Coffee with Abhi

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सोमवार, 3 दिसंबर 2018

सोने से पहले


'अरे फ़िर भूल गई.'
अपने आप से बड़बड़ाते हुए बैग की ज़िप लगाते-लगाते ईश को फोन लगाने लगी तभी डोर बेल बजी. फ़ोन बिस्तर पर डालकर दरवाजा खोला रुबीना दी रात के दस बजे आने की माफ़ी मांगते हुए अपने डिज़ाइन किए तीन सूट देते हुए बोलीं,
'ये तेरे टूर के लिए परफेक्ट हैं. मुझे लगा पैकिंग हो जाएगी तभी इस वक़्त आ गई. चलती हूं तेरी सुबह की ट्रेन है न, अब सोना भी होगा.'
'न ऐसा कुछ नहीं दी अगर आपके पास वक़्त है तो प्लीज़ बैठिए.'
'इतना कहती है तो एक कॉफी पी लेती हूं तेरे साथ, फिर तो तू एक महीने बाद आएगी.' मैं किचन में कॉफी बनाते हुए ईश को सोच रही थी. बस दी चली जाए अभी बात करती हूं. कितने कमज़र्फ दिन बीत रहे हैं मैं चाहकर भी उसे वक़्त नहीं दे पा रही. मिलना तो दूर फ़ोन भी... बस ये टूर निपटे किसी तरह.
दी कॉफी की तारीफ़ किए जा रही और मैं उसमें ईश को देख रही थी. उसे भी तो... हे भगवान, मेरे अंदर से ईश कम जैसा हो रहा है...मैं घुट जाऊंगी... दी के जाते ही दरवाजा बंद कर ईश को फ़ोन मिलाने लगी...लो बैट्री...चार्जर हाथ में उठाया ही था कि लाइट चली गई. अंधेरे में किसी तरह कदमों की गिनती करके हैंडबैग तक पहुंची. पॉवर बैंक शायद ऑफिस में रह गया था. मन की पीड़ा से छटपटा रही थी मैं. दरवाजा खोलकर बालकनी में आ गई. आंखों से नींद, पलों में व्यस्तता दोनों ही गायब हो चुके थे. शायद यही वो वक़्त होता है जब मन खत्म हो जाता है और हम बचते हैं महज एक शरीर. 
बालकनी में ही एक पिलर पर टिकते हुए बैठ गई. मेरी बालकनी कंक्रीट सी दिखती है मुझे पौधों के लिए वहां कोई जगह कभी पसंद ही नहीं आयी. एक कंक्रीट की उभरी हुई संरचना पर बैठकर टेरिस की फेंसिंग रॉड पर सर टिका लिया. मैं, ईश और प्यारा अतीत...जब दो घंटे भी आवाज न सुनें तो पेट में बटरफ्लाई घूमने लगती थीं...क्योंकि तब हमारे बीच सब कुछ था और मेरे पास वक़्त भी था. आज समय प्रेम और समर्पण पर हावी हो चला था. सुबह 5 बजे मुझे ट्रेन पकड़नी थी और 3 बजे तक...मैं खुद को ही छोड़ चुकी थी. ईश तुम्हारी गुनहगार हूं मैं... अब कोई सफ़र नहीं बस मुख्तसर सी जिंदगी को अपना बनाऊंगी. सोने से पहले ही सब कुछ कर दूं. नींद का क्या भरोसा कहीं मुकम्मल हो जाए तो?
लाइट आते ही मोबाइल चार्ज करके ऑफिस मेल किया कि मैं व्यक्तिगत कारणों से 15 दिन की छुट्टी लेना चाहती हूं ये डरे बग़ैर कि इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत के लिए मुझे सज़ा मिल सकती है. सोचा सोने से पहले ईश को खुशखबरी दे दूं. हमारे बीच समय कोई मानक नहीं रहा. बात करते हुए कभी घड़ी नहीं देखी. 
दो-तीन बार की मशक्कत के बाद फोन लगा.
'मैडम ये जिन साहब का नंबर है उनका ऐक्सिडेंट हो गया है. उनको पुलिस की गाड़ी ले गई मोबाइल यही गिर गया था.'
फोन रिसीव करने वाले ने जो लोकेशन दी वो मेरे घर के पास हाईवे की थी. जरूर ईश मुझे सी ऑफ करने आ रहा होगा. ईश तक पहुंचने के लिए मोबाइल लेने जाना जरूरी था. 
मेरे गले से छाती तक बस अम्ल रिस रहा था. समय के बहाव के शोले हर मीठी याद पर भारी पड़ रहे थे.

सोमवार, 1 जनवरी 2018

समय तेरा जवाब क्या.....!

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आते हुए उसने खटकाया भी नहीं
जैसे दबे पाँव मगर
निडर चला आया हो कोई,
एक सवाल था उसकी आँखों में
कि मैं उसके आने के जश्न में
शामिल क्यों नहीं औरों की तरह,
कैसे बताऊँ उसे 
जब स्वागत और प्रतिकार में
कोई फर्क ही नहीं
कौन रुकने वाला है मेरे रोकने से
न घड़ी की सुइयाँ, 
न ही समय में लिप्त दर्द,
इस रूह कँपाती सर्दी में
नए वर्ष का जश्न
एक सुखन दे गया,
आज वो भी खुले आसमान के नीचे
बिना कपड़ों के आवारा थिरक रहे हैं,
जिनकी तिजोरियाँ बोझ से दरक रही हैं,
कल सुबह यहीं से बच्चे
बीनकर ले जाएंगे
खाली ब्रांडेड बोतलें;
वो आ गया है अपना समय पूरा करने
उसे भी तो देखना है
कितनी हाँड़ी बिना भात की हैं,
कितने नन्हे भूखे सोये,
कितनी माँओ ने पानी डालकर
दाल दोगुनी कर दी,
कितने लाल रेस्टोरेंट के नाम पर
पानी में दाल का बिल भरते हैं:
उसे अपना चक्र पूरा करके
चले जाना है,
क्या फर्क पड़ता उसे विषमताओं से,
उसमें संवेदना की बूंद तक नहीं
वो तो है हर रोज़
कैलेंडर पर बदलती एक नयी तारीख।

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php