“हाउ ब्यूटीफुल कितना हर्बल मौसम है ना”
“भला मौसम भी कभी हर्बल होता है”
“हाँ हाँ क्यों नहीं! होता है ना हर्बल.”
“अच्छा तो तुम्हारे शहर की भाषा में इसे हर्बल मौसम कहते हैं?”
“हाँ हमारे शहर की भाषा में इसे हर्बल कहते हैं. अच्छा एक बात तो बताओ कितने दिनों के बाद आज तुम हमारे सो कॉल्ड शहर जा रहे हो?”
“मुझे ठीक-ठाक याद नहीं”
“मतलब?”
“मतलब यह है कि मैं भूल गया”
“ओह वह तो मुझे समझ में आ गया. लेकिन ऐसा क्यों?”
“तुम ही बताओ, तुम्हें कैसे पता चलता है समय का, तारीख का, महीने का, दिन का?”
“ऑफकोर्स कैलेंडर. हमारे पैर तो कैलेंडर की रिदम पर चलते हैं. तुम्हें पता है एक भी मिनट की देरी कितनी बड़ी प्रॉब्लम बन जाती है और एक घंटे की देरी एक दिन को भी आगे बढ़ा सकती है.”
“और अगर एक दिन लेट हो जाए तो?”
तो कभी-कभी तो जीवन ही...इतना कहकर कुरिंजी खो गयी थी अपने कल में. कल की ही तो बात है जब पापा और मम्मा ने यहाँ की कितनी यादें साझा की थीं. किस तरह वो दोनों पहली बार यहाँ मिले थे जब इन पहाड़ियों ने नीली चादर ओढ़ रखी थी और पूरे बारह साल की कोर्टशिप के बाद दोनों ने इन्हीं वादियों को साक्षी मानकर सप्तपदी की रस्में निभायी थीं.
उसकी आँखें सामने फैले नीलकुरिंजी को देख रही थीं. यह उस जादुई पल का दृश्य है जब कुरिंजी अपने साथी के साथ बैंगनी रंग के नीलकुरिंजी फूलों से ढकी हसीन वादियों को निहार रही है. फूलों की यह चादर पहाड़ियों पर दूर तक फैली हुई है, जो इस दृश्य को और भी शांत और खूबसूरत बना रही है लेकिन उसकी दृष्टि कहीं बहुत दूर, अतीत के उस धुंधले और खौफनाक पन्ने पर अटकी हुई थी जिसे वह पिछले दो सालों से पलटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ चुकी थीं और हाथों की उंगलियाँ अनजाने में ही कसकर मुट्ठी में तब्दील हो गई थीं.
"कुरिंजी? कहाँ खो गई तुम?" उसके साथी ने उसके चेहरे के सामने हाथ हिलाते हुए पूछा.
लेकिन कुरिंजी उस समय एक ऐसे भंवर में थी, जहाँ से बाहर आना आसान नहीं था. उसके कानों में आज भी वह सायरन गूंज रहा था. एम्बुलेंस का वह चीखता हुआ सायरन, जो मदद की गुहार लगा रहा था, लेकिन सुनने वाला उस दिन कोई नहीं था.
दो साल पहले की ही तो बात थी. कुरिंजी तब 19 साल की थी. उसकी आँखों में चमक थी, दिल में एक जुनून था और भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा सपना, डॉक्टर बनने का सपना. उसने दिन-रात एक करके NEET की परीक्षा पास की थी. रिजल्ट वाले दिन पूरे घर में मानो दीवाली मन रही थी. पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था और माँ ने तो मोहल्ले भर में मिठाइयाँ बाँट दी थीं.
लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुरिंजी के पैरों की लय जो हमेशा 'कैलेंडर की रिदम' पर चलती थी, उसे वक्त ने एक ऐसा झटका दिया कि सारी रिदम ही टूट गई.
