Monday, 23 April 2018

Happy Birthday Master Blaster



तुमपर कलम तो कई बार चली
पर आज पहली बार यहाँ लिख रही हूँ
लोग कहते थे तुम पर्याय हो क्रिकेट का
मैं कहती हूँ तुम्हीं तो क्रिकेट हो
तुम्हारे बाद मैंने मैच नहीं देखा
मेरे अंदर वो साहस नहीं था
कि तुम्हें अंतिम पारी में विदाई देती
मुझसे लगातार बोला जा रहा था
कि मैं तुम्हें जाते हुए देखूँ
क्योंकि गुजरांवाला से शुरू हुए तुम्हारे सफर में
मैं अंत से पहले तक गवाह रही,


मेरे अपने जानते थे
आखिरी पारी न देखना
मतलब मैंने क्रिकेट के रूप में तुम्हें
अपने अंदर कहीं रोककर रखा
मैंने इस सच को झुठला दिया
कि तुम अब बल्ला उठाए हुए
कभी मैदान में आते नहीं दिखोगे;


डक हो या शतक, तुम जुनून थे मेरा
पॉपिंग क्रीज़ पर तुम्हारा स्टांस लेना,
फ़ास्ट बॉल को बॉलर के ऊपर से
बाउंड्री पर विदा करना,
बाउंसर को थर्ड मैन फील्डर के ऊपर निकालना
ज़बरदस्त ऑन साइड स्ट्रोक खेलकर
ऑफ साइड उससे भी बेहतर बनाना
पंद्रह ओवर की रिस्ट्रिक्टेड फैल्डिंग का लाभ उठाना
बहुत खीझ होती थी
सिद्धू का मेडेन ओवर निकालकर
तुम्हें इंतज़ार करवाना,


स्क्वायर कट हो या फ्रंट फुट शॉट
तुम तो टूट पड़ते थे गेंद पर,
चतुराई तो जैसे रगों में भरी थी
रिवर्स स्वीप में माहिर थे तुम
पैडल स्वीप के प्रणेता बन गए,
सिक्सर के बाद भी सिंगल की भूख में
रनिंग बिटवीन द विकेट
तो बस कमाल की करी थी,
हर शॉट में तुम्हारा कोई सानी नहीं
तुम्हारे जैसा कोई हीरो नहीं
मेरे जैसी कोई दीवानी नहीं,


वर्ल्ड कप के लिए तुम्हारा डेडिकेशन
और इस सपने का पूरा होना
क्या कहूँ, सब कुछ तो दिया तुमने,
हमारा प्यार, हमारा विश्वास
सम्मान सहित लौटाया तुमने
जिस सफर भी रहो
दुवाएँ लेकर चलो
हमेशा मुस्कराते रहो विध हैप्पी फैमिली
यू, सारा, अर्जुन और प्यारी सी अंजली


IMAGE CREDIT: GOOGLE

Sunday, 22 April 2018

स्वर्ग... नर्क के बीच..

कितना मुश्किल होता है
जीते जी किसी को अच्छा कहना
और मरते ही
टैग हो जाता है उसका नाम
स्वर्गीय जैसे शब्द के साथ
ये जाने बगैर
कहीं उसकी आत्मा
नर्क में वास तो नहीं कर रही,
मुझे भी कभी किसी आत्मा के साथ
नारकीय अभिव्यक्ति
या फिर नर्क में होने जैसा महसूस नहीं हुआ;
जाने क्यों इंसान
अपने पास होने वालों की वैल्यू नहीं करता
काश, कि हम अच्छा सोचें!
करें इंसान के साथ इंसान जैसा व्यवहार
परोसें उसकी थाली में
थोड़ा और आदर, थोड़ा और प्यार,
उसकी उम्मीदों पर हाँ की मुस्कान चस्पा करें,
अपनी उपस्थिति से
उसके आसपास खुशियों के गुब्बारे सजाएं,
फ़िर
फ़िक्र नहीं होगी....कि
चील-कौओं को खाना नहीं दिया पितृपक्ष में,
मरने वाले के लिए दुआ नहीं मांगी,
अकेले में पछताना न पड़े;
कि कर नहीं पाए अच्छा कुछ भी उसके साथ
स्वीकार नहीं पाए उसकी अच्छाई भरी सभा में,
स्वर्ग या नर्क के बंटवारे में पड़ने से बेहतर है,
जीते जी स्वर्ग की अनुभूति दान करना
मृत्यु पर बस नहीं पर....

