भले ही रास न आता हो
गालीबाज
तुम्हारे मोम सरीखे कानों को
मगर एक पिघलता हुआ सच है वो
नहीं दिखावा करता
किसी को जबरन माफ करने का
न हीं इस फिराक में रहता है
कि कोई दुम हिलाए उसके सामने
या फिर मांगे माफ़ी
जो होता है बस वही दिखता है
घिनौना, वाहियात, लिजलिजा
हराम की नहीं खाता वो
न ही राम की
भुगतान करता है हमको
अपनी असभ्यता का टैक्स
तभी तो बन पाता है बाकी समाज
सभ्य

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