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Saturday, 18 November 2017

17 साल बाद 20 वर्षीय मिस इंडिया वर्ल्ड

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एक बार फिर भारत की ब्यूटी मुस्करायी
मानुषी मिस वर्ल्ड क्राउन में नज़र आयी
मैक्सिको, इंग्लैंड को भी पीछे छोड़
हरियाणा को विश्व पटल पर दिखाया
जब स्टेफनी ने
मिस छिल्लर को ताज पहनाया,
मेडिकल में दखल रखने वाली ने
17 सालों का सूखा मिटाया
आखिरी जवाब से
भारत की सभ्यता का मान बढ़ाया,
प्रियंका हमें आप पर नाज है
मानुषी ने इस मान को सम्मान दिलाया,
हम भारतवासी आपको देते हैं बधाई
भारत की सुंदरता हर कहीं मुस्करायी।

Friday, 17 November 2017

मैं अपनी फ़ेवरिट हूँ.


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कितना खूबसूरत है
मेरे मैं से मेरा रूबरू होना
वो हर शब्द
भावनाओं की झीनी चादर से ढ़के
मैं पढ़ती रही जो तुमने कहे
कभी खुलकर
तुमने अहसास की बारिश कर दी
मेरे दिल के मोती कभी
अपने नेह की चाशनी में पगे,
तुम तो तुम हो
ये जानती थी मैं हरदम
मैं क्या हूँ खुद में
वो लम्हे जादू के तुमने रचे,
शब्दों की दहलीज पर
कदमों की हलचल कर दी,
सरसों उगाने को
अपनी हथेली रख दी,
मुझमें कविता है मेरी
सीप में मोती की मानिंद,
समंदर की सहर पर तुमने
शाम की इबारत रच दी,
तुम हो
तो गुमां होता है खुद पर
तुम्हें खुद में
सोचती रह जाती हूँ अक्सर
तुम्हारे इन शब्दों में उलझ गयी हूँ
कि मैं अपनी फ़ेवरिट हो गयी हूँ।

तलाश है अच्छी लड़की की...

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तलाश है मुझे
एक अच्छी लड़की की
अच्छा लड़का तो
पहले ही मिल चुका है;
दिमाग के घोड़े दौड़ाइये
न टेंशन में आइये,
ये कोई मैरिज ब्यूरो का आफिस नहीं
न ही बच्चों को गोद लेने-देने वाली संस्था
ये तो बस एक समतल सी जगह है
मैदानी इलाके की
जहाँ मन विश्राम पे है,
सो मन में
एक अहमक सा ख़याल आ गया
सुषुप्त आरजू में उबाल आ गया
थक गयी हूँ अपने आस-पास
सौंदर्य-प्रसाधन का बेजा प्रचार देखकर
अब हिरनी सी आँखे हवा हो गयीं
आई-लाइनर मस्कारा के आगे,
होंठों की गुलाबी रंगत कहाँ खो गयी
कहाँ गुम गए झुर्रियों के धागे,
अब चेहरे उम्र नहीं बोलते
कंपनी का ट्रेड मार्क उगलते हैं,
गाय दरवाजे पर गोबर कर जाए
तो चौबीस घंटे महकता है
मगर स्कूटी पर बैठी दीदी का
चेहरा दमकता है,
फिगर जीरो, कपड़ों का साइज छोटा
अच्छे होने की बस
इतनी सी निपुणता है,
सेल्फी का ट्रेंड है जी:
ब्यूटी प्लस की पोल
एक बार अच्छे लड़के ने मुझसे खोली थी
जो बात मेरे दिल में थी
उसने मुँह खोलकर बोली थी,
वो अच्छा लड़का है
मैं कहती हूँ,
उसमें दुनियादारी की बनावट नहीं है
वो जैसा भी है
उसके शब्दों में मिलावट नहीं है;
तलाश बाकी है अभी
एक अच्छी लड़की की
अब ये मत कहना
कि मैं आईना देख लूँ।

Wednesday, 15 November 2017

हाई ब्लड प्रेशर: नए मानक



अब खून भी रगों में
सुपरफास्ट हो गया है,
सिस्टोलिक 130
और डायस्टोलिक 80 भी
पार कर गया है।
ये मैं नहीं कहती
एएचए व एसीसी की
गाइड लाइन है:
अगर ज़िन्दगी प्यारी है
तो नमक का इस्तेमाल कम करिए,
न खुद के लिए
न औरों के जख्मों पर छिड़किये;
चटनी-अचार के चटखारे न लगाइये
तेल के कुवें से बाहर आइये;
घड़ी देखकर सोइये,
अलार्म पर उठ जाइये;
सुबह-शाम पार्क जाकर
खूबसूरत चेहरों का
दीदार करिए;
जरा सी बात पर
बाजू वाले का मुंह मत तकिये,
परिश्रम कीजिए
और स्वस्थ बने रहिये;
फिर भी रफ्तार तेज हो
खून की रगों में
तो गोलियां खाइये;
अरे बाबा,
तनाव में मत आइये
अपना दिल और गुर्दा बचाइए;
सुकून एक स्पीड-ब्रेकर है
रक्त-ए-रफ्तार का
खुशी को अपना सहचर बनाइये
और मुस्कराइए;
आबो-हवा खराब हो चली है बहुत ही
मुस्कराने को लखनऊ तो
हरगिज न जाइये।

Tuesday, 14 November 2017

मुझे एक सोसाइटी बनानी है


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मुझे फीता काटना है
और दीप भी प्रज्ज्वलित करना है
हाँ, मुझे एक सोसाइटी बनानी है
ऐसे लोगों की
जिनके चेहरे प्लास्टिक के न हों,
जहाँ चाँद हर आँगन में हो,
खुशियों को तोलने वाला वहाँ
कोई तराजू न हो;
जहाँ पैसा जरूरत के हिसाब से हो,
कोई बड़ा या छोटा न हो,
अमीर और गरीब भी न हो,
बस एक बस्ती हो इंसानों की
हांड-मांस का जो
पुतला भर न हो,
अपने स्वार्थ के लिये जहाँ इंसान
मुर्दे न बन जाते हों,
वो बस्ती होगी
हम सब के सपनों की,
मुस्कराहटों की,
ईर्ष्या और जलन का प्रदूषण न होगा
हर घर में भाईचारा नहीं
हर मन में दिखेगा।

Monday, 13 November 2017

बच्चे मन के सच्चे



सवालों से जवाबों से इन्हें किताबों से न आंको
उम्र और मन के मिलन को जुराबों में न झांको

चंचल हैं बहुत ये है ठिकाना इनका बहता पानी
हैं चट्टान से मगर ये, बदल दे नदियों की रवानी

उमंगों में जीते रहते और होते सपनों में बड़े ये
हर नज़र में हसीं मुस्कराहटों के दर पे खड़े से