Saturday, 21 April 2018

तू हँसती रहे मुझ पर...

ये रोशनी
ये सवेरा
और अंधेरे में
चमकता हुआ
ये तुम्हारा चेहरा।
वो एक शाम पुरानी सी
लगने लगी है
जैसे एक कहानी सी।
वो किनारे, वो सितारे
और वो एक मैं
जो तेरी आंखों में ढूंढता था सहारे
आज सब खामोश है।
इन खामोशियों के बीच भी
तुम चुपके से आकर
कर जाती हो कई सवाल
मेरी आँखों में ढूँढती हो
उस गुनाह का पश्चात्ताप
जो मैंने कभी किया ही नहीं
और मेरा प्रेम बदहवास सा
तुम्हारी आँखों में मेरा फ़रेब ढूंढता है
ये जानते हुए भी
कि मैंने तो बस प्रेम किया है।
आ जाओ कि इक बार
मेरे दर्द को कफ़न पहना दो
ये मुर्दानगी
ये आँसुओं के सैलाब
मुझसे नहीं जिए जाते
ये पल-पल की तिश्नगी
ये घूँट-घूँट का ज़हर
मुझसे नहीं पिए जाते।
इस कदर पनाह मत देना मेरे दर्द को
कि मैं तेरा आदी हो जाऊँ
तू हँसती रहे बेपनाह मुझ पर
और मैं तेरा फरियादी हो जाऊँ।

Tuesday, 17 April 2018

नारीत्व मेरा अहम है

कभी सिर उठाने की कोशिश करती
तो ये कहकर रोक दिया जाता
लड़की हो तुम
चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे
फिर भी बेहया समाज से
मुझ अकेले को ही लड़ना पड़ता,
अब मैं बड़ी हो गयी हूँ
मेरे अंदर भी आठ लोग बोलते हैं
भेज दी उस कोमला की मृत देह
उन चार लोगों के काँधों पर
अब मैं काया विहीन
जुल्म के ख़िलाफ़ तांडव करती
एक आत्मा भर हूँ
मेरे नारीत्व को
चुनौती देने की भूल मत करना
यही तो मेरा अहम है,
गर साधारण औरत समझो मुझे
तो ये तुम्हारा वहम है।

