Coffee with Abhi

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मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

हर साल नया साल




समय बदल रहा है

पल बदल रहा है

कल के लिए

आज और कल बदल रहा है

हर साल का यह शगल रहा है


पत्ता टहनी से बिछड़ा

धरती पात से

चकोर चाँद से बिछड़ा

चातक स्वात(इ) से

जीवन से बड़ा जंगल रहा है


कलछी भात से बिछड़ी

भात स्वाद से

मन रिश्तों से बिछड़ा

रिश्ता विवाद से

इन सबसे बड़ा दलदल रहा है


रौनक सभ्यता से बिछड़ी

प्रगति संयम से

एकता पीढ़ी से बिछड़ी

पीढ़ी पराक्रम से 

ना किमख़ाब ना बड़ा मलमल रहा है

 


मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

एक बार फिर












एक बार

तुम्हें देखना है सामने

पास से

इतनी पास

कि हाथ बढ़ाकर छू सकूँ

चेहरे का स्पर्श कर जान सकूँ

तुम्हारा स्वाद

होठों पर उँगली रख रोक सकूँ

तुम्हें कुछ भी कहने से

और फिर लगा लूँ तुम्हें गले से

जो उधार है हम पर

जिसकी लौ तुमने ही तो लगायी थी

हर बात से खुद को झाड़ कर

कोई एक इस तरह

कैसे अलग कर सकता है ख़ुद को

जैसे किसी बच्चे ने

अपने कपड़ों से झाड़ दी हो मिट्टी

और मिटा दिया हो निशान गिरने का


चाय गिर जाती है

तो मैली होती है कमीज.

कहा था तुमने

सोचो जब प्रेम गिरा

तो क्या मैला नहीं हुआ मन


स्नेह की डोर

दोनों ओर से बँधती है

दोनों ओर से खिंचती है

छल गये उस बराबरी को तुम

कुव्वत नहीं थी

तो कवायद ही क्यों की


चाहती हूँ मैं मान जाऊँ

तुम्हारी बात

ले लूँ विराम

मगर उससे पहले

देखना है तुम्हें

सामने से

पढ़ना है विराम तुम्हारी आँखों का

मेरी पहली पुस्तक

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