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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

इतिश्री.... एक बुझे हुए दिये की।

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शहर के कोलाहल से दूर
जंगल के वीरानों में
नयी सड़क से लगी हुई
पुरानी पशेमां गली पर
ज़्यादा दूर नहीं
उस पीपल के पीछे
एक टूटा-झुका सा
पर खण्डहर नहीं
हाँ उम्मीद का मारा
इस दरवाजे से जाता हुआ
उस निकास के आगे
बस बरसों में अपनी उम्र गिनकर
इतने ही कदम चलो
यही तो है वो आबो-हवा
जो तुम्हें बुला रही है
आशीष देने को
ये गूलर, ये नीम
और इनके नीचे सो रही
तुम्हारी माँ
इन्हीं के सिरहाने पापा भी तो हैं
ऊर्ध्वाधर लेटे
जब तक साँस थी
एक चम्मच पानी के भी
गुनहगार न हुए
आज उनकी समाधि पर
दीपक जलाकर दे ही दो
अपने जीवित होने का प्रमाण
फिर उल्टे पैरों लौटोगे
मुझे पता है
बीवी को शॉपिंग करानी है
जाते-जाते कहीं से लंब
तो कहीं से क्षैतिज हुए
खण्डहर नुमा हवेली के
एक पाये पर सर टिकाकर
श्रद्धांजलि दोगे।
इतिश्री।

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मेरी पहली पुस्तक

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