Thursday, 12 April 2018

अतीत के झरोखे से

यादों की डायरी में हर पन्ना एक अतीत बन जाता है। उनमें से कुछ तो हम अक्सर पलटते हैं और कुछ मात्र अवचेतन मन का हिस्सा बनकर रह जाते हैं। अक्सर याद करने वाले मेरे अपने प्रिय सितारों में एक नाम जो अमिट है इस सदी के हस्ताक्षर के रूप में वो है...व्यंग्यकार, डायलॉग राइटर, महान लेखक और बहुत अच्छे इंसान माननीय स्वर्गीय के. पी. सक्सेना जी का। आज चाचा जी (मैं उन्हें इसी सम्बोधन से बुलाती थी) का जन्मदिवस है, मैं उन्हें बधाई नहीं दे सकती पर हृदयतल से आभार प्रकट करती हूँ कि मुझे कुछ समय के लिए उनके सानिंध्य का अवसर मिला।
बात सितम्बर 2000 की है जब लखनऊ में एफ. एम. रेनबो का प्रसारण शुरू हुए एक महीना ही हुआ था। स्वर्गीय राजीव सक्सेना जी (इनका परिचय आगे पढ़ने को मिलेगा) और रमा अरुण त्रिवेदी जी ने चाचाजी का इंटरव्यू लिया था। उन दिनों चाचा जी लखनऊ से मुम्बई की खुशहाल उड़ानों में व्यस्त थे। आशुतोष गौरीकर की फ़िल्म 'लगान' के डायलाग लिखने का काम पूरा हो गया था और फ़िल्म प्रमोशन का सिलसिला जोरों पर था। इंटरव्यू सुनते ही मेरे मन में जोरों की इच्छा हुई बात करने की। मैंने तुरन्त पत्र लिखकर प्रेषित किया। ठीक अगले हफ्ते नीले रंग की स्याही से लिखा हुआ लाल रंग की सजावट वाला और मोती सरीखे अक्षरों में लिखा हुआ अपना नाम वाला पत्र देखकर मैंने गौरान्वित अनुभव किया। ढेर सारे आशीष के साथ उसमें एक फोन नं भी लिखा हुआ था। पत्र पढ़कर जितनी प्रसन्नता का अनुभव हुआ था बात करने के बाद उससे भी कहीं अधिक। पहली ही बार में इतनी सहजता से बात की। हर बात में बेटी का सम्बोधन, इवनिंग वॉक से तुरन्त ही लौटे थे। बोलने में हांफ रहे थे। मैंने बोला भी कि मैं बाद में बात करूँ पर जब तक मैंने खुद फोन नहीं रखा हर प्रश्न का बहुत तल्लीनता से उत्तर देते रहे। ये पहला मौका था इसके बाद तो अक्सर बात होती रहती थी। एक दिन बहुत खुश होकर बताया 'मैंने आमिर और रीना (आमिर खान की x-wife) के साथ हॉल में लगान देखी।' मुझे कुछ ईर्ष्या का अनुभव हुआ तो तपाक से बोले, 'परेशान मत हो मैं तुझे आमिर से मिलवा दूँगा। बहुत अच्छा लड़का है वो। मेरा बहुत सम्मान करता है....।'
अगर एक हफ्ते तक फोन न करूँ तो खुद ही खैरियत पूछते थे। मुझे चाचा जी की शक्ल और आवाज बहुत कुछ मेरे नानाजी जैसी लगती थी। मुझे आज भी चाचा जी के लिखे हुए व्यंग्य के धारदार चरित्र बहुत याद आते हैं। उनसे की हुई ढेर सारी बातें और लिखे हुए पत्र मेरे मानस पटल पर अंकित हैं। जब भी पत्रों को पलट कर देखती हूँ एक अपनेपन की महक से भर जाती हूँ कि सफलता के शिखर पर आरूढ़ होकर भी लेश-मात्र घमण्ड नहीं। लखनऊ से मुम्बई का सफर, विभिन्न आयोजनों में शिरकत, फ़िल्म का ऑस्कर तक का सफर तय करना जैसी व्यस्तताओं के बावजूद हर पत्र का त्वरित उत्तर देना, हर फोन कॉल का सम्मान करना ये एक बहुत बड़ी मिसाल है। हाँ कुछ समय के लिए संदीप जी की अस्वस्थता को लेकर विचलित अवश्य दिखे।
आप हमारे बीच नहीं है ये सच है पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये किरदार आज भी सजीव है। चाचाजी आपकी लेखनी और सहृदयता को शत-शत नमन।

Tuesday, 10 April 2018

तुम तो बस...

आँखों की कोर से आँसू छलकता है
इस देह के अंदर एक मन भी है
जो तुमसे बावस्ता होने को मचलता है
कोई कुण्डी नहीं है द्वार पर
बस सांकल हटा देना
नेह तो हिय में हर पल दिए जाते हो
आओ न कि हमें
अपने होने का इल्म करा देना
उन बातों को कसम देकर पूछते हो
बहुत भोले हो तुम भी
कहाँ चुभता है तो कहाँ लगता है
जब पीर दोगे तभी न लगेगी
हाथ रखो न इधर
इन बढ़ती हुई धड़कनों की कसम
हम अनजान हैं अब तक
उस दर्द-ए-सुखन से
आकर हमें भी तसल्ली करा देना।

Hindi Quote on Where am I...


Hindi Quote on pain


Friday, 6 April 2018

तुम्हारे नाम का पहला अक्षर!