एक उम्मीद बने सब, हैं दस्तक सुनहरे पल की
इनके ही हाथों सौंपी अब डोर अपने कल की

100 सालों के अहसास की दास्तां



मेरे इश्किया जुनून पर पहरे की तरह तुम
ज़िन्दगी के मजमून पर सहरे की तरह तुम

ये लाइनें हूबहू चरितार्थ होती हैं दादाजी के लिए अम्मा के मन के प्यार को जब पढ़ती हूँ। हम सब मतलब हमारी पीढ़ी उन्हें दादाजी और अम्मा बुलाते थे पर थे वो हमारे परदादा। मैं 23 लोगों के संयुक्त परिवार की सबसे छोटी मगर नायाब हीरा थी। खुद से अपनी तारीफ नहीं करती पर सभी का मानना था। मैं अपनी दादी के मुंह से अक्सर उनकी सास की बचपन की कहानी सुनती थी।
अम्मा का बाल-विवाह महज़ 9 साल की उम्र में हो गया था तब दादाजी की उम्र उनसे भी 1 साल कम 8 साल की थी। इस बात पर मैं अक्सर अम्मा को छेड़ती रहती थी, "आखिर क्या देखकर आपके लिए गुड्डा पसन्द कर लिया गया?"
अम्मा भी बहुत बेबाकी से जवाब देती थी, "अरे हम तो कनॉट प्लेस जाते ही रहते थे अपनी बुआ के यहां, सामने वाले घर में तुम्हारे दादाजी रहते थे छोटी सी निकर पहनकर छत पर पतंग उड़ाया करते थे। जब दोपहर हो जाये अम्मा के बुलाने से न आये तो पिताजी बड़ी सी छड़ी लेकर जाते थे। हम भी अक्सर दोपहर में कबूतरों को पानी देने जाते थे और हमारे सामने ही इनकी धुलाई हो जाती थी। ये हमें कनखियों से देख लेते थे फिर गुस्से और शर्म से आग-बबूला हो जाते थे। एक दिन इन्होंने कुंडी खटकाई, हमने दरवाजा खोला सामने ही चरखी लिए दिख गए। इन्होंने कहा हमारी पतंग तुम्हारे छत पर है, हमने मना कर दिया कि तीन माले चढ़कर नहीं जाएंगे बाद में आना। ये भौं सिकोड़ते हुए चले गए। तब से नोंक-झोंक का सिलसिला शुरू हो गया। एक दिन अम्मा आयीं बुआ से मिलने, बुआ ने बातों ही बातों में कहा अपनी लोई बहुत लड़ती है धीरू से इन दोनों का ब्याह करा दें तो ठीक रहेगा। अम्मा ने तो जैसे सपना देख लिया मेरे ब्याह का। बाबू के न रहने से अम्मा की बहुत जिम्मेदारी थी। बुआ को मनाने में लग गयीं कि चर्चा करो ब्याह हो जाये गौना बाद में देंगे। बस फिर क्या था हमारा ब्याह हो गया।
"फिर क्या हुआ अम्मा?" जब भी मैं पूछती अम्मा बताने लगतीं।
"फिर होना ही क्या था, हमने भी बोल दिया हम इसके घर रहने नहीं जाएंगे। जब हमें विदा कराकर लाया गया तो हम सबसे नज़र बचाकर बुआ के यहाँ भाग गए। शुरुआत में तो सब ठीक था पर बाद में हमें वहीं रहना पड़ा। स्कूल में दाखिला हो गया। हम लोगों का रिक्शा लग गया। पूरे रास्ते झगड़ा होता रहता। बस छुट्टी के समय हमारी याद आती। पत्नी की तरह हमने इनके कपड़े नहीं धोए कभी मग़र स्कूल का काम हमीं करते थे। धीरे-धीरे दोस्ती हो गयी। इनकी जिम्मेदारी हमपर आने लगी थी। अक्सर दोपहर का खाना हम इन्हें छत पर ही खिलाते।  ये छत के एक कोने से पतंग उड़ाते हम दूसरे कोने पे छुडइया देते। जब पतंग ऊंचे उड़ने लगती हम इनकी चरखी सम्हालते। जब हम अपने पल्लू से इनका पसीना पोछते तो हमें चुम्मी ले लेते थे। हम दिन भर इनके आगे-पीछे लगे रहते।" ये बताते हुए अम्मा आज भी लाल हो जाती हैं।
"और कुछ बताइये न अम्मा, आपकी लव स्टोरी आगे कैसे बढ़ी?"
"बस ऐसे ही चलती रही, हमें गर्व होता है कि हम इतने समय तक रिश्ते में हैं।"
आज अम्मा की शादी की 100th एनिवर्सरी मनाने की तैयारी चल रही है। अपने अनुभव के पलों को वो बहुत गर्व के साथ शेयर करती हैं।
"धीरे-धीरे हम लोगों ने पढ़ाई पर मेहनत शुरू करी। पिताजी छड़ी लेकर काम देखते थे। हम दोनों को बराबर डाँट पड़ती थी। जब कक्षा 9 में इनका दाखिला हुआ तो ये दोस्तों की सोहबत में ज़्यादा रहने लगे। स्कूल में हमसे तो बात ही नहीं करते थे मगर हमारे आगे-पीछे रहते थे, क्या मजाल जो हम किसी से बात कर लें।"
"क्या कहकर डांटते थे अम्मा?"
"बस हम आँखे देखकर समझ जाते थे। फिर घर आने पर लाड़ भी दिखाते थे। इसी तरह कक्षा 12 तक चलता रहा। फिर इनको वकालत की पढ़ाई के लिए दूसरे स्कूल भेज दिया गया। हमने वहीं से बी ए करा। तब तक हमारे अंदर का बचपन बहुत कम हो चुका था। इनकी वकालत की डिग्री और तुम्हारे बड़े पापा की पैदाइश, इन दो बड़ी बातों ने हमारी ज़िंदगी बदल दी। तुम्हारी बड़ी बुआ और बड़े चाचा का भी आना हुआ।हम घर-गृहस्थी और वो दुनियादारी इन्हीं में लगे रहे।"
नोंक-झोंक, तकरार के जवाब में अम्मा कहती हैं, "ये सब कभी हुआ ही नहीं हमारे बीच। जब शादी हुई तो समझदारी नहीं थी जब समझदार हुए तो कदमों को अपनी दिशा पता थी। हम तो एक-दूसरे की मंजिल के राही थे। लेकिन इतना तो है कि हमने ज़िंदगी ठेली नहीं एक-एक अहसास जिया है। 100 बरस का रिश्ता निभाया है।" अम्मा की आँखों में वो कॉन्फिडेंस दिखा मुझे कि एकबारगी मन बाल-विवाह की वकालत कर बैठा। मुझे समझ में आ गया था कि अगर कोई अनचाही घटना हो जाती है तो डरकर, पीछा छुड़ाकर भागने की बजाय उसे खूबसूरत मोड़ देने की कोशिश की जाए तो उससे ज़िन्दगी बेहतरीन हो जाती है।
"अरे दादाजी वहाँ कहाँ बैठ गए आप मेहमान नहीं हैं। अम्मा क्या अकेले केक काटेंगी।" मैंने मेहमानों से खचाखच भरे हॉल में दादाजी के पास जाते हुए कहा।
"अरे मीठी आज शायद ही केक कट पाए। अम्मा तैयार नहीं हो पाई।" दीदी बलून उड़ाते हुए बोली पर दादाजी ने टोक दिया उसे,
"मीठी, आज पहली बार तुम्हारी अम्मा केक काट रही हैं तैयार हो लेने दो जी भरकर।" दादाजी की आंखों से 100 साल का अनुभव और स्नेह झलक रहा था।
"हम तो ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों में इतने उलझ गए कि कोई खुशी ही न दे पाए उसे।" अम्मा रेड कलर की साड़ी में जैसे ही सामने से आते हुए दिखीं हॉल में मौजूद सभी लोग टकटकी लगाकर देखने लगे। दादाजी तो पूरे 90 डिग्री के एंगल पर टर्न हो गए। उनकी आँखों में प्यार ही प्यार था। वो प्यार जो बचपन में ममत्व से, तरुणाई में मार्गदर्शन की भावना से और उम्र के इस पड़ाव पर सहयोगी की तरह रूबरू कराता है। 8 साल की उम्र से फलता-फूलता हुआ आज यहाँ तक पहुंच गया।
अम्मा और दादाजी केक काट रहे थे। सारा माहौल इतना खुश था जैसे उन्हें हर जन्म साथ-साथ रहने का आशीर्वाद दे रहा हो।

Sunday, 12 November 2017

मैं तुम्हारी ही तो हूँ।

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तुमने मुझे
रंगों में जाना,
छन्दों में जाना, 
काग़ज़ के हर
अनुबंधों में जाना;
पर जहाँ मैं तुम्हारी
बस तुम्हारे लिए हूँ,
तुमने न जाना,
वहीं बस न माना.