वह एक मनहूस मंगलवार की सुबह थी. पापा को अचानक सीने में तेज दर्द हुआ. दर्द इतना भयानक था कि वह पसीने से तर-बतर होकर जमीन पर गिर पड़े. कुरिंजी और उसकी माँ ने बिना एक पल गँवाए एम्बुलेंस बुलाई. कुरिंजी ने अपने मेडिकल नाॅलेज के आधार पर पापा को सीपीआर देने की भरसक कोशिश की थी. एम्बुलेंस आयी और वे अस्पताल की ओर भागे. माँ घर पर रुक गयी थीं ताकि पापा के मेडिकल पेपर्स और कुछ पैसे लेकर स्कूटी से सीधे अस्पताल पहुँच सकें. हमेशा साथ रहने वाली मासी और उनका परिवार कल ही तो गया था बाहर छुट्टियाँ मनाने. किसी को क्या पता था कि आज यह हो जायेगा.
एम्बुलेंस सायरन बजाते हुए शहर की सड़कों को चीर रही थी. कुरिंजी पापा का हाथ पकड़े, उन्हें ढांढस बंधा रही थी, "बस पाँच मिनट पापा, हम अस्पताल पहुँचने वाले हैं. सब ठीक हो जायेगा."
तभी एम्बुलेंस अचानक एक चौराहे पर आकर रुक गयी. ब्रेक की तेज आवाज से कुरिंजी का दिल दहल गया. उसने खिड़की से बाहर देखा तो पाया कि पुलिस ने चारों तरफ से रास्ता बंद कर रखा था। बैरिकेड्स लगे हुए थे और भारी पुलिस बल तैनात था.
"क्या हुआ भइया? गाड़ी क्यों रोक दी?" कुरिंजी ने घबराते हुए ड्राइवर से पूछा.
"मैडम, आगे वीआईपी मूवमेंट है. किसी बड़े नेता का काफिला गुजरने वाला है. ट्रैफिक रोक दिया गया है."
‘लेकिन यह एम्बुलेंस है! मेरे पापा को कार्डियक अरेस्ट हुआ है, उन्हें तुरंत मेडिकल अटेंशन की जरूरत है. प्लीज, उन्हें कहिए हमें जाने दें! कुरिंजी लगभग चीख पड़ी.
ड्राइवर ने सायरन की आवाज और तेज कर दी उसने नीचे उतरकर पुलिस वाले से मिन्नतें भी कीं, लेकिन वर्दी की हनक और प्रोटोकॉल के आगे एक आम इंसान की जान की क्या कीमत थी? "पीछे से ऑर्डर है, जब तक काफिला नहीं निकल जाता, यहाँ से एक पत्ता भी नहीं हिल सकता," पुलिस वाले का रूखा जवाब था.
कुरिंजी एम्बुलेंस के अंदर वापस आई. पापा की साँसें उखड़ रही थीं. मॉनिटर पर ईसीजी की लाइनें बेतरतीब हो रही थीं. वह एक-एक सेकंड गिन रही थी. समय, जिसे वह अपनी मुट्ठी में समझती थी, आज रेत की तरह फिसल रहा था. पापा को इसी हालत में छोड़ वह एक बार फिर एंबुलेंस से नीचे उतरी. उसे पता था कि इन छोटे पुलिस वालों से कहकर कुछ नहीं होगा वो तो आदेश का पालन कर रहे हैं. वह सीधे इंस्पेक्टर के पास पहुँची. उसने हाथ जोड़ा, रोयी, गिड़गिड़ाई. इंस्पेक्टर भी बिल्कुल गंभीर मुद्रा में आ गए थे. शायद वह कुरिंजी का दर्द समझ रहे थे. कुरिंजी ने समय न गँवाते हुए उनके पैरों पर अपना सिर रख दिया, “प्लीज मेरे पापा को बचा लीजिए.” अब इंस्पेक्टर का दिल बिल्कुल पसीज गया और उन्होंने कहा, “आप गाड़ी में बैठिए. ड्राइवर से कहिए एंबुलेंस स्टार्ट रखें और मैं अभी इसे खोलता हूँ लेकिन एक मिनट की भी देरी न हो पाए आप निकल जाइए. साहब को आने में तीन मिनट का समय लगेगा. कुरिंजी आश्वस्त होकर एंबुलेंस पर जा बैठी. सब कुछ कहे अनुसार हुआ. जैसे ही कुरिंजी के लिए वह बैरिकेड हटाया गया, एम्बुलेंस बाहर निकली. सेकंड्स में ही सब कुछ हुआ. तभी किसी कारिंदे की गाड़ी आ धमकी. अगर यहाँ साहब होते तो शायद एंबुलेंस को निकल जाने देते उन पर बहुत जिम्मेदारियाँ होती हैं. लोगों के सवाल होते हैं लेकिन वह ठहरा कारिंदे… उसने नहीं जाने दिया. कुरिंजी के पापा ने कुरिंजी का हाथ पकड़ते हुए कहा, “माँ का ध्यान रखना”