जब भी देखती थी
मैं अपनी हथेली को
नहीं दिखती थी मुझे रेखाएं
न हथेली का रंग
और न ही दिखा कभी
भाग्य का कोई निशान.
जाने क्यों
हर बार
मेरा ध्यान चला जाता था
उस पर
जो था...
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर
तब मैं नहीं जान पायी थी
इसका मतलब
जैसे-जैसे
तुम्हारी उपस्थिति बढ़ी
हाथ की रेखाएं
रंगत बदलने लगी
सिमटती गयी
मेरी दुनिया
सिर्फ तुममें
तुमने भी तो आसरा दिया
मेरी इच्छाओं को,
खुशियों से भर दी
मेरी छोटी सी
सपनों की दुनिया
पर आज मुझे लगता है
कि वो 'अक्षर'
महज हथेली पर है
मेरी बन्द मुट्ठी से
सरक जाता है
क्योंकि तुम भी तो
बस मेरी यादों में हो
मेरे आज में नहीं,
नहीं चाहिए मुझे
अपनी हथेली पर
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर
मुझे तो संवारना है
तुम्हारे नाम के साथ
अपना नाम
जन्म-जन्मांतर...

डायरी के पन्नों से
© May 27, 2012

Tuesday, 3 April 2018

जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले

सारांश बहुत भारी मन से ड्राइव कर रहा था अचानक उसे गाड़ी में कुछ प्रॉब्लम लगी। उतरकर देखा इंजन गरम हो गया था। उसे भी कहीं जाने की जल्दी नहीं थी सो बोझिल कदमों से आगे बढ़ने लगा कि शायद कहीं पानी दिख जाए। कुछ दूरी पर चहल-पहल का आभास हुआ, कदम उसे आगे बढ़ाते रहे। उसकी मंजिल कोई नहीं थी जहाँ नियति पहुंचा दे। वो अब तक अनजान था कि नियति इतनी भी क्रूर हो सकती है। पहुंचने पर पता चला कि आज पहली बार वो सही वक्त पर सही जगह पहुंचा है। वो शमशान घाट के नीरव वातावरण में था जहाँ बस दर्द चीखता है। न चाहते हुए भी उसकी नज़र दूर मुखाग्नि को तैयार एक चिता पर पड़ी....लाल रंग के कफ़न पर लिखे स्वर्णिम अक्षर जिन्हें पढ़ते ही उसके बदन में अजीब सी सनसनाहट फैल गयी। बिजली सी फुर्ती के साथ पहुँच गया। वो शब्द आँखों में तेज़ाब की तरह चुभ रहे थे।
"मेरे जीवन का सार
सार.... मेरा जीवन"
सार...इस नाम से तो मुझे मेरी इति बुलाती है। एक अजीब से दर्द ने उसकी साँसों को चोक कर दिया था। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे से जाकर चेहरा देखे तभी इति का भाई शिशिर सामने आ गया।
"बहुत देर कर दी भाई आपने आने में....दी आपसे मिलना चाहती थी। बहुत बार कहा सारांश को बुला दो। मम्मी ने भी ढूंढा आपको, कई बार नंबर लगाया। हर बार इंगेज टोन... हम सब आपसे ये जानना चाहते थे कि दी आखिरी वक्त तक किसका वेट करती रही। वो आपके बहुत करीब थी न। मम्मी कहती थी कि आपको जरूर पता होगा। हम उसकी ये आखिरी इच्छा नहीं पूरी कर पाए। वो बेहोशी की हालत में बस किसी को आवाज़ देती रहती थी.." कहते-कहते शिशिर फफक पड़ा।
मुखाग्नि देने के लिए कुछ लोग शिशिर को ले गए।
सारांश मूर्तिवत खड़ा रह गया....मेरी इति मुझसे दूर नहीं जा सकती..बहुत प्यार करती थी तुम मुझसे...एक-एक कर सब मुझसे दूर हो गए...माँ-पापा, दोस्त सारे रिश्ते तो छूट गए..तुम तो मेरी हर गलती पर हँस कर टाल जाती थी...यहाँ तक कि कभी ऊँची आवाज में बात तक नहीं की... आज इतनी बड़ी सजा देकर चली गयीं... तुम्हें आना होगा, मेरी खातिर..तुम तो मेरी अपनी हो इति..