Saturday, 11 November 2017

इंसानियत से इंसानियत तक



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ट्रैफिक सिग्नल पर ग्रीन लाइट का इंतज़ार करते हुए मेरी नज़र गाड़ी साफ करते लड़के पर गयी। कुछ जान-पहचाना चेहरा दिखते ही मैंने कार का शीशा खोला, "अरे मासूम तुम!" मुझे खुशी से चहकता देख मासूम मेरी कार विंडो के पास आ गया।
"दीदी आप, पहचान गयीं मुझे?" इतना कहते ही उसकी आंख में आँसू आ गए।
"क्यों नहीं पहचानूँगी तुझे...अच्छा ये बता हुस्ना कैसी है, और तूने ये हुस्ना का काम कब से शुरू कर दिया?"
"दीदी हुस्ना का उसके अब्बू ने घर से निकलना बंद कर दिया, आप तो जानती ही हैं सब कुछ।" इतना कहते ही वो फफक कर रो पड़ा।
मैंने मासूम से गाड़ी में बैठने को कहा और अनुभव से हुस्ना के घर चलने को। वहाँ से तकरीबन 30 मिनट की दूरी पर था।
गाड़ी हाई वे पर दौड़ रही थी और मैं अपनी यादों की हसीन गलियों में। यही कोई 5 साल पहले मुझे मेरे अब्बू ने कल्याण अपार्टमेंट के एक फ्लैट में जेल की तरह शिफ्ट कर दिया था वहाँ कोई इंसान तो दूर परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। मेरा गुनाह ये था कि मैं एक हिन्दू लड़के से प्यार कर बैठी थी। पूरे 72 घण्टे बाद मुझे सामने वाले फ्लैट में एक लड़का पेपर डालते हुए दिखा। मेरे आवाज देने पर वो खिड़की के पास आ गया। पूछने पर पता चला वो हॉकर है, रोज नीचे से पेपर डालकर चला जाता था आज सामने से खिड़की बन्द थी तो ऊपर आ गया। मैंने एक चिट पर अपना फ्लैट नंबर और अपार्टमेंट का नाम लिखकर अनुभव का पता बताते हुए देने को कहा।
अगले दिन वो अनुभव का रिप्लाई लेकर आ गया साथ ही हुस्ना को अब्बू की गाड़ी साफ करने को लगा दिया। हुस्ना और मासूम की मदद से अनुभव ने एक सेल फ़ोन मुझ तक पहुंचाया। मैं बाहर तो नहीं जा सकती थी पर अनुभव तक अपने मेसेज पहुंचा सकती थी। हुस्ना और मासूम हमारा बहुत ख़याल रखते थे। मेरे पैदा होते ही अम्मी गुजर गई। अब्बू मुझे इस बात का दोषी अब तक मानते हैं। मुझे अनुभव में माँ-बाप हर किसी का प्यार दिखा और अब मासूम, हुस्ना तो मुझे अल्लाह के बंदे दिखे। हुस्ना गाड़ी साफ करती थी और मासूम हॉकर था। हुस्ना उन मासूमों में से एक थी जो अपनों में रहकर यौन-उत्पीड़न का दंश झेलते हैं। मासूम की पाकीज़गी पर वो फिदा थी। उसे पहली बार कोई ऐसा मर्द मिला था जो उसके जिस्म का दीवाना नहीं बल्कि मन का तलबगार था।
जैसे ही अनुभव की फाइनेंसियल क्राइसिस खत्म हुई, हमने शादी कर ली। अब्बू की रज़ामन्दी तो नहीं मिली दुवाएं भी न मिल सकीं। आज उन बातों को 5 साल बीत गए। इस दौरान मैं खुद में इतनी मशरूफ़ रही कि मासूम और हुस्ना से न मिल सकी। जबकि मैं और अनुभव अक्सर उन दोनों का जिक्र किया करते थे।
अचानक लगे ब्रेक से मैं हक़ीक़त में आ गयी। गाड़ी हुस्ना के घर के सामने वाली गली में थी। हम लोगों को इस तरह आया देख हुस्ना के अब्बू सहम गए। अनुभव को देख उनकी आँखों में मीडिया का भय दिखा। हुस्ना रोते हुए मुझसे लिपट गयी। मैंने उसके माथे को सहलाया। उसकी आँखों में यकीन दिख मुझे। हम हुस्ना को लेकर आ गए। वापिस आते एक अच्छा सा सुकून मिल रहा था मुझे पर एक सवाल ज़ेहन में था कि एक हुस्ना को तो मैंने आज़ाद करा दिया समाज तो ऐसी हुस्ना से पटा पड़ा है। वो खुली हवा में सांस लेने को छटपटा रही हैं कब चेतेंगे हम अपने कर्तव्यों के प्रति कि कोई हुस्ना अत्याचार सहने को मजबूर न हो?

Friday, 10 November 2017

माँ बनना मुश्किल तो नहीं!


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माँ बनना इतना मुश्किल नहीं है
दर्द अहसासों में कहाँ गुम हो जाता है
किसे खबर रहती,
दिन उम्मीदों में
और रातें सपनों में हवा होती हैं,
जो नहीं है
उसके होने का अहसास
सर्दियों में खिली
मुट्ठी भर धूप की तरह है,
है तो अजन्मा
पर सोच की उँगली थामे
देखो न कहाँ खड़ा है;
हर दरख़्त के साये में
हर दीवार से बड़ा है,
जब नरम हथेलियों की गुनगुनाहट में
करवटें लेता है,
रोम-रोम खिल उठता है,
यूँ तो है सुरक्षित
मेरे अंदर नौ महीने,
पर सीने से लगा लूँ अभी
मन मचल उठता है:
कितना कलरव करता है अंदर
सिसकियां भी भरता है कभी,
घूमता है, फिरता है, पुकारता है
जैसे कहता हो
मुझे दुनिया देखनी है अभी;
पहले दिनों में होती थी
महीनों की गिनती
अब तो हर घण्टे हिसाब होता है,
तुम्हारे होने में हम दोनों
बस तुम्हारे हो गए
उनकी शिकायतें सर-आंखों पर
पर तुम सबसे प्यारे हो गए,
जब सुनाती हूँ उन्हें तुम्हारी धड़कन
दूरी हमारे
और भी करीब लाती है,
तुम सांस लेते हो मेरे भीतर
और खुशी हमारी मुस्कराती है:
इतना मुश्किल नहीं है माँ बनना
मैं तो महसूसना चाहती हूँ
तुम्हारे जन्म का पल
नींद का इंजेक्शन लेकर नहीं,
प्रसव-पीड़ा सहते हुए,
योनि-मार्ग से निकलते हुए,
तुम्हारा पहला रोना
मैं सुन सकूँ
इतना मुश्किल भी नहीं है
माँ बनना
मैं गर्व से कह सकूँ।

Wednesday, 8 November 2017

ये कहाँ आ गए हम!!!


 













महबूबा भले ऐश्वर्या सी दिला दो
मगर वर्चुअल है तो क्या
खुशियाँ पहाड़ सी भले ऊँची कर दो
मगर डिजिटल हैं तो क्या
हक़ीक़त से मिला दो हमें
हमको भी तो लिफ्ट करा दो
ज़िन्दगी हमारी वही अच्छी थी
कागज़ के नोट को थूक से गिनते थे
एक बड़े से मैदान में
चौपालों में सजते थे
तब एक हॉल में बीस होते थे
पता चलता था
अब दो सौ हों तो भी
सर झुके रहते हैं
ज़िन्दगी है तो शहद सी
पर नीम पे चढ़ी
हम दौड़ में आगे भाग रहे हैं
क्योंकि
हमारे साथ कोई नहीं
खुश हैं बहुत अपने आप मे
क्योंकि मंजिल का पता नहीं,
जब पहाड़ जैसे सपनों का
बौना सा अंत दिखता है
ज़िन्दगी का उम्बर घाट
मछली की मानिंद
तलहटी पर तड़पता है।

Monday, 6 November 2017

कुछ तो करो!