कुरिंजी कहती रही, पापा कुछ देर और कुछ मिनट्स की ही तो बात है. इस बीच वीआईपी मूवमेंट हो चुका था. एंबुलेंस जैसे ही आगे बढ़ गये थे. हमेशा के लिए चले गए इस दुनिया से. सब कुछ खत्म हो चुका था. दस मिनट... पंद्रह मिनट... बीस मिनट. सामने से सायरन बजाती हुई दर्जनों सफेद और काली गाड़ियाँ गुजरीं. उन गाड़ियों में बैठे लोगों को शायद इस बात का इल्म भी नहीं था कि उनके कुछ मिनटों के सफर की कीमत एक परिवार को अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकानी पड़ रही है.
जैसे ही आखिरी गाड़ी गुजरी और बैरिकेड्स हटे, मॉनिटर पर एक लंबी, सपाट 'बीप' की आवाज गूँज उठी. पापा का हाथ जो कुरिंजी ने कसकर पकड़ रखा था, अब ठंडा पड़ चुका था. एम्बुलेंस अस्पताल तो पहुँची, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. एक घंटे की देरी ने एक दिन को आगे नहीं बढ़ाया था, बल्कि एक जीवन को ही हमेशा के लिए खत्म कर दिया था.
अस्पताल के स्ट्रेचर पर पापा के बेजान शरीर को देखकर कुरिंजी पत्थर हो गई थी. उसके आँसू सूख गए थे. वह बस उस दीवार घड़ी को घूर रही थी, जिसकी टिक-टिक अब उसे किसी हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी.
तभी उसके फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर था.
"हैलो, क्या आप कुरिंजी बोल रही हैं?"
"जी..."
"आपकी माँ का एक्सीडेंट हो गया है. वह स्कूटी से अस्पताल की तरफ आ रही थीं, तभी चौराहे पर ट्रैफिक खुलने की वजह से मची अफरा-तफरी में एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी है. उन्हें सिटी हॉस्पिटल में लाया जा रहा है."
फोन कुरिंजी के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ा. उस दिन समय ने सिर्फ एक बार नहीं, दो बार क्रूरता दिखाई थी. जब तक कुरिंजी इमरजेंसी वॉर्ड की तरफ भागी, तब तक माँ भी दम तोड़ चुकी थीं.
चंद घंटों का फासला और कुरिंजी की पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी.
अंतिम संस्कार, रस्में, और रिश्तेदारों की भीड़, सब कुछ किसी धुंधले सपने की तरह बीत गया. कुरिंजी एक मशीन की तरह काम कर रही थी. लेकिन उसके अंदर का इंसान मर चुका था.
ठीक पंद्रह दिन बाद, उसकी NEET की काउंसलिंग थी. वही काउंसलिंग, जिसके लिए उसने और उसके माता-पिता ने इतने सपने बुने थे. काउंसलिंग का कॉल लेटर उसकी मेज पर रखा था. सुबह के 10 बज रहे थे. उसे दोपहर दो बजे तक शहर के मेडिकल कॉलेज में रिपोर्ट करना था.