...किस मुँह से कह रहा हूँ तुम्हें अपना, तुम भी तो बहुत रोती थी मेरे लिए, कितना मनाती थीं जब मैं बात नहीं करता था...मैं कभी पलटकर नहीं देखता.... 'इति एक बार बस एक बार देखो न मुझे, अब मैं तुझे कभी नहीं रुलाऊँगा।'
इति उठने वाली नहीं थी। अब कभी नहीं उठेगी। कभी नहीं कहेगी, सार मेरी भी सुन लिया करो कभी। सारांश जानता था इति सारे जहाँ से रूठ सकती है पर अपने सार की एक आवाज पर दौड़ी चली आती। यही अति विश्वास उसे ले डूबा था। वो यह भूल गया था कि इंसान परिस्थितियों का दास होता है।
उसके सफर ने सच का आईना दिखाया था पर उस वक़्त जब उसकी कोई कीमत नहीं थी। अपने प्रायिश्चित के लिए वो शांति-पाठ में इति के घर गया। इति की माँ ने उसे वो कमरा दिखाया जहां की दीवारें इति के साथ सार के होने की गवाही दे रही थी। हर निर्जीव पड़ी चीज चीख-चीख कर कह रही थी....सार तुम्हारा होना इति का न होना बन गया...। सार भाग-भागकर हर वो चीज देख रहा था जो इति की ज़िंदगी में उसकी अहमियत को दिखा रही थीं..ये पहला गिफ़्ट.. ये झगड़ा करते हुए पेन का तोड़ना...मेरी घड़ी का कवर..मेरा पहला टूटा हुआ सेल फोन... उफ़्फ़ मेरे होंठों से लगा हुआ स्ट्रा... ओह गॉड मेरी नोटबुक का लास्ट पेज...अरे ये तो वही चाभी है अगर तब मिल गयी होती तो शायद सब कुछ ठीक होता! ओह शिट जब ये चाभी गुम हुई थी इति बार-बार मुझे बुला रही थी शायद यही देने के लिए, कुछ दूर मेरे पीछे भी आई थी वो, कॉल भी किया पर मैं अपनी उलझन में सुनता ही कब था...बस वही तो आखिरी मुलाक़ात थी मैं जेल जाने से बचने के जुगाड़ लगाता रहा और वो मुझे बचाने के...फिर भी मैंने मुड़कर नहीं देखा...।
'इति मैंने तुम्हें खो दिया है। मैं अकेला हो गया हूँ। इति आज मुझे तुम्हारे कंधे की जरूरत है। क्यों देती थी मुझे बात-बात पर सहारा, अब क्या करूँगा मैं... तुम बहुत दुखी होकर कहती थी सार, मुझे क्यों दूर करते हो इतना अगर गयी तो तुम्हारे अंदर भी नहीं रह जाऊंगी...कहाँ चली गयी...तुम तो ऐसा कोई काम नहीं करती थी जिससे मुझे तकलीफ होती फिर अब ऐसा कैसे कर सकती हो??
सारांश घुटनों पर बैठा रो रहा था। इति की माँ ने उसे चुप कराया। वो बार-बार सारांश से यही पूछने की कोशिश करती रहीं कि इति के जीवन में ऐसा कौन था जिसे वो सब लोग नहीं जान पाए। सारांश ये सच कैसे बताता कि उनकी बेटी का गुनहगार वो ही है।
"इति को हुआ क्या था आंटी?"
"मल्टी ऑर्गन फेलियर।"
"इतनी जल्दी कैसे?"
"निमोनिया हुआ था, एक बार बिस्तर पर गयी फिर उठ न पायी।"
सभी के गले रुंध चुके थे। सारांश बाहर निकल आया। उसके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिससे कि इति की आत्मा को शांति मिलती। उसे नफरत हो रही थी हर चीज से यहां तक कि अपने आप से भी।