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उ कहे
भगवान जी से
बढ़ा दो, बढ़ा दो
भगवान जी भी
बढ़ावत नहीं रहे
फिर का
एक दिन
उ हिमालय चले गए
लगे तपस्या करन
भगवान जी सो के उठे ही थे
दातुन करी
हिमालय से आवाज आई
वहाँ चले गए
जो कुछ समझे आवा
बढ़ा दिहिन
सैलरी जस की तस
मुसीबतें ठूंस ठूंस के
जी एस टी समेत
तब से आज तक
उ हिमालय पर हैं।

ज़िन्दगी, तू ही तो है!

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वो तेरे जिस्म को छूती मेरी प्यासी ये निगाहें
न कोई और है रहबर, मांगे बस तेरी पनाहें
तू तो बस अब ही ठहर न किसी रोज़ न आ
मैं तो हूँ तुझमें ज़िबा तेरा कोई और ठिकाना

उस रोज से प्यासी है ज़मीं
तेरी चाह बस वहीं थमीं
उस ओर ही टूटा था सितारा
जिस ओर मेरी आँखों ने
तुझे जी भरके निहारा
तेरी खुशबू, तेरा जादू
बस तेरी ही तेरी कमी
तू है तो कहीं
पर यहाँ तो नहीं

मैं तेरे दर्द की शहनाई पे दिल अपना रख दूँ
हो तेरा कोई ख्वाब अधूरा उसे पूरा कर दूं
मुझे ज़ीनत न समझ दिल की ये इनायत कर
तुझे चाहूं मैं बेसबब, खुद को ज़िंदा कर दूं

ये गुलशन भी खामोश है
तेरी हर अदा पर फिदा
छू ले एक बार मेरा दर्द
सुकूँ हो जाये
मैं जागती रहूँ तुझमें
और ये रात हममें सो जाए
ये खिला-खिला सा तू
वक़्त दे बस इतना सुकूँ

मुझको देता है तू हर रोज़ गुनाहों की सजा
मैं चीर के दिल रख दूँ, तू गुनाह तो बता
तुझको चाहा है, बस चाहा है और चाहा है तुझे
ये गुनाह है तो आकर दे दे एक रोज़ सजा

लम्हा-लम्हा मरती हूँ मैं
बस एक लम्हे के लिए
मैं छोटी सी नदी
वो सैलाब तेरी मोहब्बत का
मैं बह तो गयी
पर फना होकर

दे वो लम्हा, मैं चाहूँ तुझे ये गंवारा कर ले
तेरी आँखों में सिमट जाए, ख़्वाब हमारा कर ले
है तेरे सुरूर की हसरत और बस दीवानगी तेरी
तू मेरे दिल का हो रहबर सितम भले सारा कर ले

Friday, 3 November 2017

वो जूस वाला...


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"देख...देख...जरा ढंग से, आज फिर नहीं आया तेरा वो जूस वाला।"
"हाँ तो ठीक है न! कौन सा मेरी जागीर ले गया?"
"और क्या अब तो ऐसे बोलेगी ही तू!"
"अपने काम से काम रख और गाड़ी चलाने पे ध्यान दे। वैसे मुझसे ज़्यादा अब तू जूस वाले का इंतज़ार करती है।" मेरा इतना कहना था कि वो चुप होकर गाड़ी चलाती रही। मैं अपनी फ्रेंड के साथ रोज़ इसी रास्ते से आफिस जाती थी। पहले तो कभी ध्यान नहीं दिया पर एक दिन साथ में पानी न होने पर जूस का ठेला दिख गया। वैसे तो मैं बाजार की कभी कोई चीज़ नही खाती-पीती थी पर वो जूस उस दिन मुझे अमृत सरीखा लगा। जूस पीने से पहले मेरी दो शर्त थीं। पहली तो ये कि साफ-सफाई हो और दूसरी कि मौसमी मतलब मौसमी, इसके अलावा कोई और जूस न निकाला गया हो। दोनों कैटेगरी में जूस वाले को 100 आउट ऑफ 100 जाते थे। उसका सर्व करने का शालीन तरीका भी मुझे बहुत पसंद आया।
हम दोनों अक्सर रुककर जूस पी लेते थे। एक दिन हम सामने से बिना रुके निकल गए। दूसरे दिन जाते ही उसने पूछा, "मैडम आप कल नहीं आयीं?"
"अरे भैया जी, कल हमारे पास चेंज नहीं था।"
"तो क्या हुआ बाद में ले लेते। अब रोज़ पी लिया करिए पैसे एक साथ लेंगे।"
मैंने उसे सौ का नोट दिया, वो चेंज वापिस करने लगा।
"आप इसे रख लीजिए, कल फिर आऊंगी तो नहीं दूँगी।"
"अरे नहीं मैडम हम ये नहीं लेंगे। आप पहले जूस पियेंगी जब 100 रुपये हो जाएंगे हम इकट्ठा ले लेंगे।"
मैंने ज़बरदस्ती 100 रुपये ठेले पर डाल दिये और चली गयी। रास्ते भर मेरी दोस्त बड़बड़ाती रही, न जान न पहचान क्या जरूरत थी 100 रुपये देने की उसे। ये सब ऐसे ही होते हैं, अगर भाग जाए तो....। मैं चुप रही।
पर उस दिन के बाद से मैं आज तक ताने सुन रही हूँ। मैं भी परेशान हूँ इसलिए नहीं कि पैसों का गम है बल्कि उस जगह वो जूस का ठेला देखने की आदत सी हो गयी थी। अब किसी और जूस में वो टेस्ट नहीं आता था।
मैं उधेड़बुन में थी कि गाड़ी एक गाय से टकराकर डिवाईडर पर पलट गई। मेरी आँखें हॉस्पिटल में खुलीं। बाद में पता चला कि गिरने की वजह से मेरे सर में चोट आ गयी थी। मेरी फ्रेंड किसी की हेल्प से मुझे हॉस्पिटल तक लायी। हेल्प करने वाला कोई और नहीं बल्कि वही जूस वाला था। आज से ठीक 21 दिन पहले उसके बेटे का रोड एक्सीडेंट हो गया था। तब से आज तक वो इसी हॉस्पिटल के आस पास रहता है। पैसों के लिए कभी-कभी मौसमी का जूस भी निकालता है। एकदम बदल सा गया है वो, पहले से बहुत दयनीय लाचार सा दिखने लगा है। मेरे होश में आते ही जूस का गिलास लेकर आ गया। आज कितने दिनों के बाद वो टेस्ट पी रही थी मैं। मेरी फ्रेंड ने पैसे निकालकर देने को हाथ बढ़ाया।
"क्यों शर्मिंदा कर रही हैं मैडम, अभी तो आपके 100 रुपये हैं हमारे पास। हम गरीब हैं पर बेईमान नहीं। बहुत लाचार हो गए बच्चे को कोई दवा असर नहीं कर रही। आपको पैसे देने भी न आ पाए।" मेरी फ्रेंड कुछ बोलती इससे पहले ही डॉक्टर का बुलावा आ गया।
"रामआसरे जी, आपके बच्चे को होश आ गया। डॉक्टर साहब आपको बुला रहे हैं।"
मैं जूस वाले भैया उर्फ रामआसरे को वार्ड की तरफ भागते देख रही थी। मेरी फ्रेंड आँखों की कोरों पर आँसुओं को छुपाने की कोशिश कर रही थी।

