Saree in your budget
छह गज़ का सूती या रेशमी लिबास नहीं,
ये पल्लू है, कोई साधारण कैनवास नहीं
जब एक स्त्री पहनती है अपनी पसंद की साड़ी,
मानो सँवर जाती है उसकी पूरी दुनिया ही
कभी माथे का घूँघट बन परंपरा निभाती है,
कभी हौसला बढ़ाती है
रसोई की आँच से लेकर दफ़्तर की फ़ाइलों तक,
ये साड़ी हर किरदार में साथ कदम मिलाती है
लाल जोड़े में वो नववधू सी अठखेलियाँ करती,
काले शिफॉन में वो रातों की नींदें हरती है
माँ की पुरानी साड़ी से आती है जो भीनी महक,
वो आज भी हमें बचपन के आँगन में ले जाती है
वो चुन्नटें बनाते हुए उसका आईने को निहारना,
काँधे पर पिन लगाते हुए माथे का बल पकड़ना
हवा में लहराता वो आज़ाद सा पल्लू,
जैसे कह रहा हो आ गया है तूफ़ान से लड़ना
यह सिर्फ धागों की बुनावट नहीं
अनकहे जज़्बात हैं,
हर रंग में छुपी हुई, एक अलग ही बात है
कुछ सिलवटें हैं संघर्ष की, कुछ रंग हैं खुशियों के,
स्त्री और साड़ी की ये जोड़ी,
सदियों की खूबसूरत सौगात है