Monday, 2 April 2018

जीवित होने का प्रमाण-पत्र

जब हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं
तो जीते हैं अपने आप को
एक उस अध्याय को
जिसे कुछ करते हुए
पलट नहीं सकते

जब हम कहीं नहीं होते हैं
तो होते हैं अपने पास
कि औरों के साथ होते हुए
कभी नहीं हो सकते
अपने करीब

जब हम कुछ नहीं बोलते
तो चटते हैं स्वयं को
एक दीमक की मानिंद
खोखला होने तक
जैसे बचेंगे ही नहीं

जाने कैसा मापदण्ड है जीने का
कि कुछ करना
कहीं होना
या फिर बोलते रहना
इतना जरूरी है
जैसे यही हो
जीवित होने का प्रमाणपत्र।

Sunday, 1 April 2018

शेर मोहब्बत के नाम

तलाश-ए-जहाँ में होते तो मिल गया होता
ये शब्द मुक़म्मल ही है जो हमें मार गया।

तौफ़ीक़ समझकर मोहब्बत को जी लिया हमने,
बस आंखों के इशारे हैं, कोई कलमा नहीं पढ़ना।

*तौफ़ीक़-इबादत

बिना संबोधन वाला पहला ख़त

जब तुम्हारी पहली चिट्टी आयी थी
लिफाफे पर देखा था अपना नाम
एक सुंदर सी बड़ी लिखावट वाला
मुरझा सा गया था
उसका पीला रंग
मग़र तुम्हारे हाथों की खुशबू लेना नहीं भूले
ये जानते हुए भी
कि कितने ही हाथों ने छुआ होगा
तुम्हारे बाद भी,
हर अक्षर बचाकर खोल ही दिया था लिफाफा
और एक-एक कर निकाले थे
वो सारे दस्तावेज़,
जो तुम्हारी बुद्धिमत्ता, कुशलता और
अनुभवी होने के परिचायक थे
उन सबके बीच
तुम्हारा एक प्यारा सा चित्र,
तुम्हारी खुशबू बरसाते
काले रंग की स्याही से लिखे हुए चंद अक्षर
हम जानते थे
ये हमारे लिए हैं
फिर भी हम ढूंढते रह गए थे
तुम्हारा दिया हुआ एक प्यारा सा संबोधन
जो सिर्फ हमारे लिए होता
तुमने लिख भेजी थी हिदायतें
इस हिदायत के साथ
कि
तुम चाहो तो रख सकती हो
मेरी तस्वीर...अपने पास
तबसे आज तक
तुम्हारी वो तस्वीर
और खत वाला लिफाफा
घेरे हुए हैं
मेरे तकिए के नीचे की जगह
मग़र अब तक इंतज़ार है
उस सम्बोधन का!

Thursday, 29 March 2018

युवा जीवन की परिणति

बादलों के सुरमई माथे पर
भोर की नारंगी किरणें
अल्हड़ सा अंगड़ाई लेता
बाहें पसारे दिन
चिरयुवा सा दमकता
एकाएक विलीन हो जाता है
तपती दोपहर में
जैसे रिटायरमेंट की अवस्था में
पतली होती
बाबूजी की पेंशन
और घर-खर्च के लिए
आज भी जोड़-तोड़ करती अम्मा,
उसे युवावस्था की दहलीज़ पर खड़ी
बेटी के हाथ जो पीले करने हैं।

Monday, 26 March 2018

हो इश्क़ मुक़म्मल तो जानें

बुलंदियाँ तो इश्क़ की,
नाकामियों में हैं
हम तुम्हारे और तुम हमारे
ये सब समझौते हुआ करते हैं
मुक़म्मल जज़्बात
तो तब हैं
कि
तुम हममें
और हम तुममें रहें।

Friday, 23 March 2018

शर्त ये है कि...