Wednesday, 1 November 2017

एक थी शी

रोज़ की तरह आज भी शी उसे बेपनाह याद किये जा रही थी। शरीर बुखार से तप रहा था फिर भी उसे अपना नहीं ही का ही ख्याल आ रहा था। एक तरफ ही था जो दूर भागता रहता था। शी कितना भी कोशिश करती पर खुद को नहीं समझा पा रही थी। उसके लि दूरी मौत का दूसरा नाम थी। ही जो पहले उसे इमोशनली सपोर्ट करता था, अब अचानक कतराने लगा था। काफी दिनों से ये सब देखते हुए शी अब अंदर तक टूट गयी थी। एक अलग सा वैक्यूम बन गया था उसके अंदर।
लेटे-लेटे अचानक शी को कुछ घबराहट सी महसूस हुईअनजाने में ही उसका हाथ गले पर चला गया, बहुत खालीपन सा महसूस हुआ उसे। शी के गले में हमेशा ही एक ैन हुआ करती थी। एक रोज़ ही से बाते करते हुए वो कब उसे निगल गयी पता ही न चला। बहुत परेशान हुई थी वो। उसकी परेशानी का सबब ये नहीं था कि चैन गयी या लोगों को क्या जवाब देगी या ैन के बगैर वो रह नहीं पाएगी बल्कि उसे ये लग रहा था कि माँ से नज़र कैसे मिलाएगी? बहुत प्यार से माँ ने उसे गिफ्ट किया था, क्या कहेगी उनसे कि सम्हाल नहीं सकी उनका प्यार या फिर ये कि ही उसके लि माँ से भी ज़्यादा इम्पोर्टेन्ट हो गया था।
आज शी की घुटन का सबसे बड़ा कारण यही है कि ही उसकी जिंदगी में ऐसे मिल गया था जैसे हवा में साँसे घुल जाती हैं पर ही ने एक अलग ही दुनिया बना ली थी। जिसमें हर वो शख्स था जिसे वो अपना कहता था अगर कोई नहीं था तो वो शी।
शी के लि जीने की कोई वजह नहीं थी। यहां तक कि उसने अपने आखिरी वक्त में ही से बोलना भी नहीं जरूरी समझा। कहीं दो शब्द भी न छोड़े अपने ही के लि
रात के दो बजे बिस्तर से उठकर माँ के कमरे में आयी। उसका ये वक़्त चुनने का कारण ही था। वो हर रात दो बजे तक उसकी कॉल का वेट करती रहती थी, आज भी किया पर उसे मायूसी इस कदर निगल चुकी थी कि इंतज़ार को एक और रात नहीं दे सकती थी।
"मुझे माफ़ कर दो माँ, मैंने तुम्हारा दिल दुखाया। अब मुझे जीने का कोई हक़ नहीं।" इतना कहकर माँ के पैरों पर सर रख दिया। अब तक नींद की गोलियां अपना असर कर चुकी थीं।
शी इज़ नो मोर नाउ.....

Monday, 30 October 2017

1 Raat


मेरी प्यारी मेट्रो



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ए मेट्रो, तूने कितना कमज़र्फ
इंसान बना दिया
हज़रतगंज को हल्दीघाटी का
मैदान बना दिया


जब तेरी बनाई भूलभुलैया सी
गलियों से गुजरते हैं
तब अपने ये आलाकमान हमें
बिल्कुल औरंगज़ेब से लगते हैं
दिलकश तहज़ीब के शहर को
बेजान बना दिया।

तू सुबह की नींद ले गयी
हर रोज़ जाम का झाम देकर
खुद आकाश-पाताल की सैर करे
हमें वादे तमाम देकर
मगर ऐ महज़बीं, तूने झूठ बोलना
कुछ और आसान बना दिया।

क्या करूँ आहट भी तेरी
सबको बहुत लगे खूबसूरत
लोग कहते हैं शहर को थी
एक तेरी बहुत जरूरत
ज़मीं की है तू, ज़मीं पे ही रहना
दिल को तेरा अरमान बना दिया।

अब तो आ ही गयी हो तुम
दिल से इस्तक़बाल है तुम्हारा
हम तो तुमपे दिल हारे हैं
बोलो क्या ख़याल है तुम्हारा
अपने भाव ज़रा कम ही रखना
एंटीक नहीं तुमको साजो-सामान बना दिया।


Sunday, 29 October 2017

कचरे से बोतल बीनते बच्चे!


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कचरे से बोतल बीनते कुछ बच्चे
कभी उन्हें टिकाते हैं जमीन से
बैट की तरह,
कभी उन खाली बोतलों में
हवा भरने की नाकाम कोशिश करते हैं,
सूखे फेफड़ों की फूँक से
निकलने वाला संगीत लुभाता है उन्हें;
उन्होंने देखे होते हैं सारे ब्रांड
पर उनकी प्यास बुझाने वाला
है न उनका सुपर ब्रांड
म्युनिसिपलिटी की डायरेक्ट सप्लाई;
क्योंकि ईश्वर ने भी उन्हें भेजा है
डायरेक्ट सप्लाई वाला टैबू बनाकर;
किसी बड़े रसूखदार के मार्फ़त नहीं भेजा
न ही कोई साधारण सा बच्चा बनाकर
वो तो निम्न सोच की
प्रजनन क्षमता का नमूना हैं:
उन्हें कोई गुरेज नहीं
शीत, ताप, बारिश और बर्फीली हवाओं से
उन्हें तो बस इकट्ठी करनी हैं
कचरे से बीनकर
डिब्बे के संग खाली बोतलें।

Tuesday, 24 October 2017

दरियादिली

माँ...माँ... कहता हुआ नन्हा मेहुल स्कूल से आते ही गले से लिपटते हुए माँ को दुलारने लगा पर माँ ने उसे झिड़की दे दी।
"देख नहीं रहा अभी मैं क्या कर रही। शारदा देख मेहुल आ गया है इसका बैग लेकर ऊपर जा, ड्रेस चेंज करा देना। कुछ खिला भी देना, अभी मुझे स्वामी जी के साथ थोड़ा सा वक़्त लगेगा।" नौकरानी को आदेश देते हुए मेहुल की माँ फिर से स्वामी जी की आवभगत में लग गयीं।
तब तक दरवाजे पर एक बच्चा भीख मांगते हुए आ गया, "दीदी रोटी दे दो। दो दिन से भूखे हैं।"
"जा भाग यहाँ से, कोई और दरवाजा देख।"
"दीदी कुछ खाने को दे दो, हमने दो दिन से कुछ नहीं खाया है।" बच्चा बहुत दयनीयता से स्वामी जी की ओर देखने लगा।
"भागेगा यहाँ से या बताऊँ?" इतना कहकर माँ ने दरवाजे बंद कर दिए और स्वामी जी के लिए कपड़े और दक्षिणा सम्हाल कर रखने लगीं।
"माँ, इसमें से कुछ पैसे दे दो न बेचारा बहुत भूखा है।" मेहुल के इतना कहते ही उसकी माँ और स्वामी जी एक साथ गुस्सा करने लगे।
"कहाँ चली गयी शारदा, इसे लेकर जा यहाँ से।" माँ चिल्लाते हुए बोली तभी स्वामी जी बात को काटते हुए बोले, "अच्छा अब मैं भी चलता हूँ।"
"अरे स्वामी जी अभी कहाँ, आपने भोजन तो किया ही नहीं।"
"अभी इच्छा नहीं, फिर कभी।"
"दीदी...दीदी...!" शारदा भागते हुए आयी।
"क्या हुआ शारदा?"
"दीदी, मेहुल बाबा कहाँ?"
"अभी तो यहीं था, कहाँ गया?"
माँ और शारदा सीढ़ियों से ऊपर की ओर भागे। चारों तरफ मेहुल के नाम की आवाजें गूँज रहीं थीं पर उसका कहीं पता नहीं। माँ का बुरा हाल था। शारदा उसके पीछे-पीछे दौड़ रही थी। दोनों गेट से बाहर आये। माँ देखकर अवाक रह गयी। अभी कुछ देर पहले जिस बच्चे को उसने डांटकर भगा दिया था, मेहुल उसे अपना बचा हुआ लंच खिला रहा था। स्वामी जी उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। माँ की आँखों में खुशी और पश्चाताप का मिला-जुला भाव था।

मेरी सोच भी बड़ी खानाबदोश सी हो गयी है

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 मेरी सोच भी बड़ी
खानाबदोश सी हो गयी है,
कभी तुम से उठती है
कभी तुम पे ठहरती है।
भटकते-भटकते न जाने
कितनी गलियों से गुजरती है।

कभी बनती है किसी
भूखे बच्चे की आँसुओ की सदा,
कभी बन जाती है
कोई मासूम सी अनाथ की दुआ
आज बन्द तिजोरी में रखे
कागज़ के टुकड़ों में सो गयी है।

बन जाती है कभी ये
किसी बेवा की हया
कभी कोठों की रंगीनियों में
खोई जफ़ा,
आज ऊँचे घरानों की
बेहया ज़ीनतों से लिपटकर रो गयी है

वो जो मंदिर में सजा है
सोने-चांदी की खनक सा
इत्र-गुलाबों में छुपा है
एक मासूम महक सा
नापाक हवा इनसे मिलकर
हो पाक जो गयी है।

मेरी सोच भी बड़ी
खानाबदोश सी हो गयी है,

Friday, 20 October 2017

हो कोई जवाब तो तसल्ली करा दो!

