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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

राधा-कृष्ण से बाजीराव-मस्तानी तक

 


भारतीय प्रेम कहानियों में (जैसे हीर-रांझा या लैला-मजनू) प्रेम को अक्सर त्याग के रूप में देखा जाता है. मनोवैज्ञानिक रूप से, इसे 'अल्ट्रुइस्टिक लव' (Altruistic Love) कहा जा सकता है. भारतीय साहित्य में 'संयोग' (मिलन) से ज्यादा 'वियोग' (जुदाई) को महत्व दिया गया है. राधा-कृष्ण की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, विरह 'एंग्जायटी' और 'लॉन्गिंग' का एक रूप है जो प्रेम को और अधिक गहरा बनाता है. राधा का कृष्ण से न मिल पाना प्रेम को एक 'अलौकिक' या 'ट्रांसेंडेंटल' स्तर पर ले जाता है. यहाँ प्रेम एक व्यक्ति से हटकर एक भाव बन जाता है.
जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो उसकी कमियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. भारतीय कहानियों में प्रेमी एक-दूसरे को 'परम सत्य' मानते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक सुरक्षा कवच (Buffering effect) का काम करता है, भले ही दुनिया उनके खिलाफ हो.
भारतीय प्रेम कहानियाँ दर्शाती हैं कि हमारे यहाँ प्रेम केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संघर्ष, व्यक्तिगत पहचान की खोज और आध्यात्मिक चरम का मिश्रण है. दुखद अंत वाली कहानियाँ यह संदेश देती हैं कि प्रेम अमर है, भले ही शरीर न रहे—जो भारतीय संस्कृति के 'पुनर्जन्म' और 'आत्मा की अमरता' के सिद्धांत से गहराई से जुड़ा है.

मेरी पहली पुस्तक

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