प्रेम बंटता है अगर
तुममें और हममें
तो बँट जाने दो
मग़र शर्त ये है कि
हम तुम्हें तुम्हारे जैसा
और तुम हमें
हमारे जैसा चाहो।

Thursday, 22 March 2018

एक युद्ध स्वयं के विरुद्ध

शहादत पर हर बरस
मेले लगाने से पहले
पूँछ लेना उस माँ से
कैसे कलेजा जला था,
पूँछना हर शमा को
जलाने से पहले
कैसे उस सुहागिन का
सिंदूर मिटा था,
पूँछना ये टूटने से पहले
कहाँ गया उम्मीद बनकर
कलाई पर बहन की
जो धागा बंधा था,
शहादत कोई इनाम नहीं है
शहीद कोई नाम नहीं है
ये तो बस एक दिलासा है
आज कक्षा में
बच्चों को पढ़ाया जाने वाला
एक दिन का सबक,
प्रतिमाओं के आस-पास
चौराहों पर होने वाला
एक आयोजन मात्र,
23 मार्च के नाम पर
सबसे बड़ा भाषण देने वाले
महोदय से
बस एक बार पूंछना होगा
क्या अपने घर में
कोई भगत सिंह देखना चाहेंगे
बजाय अम्बानी, सहारा
सचिन, मोदी के???
आज के भगत सिंह, सुखदेव
और राजगुरु को
एक अघोषित युद्ध लड़ना होगा
स्वयं के विरुद्ध,
भ्रष्टाचार, अनैतिकता
और गन्दी राजनीति के विरूद्ध।

Wednesday, 21 March 2018

शून्य से पहले

दायरारहित सोच के
बाहर का दायरा,
कल्पनारहित उड़ान के
बाद की कल्पना,
दर्दरहित जीवन के
अंत का दर्द,
प्रेमरहित मन के
पतझड़ का प्रेम,
गतिरहित आशा के
स्थिरता की आशा,
पड़ावरहित सफर के
दूरन्त का पड़ाव,
....महज कोरी कल्पनाएं नहीं
ये तो एक विराम है
शून्य है
इसके बाद स्थान लेती है
ऋणात्मकता....
मत जाइए शून्य तक
मत खोजिए नकारात्मकता
जीवन अंटार्कटिका नहीं यूरेशिया है
क्योंकि हर जीव पोलर बियर नहीं
कुछ मानव भी हैं।

Monday, 19 March 2018

खुशी बांटते रहिए

मुस्कान मन की आभा है
अधरों पर सजाकर रखिए
हो न ये मन अपनों से खाली
रिश्ते सभी से निभाकर रखिए
ये दुनिया है छोटा घरौंदा हमारा
न टूटे कि इसको बचाकर रखिए
है सुबह जो अपनी तो शाम भी है
रूठे वक़्त से भी अब बनाकर रखिए
साथ चलने से ही तो कारवां बनता है
बांटिए खुशी दर्द को मुस्कराकर रखिए

20 मार्च: अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस
संयुक्त राष्ट्र संगठन ने वर्ष 2013 में ये दिवस मनाने की घोषणा की। आइये हम सब मिलकर आज का दिन मनाते हैं।

चचा लखनऊ उवाच 1


GOOGLE JI FOTU DIHIN

हमरे चचा केरे चचा केर पिताजी
अपने ग्यारा साल केर लरिकवा 
खातिर बिटेवा देखे गए रहे
तो कहिन
.....देखौ, तुम्हार नौ साल केर
छुई-मुई जैस बिटेवा हमका
नीक लाग।
बस यू बताओ
कि कनकैया मा कन्नी तो
बांध लेत है,
....फिर हमरे
चचा केर पिताजी 
इक्कीस बरस के
चचा खातिर अट्ठारा बरस केरी
चाची पसन्द 
करे गए
....सुनौ, तुमार बिटिया
तनू दूबर है
मुला ठीक है
बस उइका टाई मैहा
गांठ बाँधब आवत है,
अब हम उनतिस
केर हुई चलेन 
नाक, कान गला केर डॉक्टर हन
हमरे पिताजी का
गर्दन बांधे वाली नाई मिल रही