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ये कहकर अदालत ने
अपना दरवाजा बंद कर लिया
कि आरुषि को
तलवार दम्पत्ति ने नहीं मारा,
लगभग सभी ने राहत की सांस ली;
अगर ये राहत है तो किस बात की,
कि महफूज़ नहीं हैं अब
घरों में भी बेटियां,
कि पहले तो गुनाह
सूरत में हुआ करते थे
अब एलियन गुनाह करते हैं,
कि वक़्त हर ज़ख़्म
भर देता है
कि आरुषि हमारी अपनी तो नहीं,
कि यहाँ तो
हर रात सनसनीखेज होती है
हर गली का एक
किस्सा मशहूर है,
कि सोचने को बस एक
यही बात तो नहीं
एक नन्हीं सी जान
और उसपर सौ अफसाने हैं,
कि....
ये फेहरिस्त बहुत लंबी है
हजारहां सवाल हैं
और दर्द में सुलगती आँखे हैं:
अब वो नहीं आएगी कभी
इंसाफ की भीख मांगने,
मगर सवाल ये है कि
बेटी जब तक घर नहीं आती
घर राह तकता है
फिर उसे सुलाकर
वो खुद भी सो जाता है,
एक रात अचानक उसकी नींद खुलती है
वो बदहवास सा
ये सोचकर बेटी को हमेशा के लिए
सुला देता है
कि कोई और न ये कर दे??
कोई जवाब हो तो तसल्ली करा दो:
कि गुनहगार की सूरत बता दो,
जिस लम्हे इंसाफ हो वो वक़्त मिला दो,
इंसानियत के नाते अपनापन दिखा दो,
वारदात न हो जिसमें वो रात बना दो,
लाल न हो जो गली वो राह दिखा दो,
गर ये भी न सोचूँ, तो क्या मैं सोचूँ,
सोच में फर्क की ये दीवार गिरा दो।

एक और दीवाली की सुबह।

दीवाली की धमधमाती रात की अगली सुबह यूँ तो शांत होनी ही थी। ऐसे में ड्राइव करने का अलग ही आनन्द होता है। पर आज कुछ ज़्यादा ही मौन था चारों ओर। घरों के खिड़की, दरवाजे लॉक थे कि लोग छुट्टी मना रहे थे, इससे भी बड़ा एक कारण था मौनता का कि रोड किनारे हर जगह जानवर चित्त पड़े थे। ये वो प्रहरी हैं जो सुबह होते ही मुस्तैद हो जाते हैं पर आज चौकस नहीं थे क्योंकि जब हम तेज आवाज में पटाखे फोड़कर दीवाली की खुशियां मना रहे थे तब ये छुपने को जगह तलाश कर रहे थे।
हम अपनी खुशियां मनाने के लिए कभी-कभी किसी को दूर तक परेशानी में डाल देते हैं। इन जानवरों का क्या क़ुसूर था कि रात भर आराम की नींद नहीं सो पाए। दीवाली की खुशियां जरूर मनाइए पर अपने आस-पास जानवरों, बुजुर्गों और बच्चों का ख़याल करके। ऊंची-ऊंची बिल्डिंग की छोटी तंग गलियों में डेसिबल की धज्जी उड़ाते फोड़ू बम महज पैसों का बेजा प्रदर्शन है। बेहतर होगा कि आप अपनी सामग्री को एकत्रित कर एक पार्क में निकल जाइए और खूब मनाइए दीवाली का जश्न।
त्योहार मनाना ग़लत नहीं बस आपका तरीका सही हो।

Wednesday, 18 October 2017

इतिश्री.... एक बुझे हुए दिये की।

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शहर के कोलाहल से दूर
जंगल के वीरानों में
नयी सड़क से लगी हुई
पुरानी पशेमां गली पर
ज़्यादा दूर नहीं
उस पीपल के पीछे
एक टूटा-झुका सा
पर खण्डहर नहीं
हाँ उम्मीद का मारा
इस दरवाजे से जाता हुआ
उस निकास के आगे
बस बरसों में अपनी उम्र गिनकर
इतने ही कदम चलो
यही तो है वो आबो-हवा
जो तुम्हें बुला रही है
आशीष देने को
ये गूलर, ये नीम
और इनके नीचे सो रही
तुम्हारी माँ
इन्हीं के सिरहाने पापा भी तो हैं
ऊर्ध्वाधर लेटे
जब तक साँस थी
एक चम्मच पानी के भी
गुनहगार न हुए
आज उनकी समाधि पर
दीपक जलाकर दे ही दो
अपने जीवित होने का प्रमाण
फिर उल्टे पैरों लौटोगे
मुझे पता है
बीवी को शॉपिंग करानी है
जाते-जाते कहीं से लंब
तो कहीं से क्षैतिज हुए
खण्डहर नुमा हवेली के
एक पाये पर सर टिकाकर
श्रद्धांजलि दोगे।
इतिश्री।

Sunday, 15 October 2017

ऑटो अपडेट वर्जन

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लोग कहते हैं
समय के साथ
प्यार पुराना हो जाता है,
मगर जान
तुम तो हमारा
ऑटो अपडेट वर्जन हो,

न पुराने होगे
न बदलने पड़ोगे;
हो भी तो वायरस फ्री,
विश्वास और मोह के
दो पायों पर टिकी
शीत, ताप, बारिश की छत हो जैसे:

जब 25 अप्रैल को
लोग कहते हैं....
धरती हिली थी,
हम तो
जैसे तुम्हारी लहर की गोद में थे,
भूकम्प
हमारा पता जाने बगैर ही गुजर गया;
अच्छा है जो अपना इश्क़ हार्डवेयर नहीं है
 
छुप जाते हो,
कलम की स्याही,
शब्दों की खुशबुएँ बनकर;
ये न जताना
कि तुम इस अनारकली के
शहजादा सलीम हो,
कहीं जहाँपनाह की शमसीर
सौ बार हमें जिबह न कर दे,
किसी ने छुप-छुपकर
मिलते-मिलाते देखा भी तो
सौ बार गंगा मइया से बोला
बस इस बार बचा लो,
कल ही हरिद्वार आते हैं
पिछले हर कसम की डुबकी लगाने:

खण्डहर की छत पे
हो एक टूटी खाट
स्याह नभ के तले
तुम्हारी कलाई थामे हो हमारा हाथ
और हमें क्या चाहिए,
ए सी कमरों में
बनावटी सामानों के बीच
पहाड़नुमा चीड़-सागौन के
नक्काशीदार बेड की नरम बिछावन पर
तुम स्लो सिस्टम लगते हो हमें:

हम प्यार बेशुमार करते है,
  इस प्यार में
नहीं कोई इतवार करते हैं,
और ऐतबार से कहते हैं
अगर प्रेम जैसे खौफनाक
मगर यूनिवर्सल ट्रूथ को आगे बढ़ाया जाए,
तुम्हारे जैसे आशिक़ को
हमारे जैसी महबूबा से मिलाया जाए,
तो थर्ड वर्ल्ड वार खयालों में भी न होगा।

Friday, 13 October 2017

नानी का पिटारा

नानी के देहावसान के बात से ही उस संदूक की चाभी तलाश की जा रही थी। बच्चे से बूढ़े तक की नज़र थी उस पर।
'आखिर क्या होगा उसमें जो नानी कभी खोलती भी थी तो अकेले में' पूर्वी के माथे पर ये कहते हुए बल पड़ गए थे आखिर 20 साल से वो यही देख रही थी।
सोचती तो वो भी रहती थी पर माँ और मामी की बातों से बिल्कुल भी सहमत न थी कि नानी ने इसमें बहुत पैसे जमा कर रखे होंगे।
आखिरकार वो दिन आ ही गया। नानी की मौत की हड़बड़ी में वो चाभी कमर से निकलकर कहीं गुम गयी थी, ताला तोड़ना पड़ा। संदूक ऊपर तक भरी थी। एक-एक सामान निकाला जा रहा था। किसी को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि सबकी नजरें तो वो ढूंढ रही थी जो अब तक नहीं निकला था। संदूक का पूरा सामान कमरे में तितर-बितर था। सभी की जिज्ञासा शांत हो गयी थी। एक-एक कर सारे लोग जा चुके थे। पूर्वी और उसकी माँ हर सामान को देखकर खुशी से भर जाती थी।
'ये देख तेरे भइया के मोजे जो मैंने बुने थे और वो भी पहली बार' माँ पूर्वी से बोली।
'ये कितना प्यारा है छोटा सा, किसका है?'
'अरे ये तेरे बचपन का है।'
'ये देखो माँ!' पूर्वी ने श्वेत-श्याम चित्रों से सजा एक पुराना अलबम दिखाते हुए कहा।
माँ-बेटी यादों की रंगीन गलियों में भटक गयी थी। आज इन्हें ये अहसास हुआ था कि कीमत सिर्फ पैसे और गहनों में ही नहीं उन यादों की भी  होती है जो गुजरकर फिर नहीं आती।

Tuesday, 10 October 2017

उन्मुक्त होकर जीने दो न हमें!


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प्यार के बंधन में तो बंध जाते हैं सभी
आज उन्मुक्त होकर जी लेने दो न हमें,
सीने से लगा लो आज फिर हमको
कुछ न कहो लबों को सी लेने दो न हमें,

समंदर की रेत पर कुँवारी ख्वाहिश के नाम
तुमने हमको जो इक पैगाम लिखा था,
खुद को शहजादा
हमारे तन-मन का
और
हमें ज़िन्दगी का अंजाम लिखा था,
दिल में हूक वो फिर उठती है,
इक तलब सी मन में जागी है,
रेत के मकां ढह गए
अरमां तो अब भी सुलगते हैं,
बियाबान सा हर मंजर बनाकर चले गए,
आओ न कि अहसास की बारिश कर दो
जिस्म की खुशबू का असर जी लेने दो न हमें।

न पैसों की बारिश, न इज्जत न शोहरत
न खुशियों का बिस्तर न सोने की थाली
हमें जीने मरने की सुध ही कहाँ है
तुम्हारे लिए अब समाधि बना ली
लिखते हैं तुम्हारा नाम हर शाख पर बुटे पर
लेते हैं सुध तुम्हारी हर तितली हवा से
ढूंढते हैं तुम्हें हर मौसम में दर-ब-दर
मानसून सी तुम्हारी लुका-छिपी चलती है
आओ न किसी बारिश में एक छतरी तले
आधे-आधे हम तुम
तुम्हारे नूर का पानी लबों से पी लेने दो न हमें।

 आसमान की चूनर ओढ़नी बना दो हमारी
अपने कदमों की धूल से मांग सजा दो
दूर न करो पलकों का आशियाना
अपनी परछाईं में हमारा शामियाना बना दो
तुम्हारी आगोश में हर रात, सुहागरात है
आओ न कि हमारे दर्द को ढक दो
अपने छुवन की एक नूरानी रात दे दो न हमें
घुट रही तुम बिन बेसबब ज़िन्दगी
सियाह रातें हैं दिन बस एक उलझन
तुम्हारे आने की खुशी में महका है ये मन
वो घूँट मुक़द्दस खुशियों के पी लेने दो न हमें।

Saturday, 7 October 2017

तुम्हारी उष्णता को घूँट-घूँट पियेंगे!


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हमारे मन के अधूरेपन को
आकार देती तुम्हारी पूर्णता
और तुम्हारे न होने पर
पल-पल पिघलती हमारी लघुता,
इसको साकार करना है हमें
नीलगगन का मिलन बनकर।
तुम्हें चाँद क्या कहें
तुम तो आसमान हो हमारे,
तुम्हारे फैलाये हुए डैने ही तो
हमारी छाँव हैं;
सुनो आज की रात थाल में
हमारे स्नेह का
हल्दी और अक्षत होगा,
छलनी से चमक रही हमारे चाँद की आभा
श्रंगार के यौवन को और बढ़ाएगी,
तुम रूप, रस, माधुर्य भरा घूँट पिलाओगे,
हमें प्रेम की गलियों में
दामन थामकर टहलाओगे,
तुम्हारे लिए गणेश चतुर्थी नहीं
हम तो हर वार व्रत रहेंगे,
आज की रात हम प्रेम का मधुमास जियेंगे,
तुम्हें पल-पल दिल में उतारेंगे,
तुम्हारी ऊष्णता का घूँट-घूँट पियेंगे,
अहसास की चादर तले
सुखन की धीमी आंच पर,
तुम्हारे नेह की हांडी में
जीवन का लाजवाब दाल-भात चखेंगे।

Friday, 6 October 2017

वो तेरह दिन...





