Coffee with Abhi

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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

तुम्हें ज़िंदगी कह तो दिया

उस रोज़ पूछा था किसी ने हमसे
तुम्हारा नाम क्या है
हमने ये कहकर उन्हें
मुस्कराने की वजह दे दी
कि एक दूसरे का नाम न लेना ही तो
हमारा प्रेम है...
कितने बावले हैं लोग
कि वो तुम्हें कहीं भी ढूंढ़ते हैं
मेंडलीफ की आवर्त सारणी में,
न्यूटन के नियम में,
पाइथागोरस की प्रमेय में,
डार्विन के सिद्धांत में,
अंग्रेजी के आर्टिकल में,
हिंदी के संवाद में,
विषुवत रेखा से कितने अक्षांश की
दूरी पर बसते हो,
जानना चाहते हैं अक्सर लोग
बातों ही बातों में.
पर हम तो तुम्हें बस
ज़िन्दगी के नाम से जानते हैं.
कैसे कहें लोगों से
हम तुम्हें याद तक नहीं करते
तुमसे निकलने वाली चमक को
आइरिश अवशोषित कर
उर तक प्रेषित कर देता है,
और जब तुम हृदय में हो
तो निकट दृष्टि दोष होना स्वाभाविक है.
तुम हर कदम इस तरह साथ हो
कि तुम्हारी छाया में
अपना अस्तित्व खोना
हमें अप्रतिम होने का भान कराता है,
अनुभव करते हैं हर रात जब तुम्हें
अपने बिस्तर की सिलवटों में
गर्व होता है...
जीवन में तुम्हारे होने पर,
कि कितने ही और जन्म मांग ले
ईश्वर से
जीवन की समानांतर पटरी पर चलने को
तुम्हारे साथ
तुम्हारे लिए
नाम के नहीं...जन्म-जन्मांतर के साथी.

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

एक शहीद की विधवा


बापू बोला चल पीहर ऐसे देख नहीं सकता तुझको
बेटी कहती ये मेरा घर तो छोड़ नहीं सकता मुझको
जिस दिन ब्याही गई थी इनसे 
बारातें तुमने बुलवाई
धूमधाम से विदा किया
बजवाई थी शहनाई
आज तिरंगे में सजकर
वो आएं हैं मन भर लेने दो
कहां मिलेंगे फिर मुझको
दरस ये अंतिम कर लेने दो
बस इतना कहती बेटी
होश में जब भी आती है
माह हुआ ये सुन सुन कर
पिता की छाती फट जाती है
कुछ बोल नहीं पाता बापू, अंगारों सा रोता है
दहक दहक कर दिन बीते, दर्द ही रात में सोता है
फिर कहता...चल पीहर ऐसे देख नहीं सकता तुझको
बेटी कहती ये मेरा घर तो छोड़ नहीं सकता मुझको
दरवाज़े पर देखूं जरा
ये दस्तक उनकी लगती है
तन्हा कहां कभी आते वो
कहकहों की महफ़िल सजती है
उनको नहीं कभी भाती मैं
सूनी मांग दिखे जब भी
बिंदिया, गजरे से सज जाऊं
झुमके, महावर और कंगन भी
श्वेत वसन बापू दिखलाता और फ्रेम चढ़ा वो चन्दन हार
चला गया फ़िर आए न अब तू किसके लिए करे सिंगार
फ़िर कहता...चल पीहर ऐसे देख नहीं सकता तुझको
बेटी कहती ये मेरा घर तो छोड़ नहीं सकता मुझको
तस्वीरों से बातें करती
उम्मीदों में रातें गढ़ती
उसकी पसंद के व्यंजन चखती
मद्धम आंच में चाय खौलाती
पल्लू बांधती नेह की चुटकी
याद में उनकी इतराती
मन ही मन बस पिया की बातें
और कहां कुछ उसको भाती
हार गया बापू भी अब, कैसे छुपाए ख़ुद की चीत्कार
हिल न सका इक पल को स्नेह भी, हार गई उसकी मनुहार
कैसे कहे...चल पीहर ऐसे देख नहीं सकता तुझको
जीत रही ज़िद बेटी की रोक लिया है अब खुद को


*ये उस दर्द की अणु भर दास्तां है.
#martyr #shraddhanjali #why_pulwama 
    

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

ज़िन्दगी...बस तुम चाहिए


वैलेंटाइन बनोगे हमारे

PC: Google

एक पाती प्रेम की



प्रेम कविता लिखनी थी
सब कुछ तो है
कागज़, कलम, स्याही
बस प्रेम का रंग नहीं
क्या कहते हो बोलो
......छोड़े दें या....
ला रहे हो
वो गुलाबी रंग 
हमारे अंतस वाला...




सस्नेह
तुम्हारी ...
क्या लिख दें बोलो?



चुंबन प्रेम की ऊर्जा है


मेरी पहली पुस्तक

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