चचा लखनऊ

Sunday, 18 March 2018

दो शेर

उनके तन्हा होने का उन्हें सबब क्या पता
रिश्ते तो मर गए मगर दफनाए नहीं गए

दिल की बंजर जमीं थी पर मोहब्बतों के फूल खिल तो गए,
अहसास की नमी हवा हो गयी, वहाँ कैक्टस के गुलिस्तां मिले।

Friday, 16 March 2018

प्रेरणापुंज कल्पना को नमन

GOOGLE IMAGE

लाजवाब थी वो 
बेमिसाल थी वो
थी तो हरियाणा की
मग़र समूचे भारत की
मुस्कान थी वो,
हिम्मत न हारी कभी
आगे ही बढ़ी वो
बेटियों का
मनोबल बढ़ाने को
कामयाबी के
किले गढ़ती रही,
सितारे, विमानों के
चित्रों में ही
शुरुआत कर दी
फिर एक दिन
नासा से
अंतरिक्ष की
उड़ान भर दी,
पहला सफ़र खूबसूरती से
मुक़म्मल हुआ
दूसरे सफ़र ने
अंतिम घड़ी में
उसकी आवाज खामोश कर दी,
आज समूचा विश्व उसकी
जन्मतिथि मना रहा है
कल्पना की कल्पनाओं का सफ़र
करोङो बेटियों को
सपने देखने को 
हर्षा रहा है,
आइये, हम सब
उसे नमन करते चलें
बेटियाँ बोझ नहीं हैं
इसपर मनन करते चलें।

एंटीक पीस हूँ मैं....


कभी फ़िकर नहीं करती
कि कैसी दिखती हूँ मैं
मुझे परवाह है तो इतनी
कि तुम कैसे देखते हो मुझे
मैं
रंग और नूर की
बारात का हिस्सा तो नहीं हूँ
मग़र
कोई अधूरा किस्सा भी नहीं।
मैं
नवाबों के शहर की
शान तो नहीं
पर गुमनाम भी नहीं हूँ,
मैं
मूक ही सही
वाचाल तो शब्द हैं मेरे,
मुझमें
रंगीनियां कब हैं जमाने की
सादगी में लिपटी
श्वेत-श्याम तस्वीर हूँ मैं,
सूरत में
नहीं हूँ
मैं तो
सीरत में हूँ,
खुद के लिए
कब थी मैं
मग़र
सभी की
जरूरत में हूँ,
बादशाहत के किस्सों से
बाहर हूँ
बस
अपने मन की
मुमताज़ हूँ,
जो पढ़ी जा सके
वो
किताब नहीं हूँ
फ़क़त
दास्तां हूँ
अहसासों की
सबके दिलों की
आवाज़ हूँ मैं,
ज़र्रा-ज़र्रा
जीती हूँ
दर्द में
मरती हूँ
हर पल,
हवाओं सी
बहती हूँ
झरनों सी
करती हूँ
कल-कल,
जब
प्रेम की
फुहारें बरसती हैं
खिल जाती हूँ
बनकर
इंद्रधनुष,
मार्तंड सा
तपती हूँ
बर्फ सा पिघलकर
जब
रुदन करती हूँ
आकाश
नाचता है
धरती के
स्पंदन पर।

दुःख में सत्य चीखता है...

दुःख रात का वो पहर नहीं जहाँ नितांत अंधेरा है
दुःख तो वो पल है जब आपके कदम ठहर जाएं
दुःख वो कहर नहीं जहाँ उम्मीदें टूटती हैं
दुःख तो वो जहर है जिसे पीकर आप उम्मीद करना छोड़ दें
दुःख बियाबान जंगल नहीं
दुःख तो वो छाँव है जहाँ आप दिशा भटक जाएं
दुःख वो नहीं जो किसी के चले जाने पर हो
दुःख तो किसी के साथ होते हुए भी न अपनाने पर है
दुःख वो नहीं जो हताश कर दे
दुःख तो वो है जो आशा को निराश कर दे
दुःख वो नहीं जब अन्न न मिले
दुःख तो वो है कि आपके पास अन्न हो और सेवन न कर सकें
दुःख वो नहीं जब आपके पाँव में जूते न हो
दुःख तो वो है कि जूते पहनने को पाँव न हो।