कुरिंजी उस लेटर को देखती रही. उसके कानों में फिर से वही एम्बुलेंस का सायरन और पुलिस वाले की आवाज गूंजने लगी 'पीछे से ऑर्डर है.’
क्या फायदा ऐसी पढ़ाई का? क्या फायदा ऐसा डॉक्टर बनने का, जब सिस्टम और समय की बेरुखी के आगे एक डॉक्टर भी बेबस हो जाता है? क्या वह उस शहर में वापस जा सकती है जिसने उसके माता-पिता को निगल लिया? वह शहर, जिसकी सड़कें उसे अब किसी अजगर की तरह लगती थीं.
उसने घड़ी की तरफ देखा. 11 बजे. 12 बजे. एक बजे. दो बज गए. काउंसलिंग का समय निकल गया. कुरिंजी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. उसने अपने भविष्य, अपने मेडिकल करियर को अपनी आँखों के सामने खत्म होते हुए देखा और उसने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की. समय ने उससे बहुत कुछ छीना था, आज उसने भी समय को अपना सपना सौंप दिया.
"कुरिंजी! ओ कुरिंजी!"
साथी की तेज आवाज ने अंततः उस भंवर से उसे बाहर खींच लिया. कुरिंजी ने एक गहरी साँस ली. दो साल बीत चुके थे. इन दो सालों में वह शहर छोड़कर इस छोटे से पहाड़ी कस्बे में आ गई थी. यहाँ का शांत माहौल, प्रकृति, और भागदौड़ से दूर यह जीवन यही उसका सहारा बन गया था.
"क्या यार, तुम तो बोलते-बोलते ही किसी दूसरी दुनिया में चली गई," साथी ने हल्की सी झुंझलाहट और चिंता के साथ कहा.
कुरिंजी फीकी सी मुस्कान के साथ बोली, "कुछ नहीं, बस ऐसे ही पुरानी बातें याद आ गईं. तुमने पूछा था ना कि मुझे समय का कैसे पता चलता है?"
"हाँ, और तुम 'जीवन ही” कहकर चुप हो गई थीं"
कुरिंजी ने सामने बहती हुई ठंडी हवा को महसूस किया, जिसने उसके बालों को हल्का सा सहलाया.
“हाँ, जीवन ही खत्म हो जाता है, जब समय अपनी लय खो देता है. लेकिन तुम्हें पता है, यह जो मौसम है न, जिसे मैं हर्बल मौसम कहती हूँ, इसने मुझे समय का एक नया अर्थ सिखाया है."
"कैसा अर्थ?"
"हर्बल का मतलब क्या होता है? वह जो प्राकृतिक है, जो तुरंत असर नहीं दिखाता, जिसमें कोई साइड इफेक्ट नहीं होता, लेकिन जो धीरे-धीरे भीतर तक जाकर जड़ों से बीमारी को ठीक करता है. शहर का समय एलोपैथिक दवा की तरह, तुरंत असर, तेज भागदौड़, एक मिनट की देरी और भारी नुकसान. लेकिन यहाँ का समय हर्बल है. यह घावों को धीरे-धीरे भरता है. यह प्रकृति की रिदम पर चलता है, कैलेंडर की नहीं."
साथी उसे हैरानी से देख रहा था. 19 साल की उम्र में जो लड़की टूट गई थी, आज 21 साल की उम्र में उसकी बातों में एक अजीब सा ठहराव और गहराई थी. इन दो सालों में कुरिंजी ने मनोविज्ञान की किताबें पढ़नी शुरू कर दी थीं. उसने इंसानी व्यवहार, आघात (Trauma), और उसके बाद के प्रभावों को समझना शुरू कर दिया था. उसने समझा था कि हमारे आस-पास के माहौल और हमारी भावनाओं का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है.
