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गुरुवार, 18 नवंबर 2021

कोई पुरुष जब रोता है

 ओ स्त्री!

जब तुम रोते हुए

किसी पुरुष को देखना

तो बिना किसी

छल और दुर्भावना के

उसे अपनी छाती में

भींच लेना

और उड़ेल देना उस पर

वो सारा स्नेह

जो तुम अपने कोख़ के

जाये पर लुटाती...

कोई पुरुष जब रोता है

तो धरती की छाती

दरकती है

तुम्हें बचाना होगा स्त्री! दरार को.

पुरुष, पुरुष ही नहीं ईश भी है

वो ही न हो तो तुम स्त्री कैसे बनो?

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ओ पुरुष!



ओ पुरुष,
तुम्हें भी भीतर घुटता होगा कहीं
जब तुम अपने होठों पर रख लेते हो
मौन सलाखें;
तुम्हें भी तो प्यारी होगी स्त्री उतनी ही
जितना प्रेम तुम उससे पाते हो
और जब वही स्त्री तुम्हें समझती नहीं होगी
तो मुरझा जाते होगे तुम भी दर्द से
जैसे दूब मुरझा जाती है चटख धूप से,
तुम्हारा मन भी व्याकुल होता होगा
संचित नेह लुटाने को,
तुम भी तो देना चाहते होगे वो स्पर्श
जो राम ने दिया था अहिल्या को,
तुम भी टटोलते होगे न अपनी देह को
और महसूसते होगे वो गंध
जो तुम्हारी स्त्री तुमसे अंतिम बार
लिपटते हुए छोड़ गई थी;

ओ पुरुष बोलो न!
तुम भी तो बनाना चाहते होगे संतुलन
तुम्हारे मन में भी चलता होगा एक कल्पित माध्य
जो आसान करना चाहता होगा असंतुलित समीकरण
तुम भी लिखते-मिटाते होगे बही खाते का हिसाब
उस अबूझी स्त्री की तरह
जो मन में बहुत कुछ रखकर भी
बंद कर लेती है आँखें सच छलकने के डर से;

ओ पुरुष!
थक जाते होगे न तुम कभी-कभी
पुरुष बने हुए,
तुम भी तो कभी स्त्री बनने की इच्छा रखते होगे
जब आह्लादित करती होगी स्त्री की कोमलता;

तुम्हारी उंगलियों के पोरों पर
ये जो अम्लता ठहरी है
इसकी हर बून्द को सांद्र कर दो,
तुम्हारी जिह्वा को सुशोभित कठोर स्वरों को
कोमल व्यंजनों में बदल दो,
ओ पुरुष! तुम्हें स्त्री सा होना भी ग्राह्य है
ये कहकर पुरुषत्व को आकाश भर कर लो.

मेरी पहली पुस्तक

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