का लाजवाब दाल-भात चखेंगे।

रविवार, 17 सितंबर 2017

तुम्हारी सैलरी

 PIC CREDIT: PINTEREST


सुनो, जो तुम अपने मुस्कान वाली सैलरी
दिया करते थे न हर रोज़ हमको
वो बिना बताए ही क्यों बन्द कर दी?
कुछ कहें तो अगले महीने का वादा,
उस पर भी ऐसी अदा से कहते हो
कि हम सच्ची
अगले महीने की बाट जोहने लग जाते हैं;
क्या तुम भी
सरकारी दफ़्तर के बाबू की तरह
झूठा दिलासा देकर टरकाते हो,
अब आकर बता ही दो
कब आएगा ये 'अगला महीना'
सूखे सावन में
ठिठुरते भादों में
या फिर अमावस के चाँद में?
क्या फर्क पड़ता है हमें
तुम्हारी जेब गर्म हो या नर्म
बस अपने अहसासों को जवां रखो,
तुम्हारे माथे पर शिकन
डरावनी लगती है हमे,
हम पूस की रातों में बारिश का पानी
ऊपर न टपकने देंगें
इन हथेलियों की छाँव रखेंगे तुम पर,
बस बिना रस्मों-कसमों के
इस अधूरे मगर अटूट बन्धन को
अपने संवेदनाओं के अहसास से सींचते रहना,
हमें छुपा लेना अपने अंदर कहीं
तिनका-तिनका न बिखरने देना,
हमारे स्नेह के कोटर में नहीं ठहरोगे
तब भी हम तो सर्वस्व तुम्हारे हैं
अपनी आंखों के प्रेम से
पिला दो पूर्णता का अमृत।

शनिवार, 16 सितंबर 2017

मुझे स्त्री ही बने रहने दो!

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स्त्री हूँ मैं
और जीना चाहती हूँ
अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के साथ;
क्यों करूँ मैं बराबरी पुरुष की,
किस मायने में वो श्रेष्ट
और मैं तुच्छ!
वो वो है
तो मैं भी मैं हूँ,
ये मेरा अहम नहीं
मुझे मेरे जैसा
देखने की तीक्ष्णता है
स्वीकारते हो न,
मैं और तुम
ये दो पहिये हैं हम के;
अगर तुम्हारे बेरिंग घिस रहे जीवनपर्यंत
तो मेरे कौन सा
गुणवत्ता की कसौटी से परे हैं,
इन्हें श्रेष्ठता के तराजू में
नहीं तोलना है मुझे,
ये तो ज़िन्दगी के कोल्हू में
पहले से मंझे हुए हैं;
एक द्वंद जो चल रहा मैं के भीतर
उसका समूल विनाश ही तो बनाएगा
हम का संतुलन:
मैं तुच्छ नहीं
वही तो है इस सृष्टि की सृजक
और तुम पालक हो इस सत्ता के
तभी तो हम से सन्तुलन है,
और अहम विनाश की
व्यापक स्वरूपता।

शनिवार, 2 सितंबर 2017

मुझे वो हर सहर उधार दे

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सरे-शाम से लिये चिराग,
तेरी याद में मैं बेहिसाब,
बैठी हूँ तेरे सिजदे को,
मुझे एक रात नवाज़ दे।
कहाँ है मुझको ये बता,
सुलग रही है मेरी जफ़ा,
फिक्र है मुझे बस तेरी,
तू कहीं से तो आवाज़ दे।
तेरे नूर को मैं चूम लूँ,
प्यारा है मेरा रहनुमा,
वरक़-वरक़ सिमट सकूँ,
बस तेरे लफ्ज़ सँवार दे।
न छाँव अपनी दे मुझे,
न नाम का तू अक्स दे,
जो शाम तुझमें हो घुली,
मुझे वो हर सहर उधार दे।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

मैं

कभी-कभी लोग
मेरा मूल्यांकन
ऐसे करते हैं
जैसे मेरा प्रादुर्भाव
पुरातत्ववेत्ताओं के 
अथक प्रयास के 
फलस्वरूप हुआ है।

Me

I
never felt
myself
more than
a steppny
in your view
but assumed
as BMW
which
doesn't need
a steppny.

शनिवार, 15 जुलाई 2017

रिश्ता

मैं
प्यार में थी
या
प्यार के लिए थी,
रिश्ता बनाये रखने को
ये फर्क समझना
बहुत जरुरी है I

बुधवार, 5 जुलाई 2017

मेरी खुशी

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जी करता है
एक मन्नत का धागा बांध दूँ,
कलाई पर तुम्हारी,
काला टीका लगा दूँ
माथे पर
जो दूर से दिखे,
बुरी नज़र पास आने की
हिमाकत न कर सके,
एक ताबीज बनाकर पहना दूँ,
गले में
जो तुम्हे अजेय बनाये रखे,
मुझे ये तुम्हारा
आईना देखकर संवरना
बिल्कुल भी नहीं अच्छा लगता,
दुनिया की नज़र से तो बचा लूँ तुम्हे
पर अपनी नज़र खुद पे ही
खराब करने लगे हो आजकल,
कितने वहमी हो गए हो
खुद को ही कसौटी पर
रखने लगे हो आजकल,
कोई तुमसा भला होगा क्या?
एक विश्वास वाला रुद्राक्ष भी होगा
तुम्हारे बाजू पर,
मेरी खुशी के लिए।

मेरी पहली पुस्तक

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