"तो फिर आज दो साल बाद तुम वापस उसी 'सो कॉल्ड शहर' में क्यों जा रही हो? अगर तुम्हें यह हर्बल मौसम इतना ही पसंद है, तो वापस उस कंक्रीट के जंगल में क्यों?" साथी ने पूछा, क्योंकि आज वे दोनों उसी शहर की तरफ निकलने वाले थे, जहाँ जाना कुरिंजी के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था.
कुरिंजी उठी और उसने अपना बैग कंधे पर लटका लिया. उसकी आँखों में अब वह पुराना दर्द नहीं था, बल्कि एक अजीब सा संकल्प था.
"क्योंकि दर्द से भागना इलाज नहीं है," कुरिंजी ने शांत स्वर में कहा. "मैंने नीट की काउंसलिंग भले ही छोड़ दी हो, लेकिन मैंने जीवन की काउंसलिंग नहीं छोड़ी है. जब इंसान किसी बहुत बड़े आघात से गुजरता है, तो या तो वह खुद को खत्म कर लेता है, या फिर वह दूसरों के लिए एक ढाल बन जाता है. मेरे माता-पिता सिस्टम की संवेदनहीनता और वीआईपी कल्चर की भेंट चढ़ गए. मैं डॉक्टर नहीं बन सकी, जो शायद शरीर का इलाज करती. लेकिन मैंने साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन के लिए फॉर्म भरा है."
वह कुछ कदम आगे बढ़ी और मुड़कर अपने साथी की ओर देखते हुए बोली, "मुझे शरीर का डॉक्टर नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का इलाज करना है. मुझे समझना है कि कैसे सत्ता के नशे में लोग एक एम्बुलेंस की आवाज को अनसुना कर देते हैं. मुझे उन लोगों के लिए काम करना है जो मेरी तरह किसी अचानक आए तूफान में सब कुछ खो देते हैं और डिप्रेशन के अंधेरे में चले जाते हैं. मुझे उनके लिए एक 'हर्बल' इंसान बनना है, जो उनके घावों को बिना किसी साइड इफेक्ट के भर सके.
साथी अवाक रह गया. उसने कुरिंजी के भीतर एक ऐसी ताकत को महसूस किया जो शायद पहले कभी नहीं थी. वह लड़की जो समय के हाथों हार गई थी, आज समय की आँखों में आँखें डालकर उसे एक नया आकार देने जा रही थी.
"चलो," कुरिंजी ने मुस्कुराते हुए कहा. "देर हो रही है. और हाँ, आज मैं कैलेंडर या घड़ी देखकर नहीं जा रही हूँ. आज मैं अपनी खुद की रिदम पर उस शहर जा रही हूँ. शहर वही है, पर अब कुरिंजी बदल गई है"
दोनों ने पहाड़ी पगडंडी से नीचे उतरना शुरू किया. हवा अब भी ठंडी और 'हर्बल' थी, लेकिन अब उसमें अतीत की उदासी नहीं, बल्कि भविष्य की एक ताज़ा महक थी। कुरिंजी जानती थी कि शहर की सड़कें उसे फिर से डराएंगी, उस चौराहे से गुजरना उसके दिल में फिर से एक हूक उठाएगा, लेकिन इस बार वह अपनी आँखें बंद नहीं करेगी.
वह जानती थी कि किसी का बुरा बर्ताव और संवेदनहीनता लहरों की तरह फैलकर किसी की जिंदगी तबाह कर सकती है, लेकिन उसने यह भी सीख लिया था कि समानुभूति और करुणा भी उसी तरह लहरों की तरह फैलती है, और वह अब वही करुणा की लहर बनने जा रही थी.
शहर की ओर जाती बस में बैठते हुए कुरिंजी ने खिड़की से बाहर देखा. अब उसे समय की भागती हुई सुइयाँ नहीं, बल्कि आसमान में धीरे-धीरे उजला होता हुआ सूरज दिखाई दे रहा था. समय ने उससे उसका कल छीना था, लेकिन उसका आज और आने वाला कल अब पूरी तरह से उसके अपने हाथों में था.