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सोमवार, 10 अगस्त 2026

एक प्रेयसी का रोष

 









तुम्हारे इन निर्जीव तंत्रों से,

अब मुझे ईर्ष्या सी होने लगी है

मेरे हिस्से का स्पंदन, मेरे हिस्से की भोर,

यह निष्ठुर 'स्क्रीन' हर दिन निगलने लगी है

​तुम कहते हो, "यह हमारे कल के लिए है,"

स्वर्णिम भविष्य की इस क्रूर वेदी पर,

तुमने हमारे हँसते हुए आज को बलिदान किया

यह तो सफलता का अंतहीन मायाजाल है

जिसमें उलझकर,

तुमने उम्रदराज कर दिया

मेरी मौन प्रतीक्षा को.

​देह भले ही समीप होती है मेरे,

पर मन तुम्हारा,

उलझा रहता है इन प्रपंचों में

मेरे उलाहनों की नमी तुम्हें अब नहीं छूती,

तुम्हारा ध्यान बस आभासी बंधनों में बहता है

मेरी छुअन से अधिक

अब तुम्हें कीज खटपट भाती है,

रात के सन्नाटे में मुझे तुम्हारी नहीं,

तुम्हारे काम की आवाज़ सताती है

​मैं तुम्हारी प्रेयसी हूँ,

कोई टू डू लिस्ट नहीं,

जिसे सुविधानुसार तुम

अगले पल पर टाल सको

मैं एक जीवंत प्रेम हूँ,

कोई प्रोजेक्ट नहीं,

जिसे मात्र कुछ खोखले वादों से

तुम सम्भाल सको

मुझे तुम्हारे कैलेंडर के

किसी खाली पन्ने में नहीं सिमटना,

मुझे तुम्हारे जीवन के केंद्र में धड़कना है

​महत्वाकांक्षा की इस अंधी दौड़ में,

जब तुम किसी शिखर पर नितांत अकेले खड़े होगे,

तब मुड़कर मत खोजना मेरी परछाईं को,

क्योंकि तब तक, मेरी आस के सारे पलाश झड़े होंगे

​चुना है तुमने जिस व्यस्तता के आलिंगन को,

वही एक दिन तुम्हें शून्यता का अर्थ बताएगी

आज मेरी जो शिकायतें तुम्हें बेमानी लगती हैं,

याद रखना, कल मेरी मौन विरक्ति

तुम्हें बहुत रुलाएगी


शनिवार, 1 अगस्त 2026

उन्होंने कहा दिन है


सच मत बोलो

सच दुखता है


कहा न...

तुम सुनते ही नहीं


झूठ नहीं बोल सकते

तो चुप रहो


जो सच नहीं सुन सकते

वो चीखेंगे चिल्लायेंगे

लेकिन तुम्हें सच नहीं बोलने देंगे


तुम बात करोगे सड़कों की

वो आंकड़े दिखायेंगे


और हाँ सवाल भी मत करो

सवाल ही तो बवाल है

जो सवाल नहीं करता वो मालामाल है


उन्होंने कहा, दिन है

तुम दिन कहो

ये मत कहो कि सूरज नहीं निकला

सूरज तो बादल में भी नहीं दिखता

क्या उसे रात कह देते हो?

ख़ारिज हो गयी न दलील?


जहाँ ख़ारिज होती रहती हैं बार-बार दलीलें

वहाँ दलील देने वाला ही बन जाता है दलाल

या यों कहें कि बनना पड़ता है दलाल

तो क्या वही बन जाना चाहते हो

फिर क्यों बोलते हो सच


तुम गूंगे ही अच्छे लगते हो

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सिलेक्टिव दुःखनवीस


 










मैं

वही तुम्हारा भारत महान

साॅरी अब और ज़्यादा महान


चुन लेता हूँ

किस हिस्से को 'दीपू' की मौत पर

और किस हिस्से को

'चकमा' की मौत पर मातम मनाना है

मैं सिलेक्टिव दुःखनवीस हूँ


चुन लेता हूँ

किसे चाहिए अपनी

'अरावली' पर आंदोलन

किसे 'सेंगर' को बचाना है

मैं एक्सेप्ट मोड डिनायल पीस हूँ


चुन लेता हूँ

सुपरसोनिक सा मौन

तो कभी ज़ीरो डेसीबल का शोर

सनलाइट में ब्लैक आउट

रेडिएशन में लगी ग्रीस हूँ


बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

एक पोशीदा मौत




फ़ेसबुक

मैं मर रही हूँ

मैं मर रही हूँ हौले हौले
एक पोशीदा मौत
इस बार जब मैं लौटी
वियतनाम से
छोड़ आयी अपनी आँखें वहाँ
जैसे छोड़ दिए थे
जापान में अपने कान
और सारनाथ में जिह्वा
क्या करुँगी इन सबका
जब बोलना ही नहीं
ग़लत को ग़लत
सुननी नहीं चीखें
एक गांधारी है न मेरे भीतर भी
यहाँ सब
एक बेचैन यात्रा में हैं
सभी को जल्दी है कहीं पहुँचने की
मैं रोक लेती हूँ सहसा
अपने चलते हुए कदमों को
हर बार यात्रा करते हुए,
मुझे रास आये
रास्ते
मंजिलों से अधिक
ज़्यादा चलना चाहा रास्तों पर
माँ के चेहरे की ज्यामिति
कितनी बदल जाती है
मेरे देर से पहुँचने पर
पापा का स्वर
अचानक ही सप्तम हो जाता है
मैं अपने ऊबड़ खाबड़ दाँतों के बीच
हल्का सा जीभ को काटते हुए
कल्टी मार जाती हूँ
कोई बहाना नहीं मेरे पास
देर तो कल भी होनी है
कल भी तो होनी है
एक और यात्रा
तुम बताना जरा
मंजिल पर पहुँच कर
कम होती रही तुम्हारी बेचैनी?
और लूट न सके यात्राओं का सुख भी
बंद न्यायालयों का भार सह सकने वालों को
आती होगी मौत यूँ ही
रोज थोड़ा-थोड़ा मरते हुए
जैसे मर रही हूँ मैं

बुधवार, 21 मार्च 2018

शून्य से पहले

दायरारहित सोच के
बाहर का दायरा,
कल्पनारहित उड़ान के
बाद की कल्पना,
दर्दरहित जीवन के
अंत का दर्द,
प्रेमरहित मन के
पतझड़ का प्रेम,
गतिरहित आशा के
स्थिरता की आशा,
पड़ावरहित सफर के
दूरन्त का पड़ाव,
....महज कोरी कल्पनाएं नहीं
ये तो एक विराम है
शून्य है
इसके बाद स्थान लेती है
ऋणात्मकता....
मत जाइए शून्य तक
मत खोजिए नकारात्मकता
जीवन अंटार्कटिका नहीं यूरेशिया है
क्योंकि हर जीव पोलर बियर नहीं
कुछ मानव भी हैं।

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php