आज पहली बार
मुझे अफसोस नहीं
अपने सफेद होते बालों का
मुझे झिझक नहीं
किसी के इन्हें देख लेने पर
आज पहली बार टाला है मैंने
अपने बालों का रंगा जाना
आज पहली बार मैं
बहुत शाँत महसूस कर रही हूँ
मन में किचकिचाहट नहीं
क्योंकि कोई हिचकिचाहट नहीं
कितना स्वाभाविक सा है
पचास की उमर में
बालों का सफेद होना
फिर इस स्वाभाविकता का
गला क्यों घोंट रही थी
इतने दिनों से मैं,
‘पचास की उमर
काले बालों में उपस्थिति
झिझक तो इसमें होनी चाहिए थी’
यह प्रश्न क्यों नहीं बना कभी
चर्चा का विषय
कि अधेड़ होते स्त्री-पुरुष भी
बड़े क्यों नहीं होते?
कद न बढ़े
तो लोग लेने लगते हैं विटामिन
बाल न पकें
तो क्यों नहीं ले पाते लोग सीरप?
क्यों नहीं जा पाते डाॅक्टर के पास?
क्यों नहीं दिखा पाते परिपक्वता?
ईश्वर, तुमने बुढ़ापा बनाया ही क्यों
जो इसे छुपाना पड़ा
पिला कर भेजना था तरुणाई का शर्बत
आज पी रही हूँ मैं
सच का घूँट
आज पहली बार
जा रही हूँ मैं लोगों के बीच
इस झिझक के बिना
आज पहली बार
मैं माँ हो गयी हूँ