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कोई न बचाता मेरा अस्तित्व मेरी आत्मा के देह छोड़ने पर बड़के की माँ भड़क गई थी। पहली बार देखा था उसका इतना रौद्र रूप मैंने जब वो अनुनय-विनय न करके आदेश सुना रही थी।
'तेरे बापू के सारे संस्कार वैसे ही होंगे जैसा वो कह कर गए थे। जिसको रुकना है रुको, जाना है जाओ, अभी उनकी धर्मपत्नी ज़िंदा है। मुझे ईश्वर ने सुहागिन नहीं बुलाया अपने पास जाने किन कर्मों की सजा थी, अब ये गुनाह करके मैं उनकी आत्मा नहीं दुखाउंगी। सुन बड़के छोटे से भी कह दे, समझा दे उसे नहीं रुकना चाहता तो जा सकता है पर मैं ये तेरह दिन पूरे तेरह दिन मनाऊंगी। चाहे तो तेरहवीं के भोज में आ जायेगा न चाहे तो वहीं किसी जगह मना ले।'
कहते-कहते सौदामिनी का ब्लड प्रेशर हाई हुआ जा रहा था। फिर भी वो पूरे जोश के साथ आगे बढ़कर सब कर रही थी। आज मेरी आत्मा को मुक्त हुए 20 घंटे ही हुए थे। पहले तो शरीर को पंचतत्व में विलीन करने की जल्दी थी फिर शमशान घाट से वापिस आते ही इस बात पर विचार-विमर्श चल रहा था कि तेरहवीं संस्कार तीन दिनों में सम्पन्न कर दिया जाए। छोटे को ऑफिस देखना था और उसकी पत्नी गांव में एडजस्ट भी नहीं कर पाती थी सो उसका पूरा दबाव था बड़के पर कि जल्दी करे। बड़का कुछ बोलता इससे पहले ही उसे ये कहकर चुप करा दिया गया कि तुम गांव में रहने वाले क्या जानो शहर में किस तरह से एडजस्ट करना पड़ता है। बड़के की पत्नी भी छोटे को देखकर भाव खा रही थी, 'अरे मेरे बच्चे का इम्तिहान है।'
सौदामिनी की दो टूक बात सुनकर सबकी बोलती बंद हो गयी थी। निर्णय एकतरफा और ज़ोरदार था, सभी को मानना ही था। 
'ठीक है माँ, आप जैसा उचित समझो।' इतना कहकर वो माँ के पास खाट पर बैठ गया था। 
'छोटे को और उन दोनों को भी बुला लो।'
सभी माँ को घेरकर बैठ गए। पहली बार इस बैठक में मैं नहीं था। सभी बात शुरू करते इससे पहले ही गला भर आया, आवाज रुँध गयी सभी की। 
'माँ, ये लीजिये पानी।' पानी का गिलास माँ को देते हुए छोटी बहू ने कहा।
माँ ने गिलास एक तरफ रखने का इशारा किया। सारी भूख-प्यास तो मैं ले आया था। कैसे रहेगी वो मेरे बगैर, उसकी पल-पल की आदत था मैं। सब तो अपने आप में ही व्यस्त थे, मैं ही तो था जो उससे झगड़ता था उसका अकेलापन बांटने को। 
किसी तरह से बातचीत आगे बढ़ाई गई। माँ ने गरुण पुराण से लेकर तेरहवीं भोज तक की सूची बनवा दी थी। बच्चे बार-बार काना-फूसी शुरू करने लगते फिर माँ की भृकुटी देखकर शांत हो जाते। जब बात समय से हटी तो पैसे पर आ गयी थी। सभी का ये मानना था कि इतनी फिजूलखर्ची की क्या जरूरत। पर माँ की ज़िद के आगे किसी की न चली।
सौदामिनी तो मेरी मौत को एक उत्सव के रूप में मनाने को आतुर थी। उसे यही लगता था जैसे मैं अब भी उसके आसपास हूँ। उसका जानलेवा लगाव मेरी परेशानी का सबब था पर अब मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था। अब तक सब लोग अपने-अपने कमरे में जा चुके थे। सौदामिनी बिस्तर पर करवट बदल रही थी। दुःख से ज़्यादा ज़िम्मेदारियों का भाव था उसके ऊपर जिसे वो बखूबी निभा रही थी। सब अपने-अपने कमरे में बस इसी उधेड़बुन में जग रहे थे कि ये काम तो कम समय और पैसे में भी हो सकता था फिर इसके लिए इतना करने की क्या जरूरत? उधर सौदामिनी की सोच थी कि जब सारे काम चलते रहते हैं, शान-शौकत दिखाने का वो कोई मौका नहीं छोड़ते फिर इसे फिजूलखर्ची कैसे कह सकते हैं। जब मैंने किसी के शौक और दिखावे को फिजूलखर्च नहीं कहा फिर किसी का क्या हक़ है अपना ही पैसा खर्च करने से रोकने को?
सौदामिनी ने बस यही कहकर सबको चुप कराया था कि इतना पैसा तो अभी उनकी पेंशन बुक में ही पड़ा है कि सारे काम निपटाने के बाद भी बड़का अपने बच्चे की फीस और छोटा नए मकान का डाउन पेमेंट कर सकता है। मैं असहाय सा शरीर के मोह से आज़ाद मगर आत्मा की दासता में जकड़ा हुआ था। जीवन भर इन लोगों के लिए जान गला दी अब भी इतना कुछ छोड़ आया कि आराम से रह सकते हैं फिर भी मेरी आत्मा के तर्पण के लिए मेरी पत्नी को संघर्ष करना पड़ रहा है। मेरे बीज से जन्मे मेरे अपने बेटे क्या इन्हें भी मैं एक रिश्ता ही समझूँ। मेरा शरीर नहीं रहा तो ये मेरे होने का अस्तित्व ही नकार रहे हैं। क्या होगा इनका खुद का भविष्य, कहीं मुझसे बुरा तो नहीं? मेरी आत्मा घुटी जा रही थी।
जाने क्यों होता है ऐसा जितना हम बड़े अपने बच्चों के बारे में सोचते है आखिर वो क्यों नहीं समझते इस बात को या फिर नासमझी के भंवर में रहते हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव में बुजुर्ग जाए तो कहा जायें। जब मेरा जीवन बच्चों की जिम्मेदारियों को पूरा करने में समिधा बनकर हवन हो रहा था तब मैंने न तो खुद की जरूरतों के बारे में सोचा न ही अपने आस-पास की दुनिया के बारे में। बच्चों के लिए कितनी बार माँ-बाप भूखे सोते हैं, कितनी ही बार अपनी रातों की नींदे खोते हैं और उन्हें इस बात की भनक तक नहीं होने देते फिर भी एक उम्र होने पर उपेक्षा की दहलीज़ पर आ ही जाते हैं। 
आज जब मेरे न होने पर सौदामिनी का ख़याल बच्चों को सबसे ज़्यादा रखना चाहिए था तो उसे कर्म-कांड के नाम पर अस्तित्व बचाये रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। इसके बाद तो फिर कभी न आऊंगा मैं किसी हक़ की भीख मांगने। मेरी जड़ आत्मा इस सत्य को नहीं पाई आज तक कि शौक और फैशन के नाम पर लुट जाने वाले लोग आस्था और विश्वास के नाम पर खुद को कंजूसी के बिलों में क्यों रोप लेते हैं। किस दिशा में भटककर जाएगी आने वाली पीढ़ी? किस रूप में आएंगे ईश्वर प्रचंड मार्तंड का अस्तित्व बचाने? कहते हैं माता-पिता में ईश्वर दिखता है पर जब इनकी सुनी ही न जाये तो क्या कहेंगे? 
दूसरी ओर कलयुग के माता-पिता हैं जाने कौन से संस्कार से बांध रहे हैं बच्चों को, क्या समझेंगे ये हमारी संस्कृति, तहज़ीब और मूल्यों को। ये तो दिखावे के गुलाम बने जा रहे। पाश्चात्य के मोह में ऐसे घुलते जा रहे कि अपनी सभ्यता मजाक लगती है। जब बच्चे जनेऊ धारण करने के बाद भी उसका मतलब नहीं समझते तो क्या समझेंगे तेरहवीं के तेरह दिनों का अभिप्राय। काश कि मैं एक बार फिर आ पाता और इस बार अपना जीवन बच्चों की जरूरतों में न गंवाकर उन्हें सांस्कारिक बनाने में लगाता। 
सौदामिनी ने एक जश्न की तरह वो तेरह दिन मनाए। हर किसी से यही कहती कि क्यों रोये किसी बात का तो ग़म नहीं इसके अलावा कि सुहागिन नहीं मरी। इतना भरा-पूरा परिवार छोड़ गए अपने पीछे, सारे कर्म-कांड किये जीवन के। हर ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाते थे। बच्चों की ख्वाहिश तो क्या, बच्चों के बच्चों की भी पूरी करते थे। एक बच्चे ने पिछले हफ्ते नई सायकिल छूने पर लकी को डाँट दिया था, घर आया तो बड़के ने भी मारा। उसके दादाजी से नहीं देखा गया तुरन्त नई सायकिल दिलाई। ये तो सही है कि उनके जाने पर उनकी बहुत कमी रहेगी पर वक़्त आ गया था। ऐसे ही एक दिन मुझे भी अपने पास बुला लेंगे....इतना कहते-कहते ज़ोर की खाँसी आयी और गला एक तरफ लुढ़क गया था। सौदामिनी भी अपनी चिरनिंद्रा में लीन हो गयी थी। उसकी मौत पर बच्चे फूट-फूट कर रोये थे। बड़के ने कहा दिया था माँ का अंतिम संस्कार और सारे कर्म-कांड वैसे ही होंगे जैसे बापू के हुए। छोटे ने भी सहमति दे दी थी।