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रविवार, 30 सितंबर 2018

मारक ज़हर

'बापू सहर जात हौ पेड़ा लेत आयो' कलुआ की बात सुनते ही नन्हकू ने खाली जेब में हाथ डाला।
'सुनत हौ बप्पा की खांसी गढ़ाई रही न होते कौनो सीसी लाय देते सहर ते...इत्ते दिन ते परे-परे खाँसत हैं..करेजा हौंक जात है..'
'हम सहर बिरवा हलावे नाइ जाइ रहेन..देखी जाय डॉकटर अम्मा का कब लै छुट्टी देइ.. जैसे जेब फाटी जाय रही नोटन ते..यू सब लेत आयो..' सारी खीझ अपनी पत्नी पर निकालते हुए नन्हकू शहर जाने के लिए पगडंडी के रास्ते बढ़ा जा रहा था। लाचार पिता घर पर पड़ा था, माँ शहर के सरकारी अस्पताल में आखिरी साँसे गिन रही थी। इस समय उसकी चिंता का सबब बस एक ही था...अगर माँ को कुछ हो गया तो उसे शहर से गांव लाने और अंतिम संस्कार का खर्च कहाँ से आएगा, उसका रोम-रोम कर्ज से डूब गया था...अब कौन देगा पैसा...ईमान के अलावा और है ही क्या उसके पास?
वह मुक्ति चाहता था। अपना रास्ता बदलकर सीधा दवा की दुकान पहुँचा। मारक जहर लेकर घर की रास्ता पकड़ी। दरवाजे पर पहुंचते ही सन्न रह गया। शायद बड़कू अम्मा के मरने की खबर लाया था। पिता को देखकर कलुआ पेड़ा लेने की आस में उससे लिपट गया। जेब में हाथ डाला और खुशी-खुशी घर के अंदर भाग गया। घर के बाहर लोगों का जमावड़ा था, मिट्टी लाने की बात चल रही थी। 
कुछ देर बीता ही था कि कलुआ की माँ चीखते हुए बाहर भागी, 'हमार कलुआ के मुँह से फेना काहे आ रहा..कलुआ के बापू?' नन्हकू की घिग्गी बँध गई और वह अचेत होकर गिर पड़ा...कलुआ वो मारक जहर खा चुका था।

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