" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!: प्रेम कविता
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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

कौमार्य का मादक सा हँसना


 


















मन मदन है देह वायु

भूमिजा अपलक नयन है

कर्ण कुंतल नासिका मणि

कटिबंध पर आंचल हरण है


क्षीर का बांका कोई अब

थामे नीर कंचन कामिनी को

चपलता, लालित्यता को

रुपसी मृगनयनि को

मुख लजाती माधुर्य करती

रति में रति का आवरण है


दृग से दृग का ज्यों हो मिलना

रेख अधरों का संवरना

दृष्टि में उतरा वसंती

कौमार्य का मादक सा हँसना

भाव गूँथे वेणियों में

केश बिच यामिनी का अंतरण है


शुक्रवार, 2 मई 2025

मार्केज़ मर्सिडीज सा कुछ



मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है

जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से

और मैं ख़ुद को उसके बाद

झोंकना चाहूँगी

इंतज़ार की भट्टी में

वह इंतज़ार

जो क़िस्मत से पूरा हो

वह इंतज़ार

जिसकी क़ीमत

कई एक साल हो

तुम लिखो इस दरमियाने में

‘नाइट्स आफ सॉलिट्यूड’

बंद रखो ख़ुद को

कहीं दूर सबसे अलग

और मैं कर दूँ एक जमीन-आसमान

पता हो हम दोनों को

आख़िर में आना ही है एक साथ

तुम कहो तुम चाहते हो मुझसे शादी करना

और मैं पूछ बैठूँ, क्यों

फिर तुम कहो कि तुमने पढ़ ली हैं

मेरी सारी कविताएँ

और फिर मैं लिखने लग जाऊँ

कविताएँ

बस तुम्हारे लिए

सृष्टि की सबसे सुंदर कविताएँ


कितना अधूरा होता होगा वो

जो नहीं लिख पाया होगा

विरह की पीड़ा

कितना अभागा होगा वो भी

जो नहीं जी सका होगा वह चुंबन

जो प्रेमिका के होठों की सूखी पपड़ी से

आ गया होगा छिलकर

प्रेमी के होठों पर


मैं नहीं घबराऊँगी

उन क्रन्दनों से

उस पीर से

रच लूँगी तुम्हारे नाम का एकांत

अपने आसपास

तुम लिख सको प्रेम

अपनी कविताओं में मेरे नाम का

…और फिर

हम कभी नहीं मिल पायेंगे

जैसे नहीं मिल पाये थे

सोनी और महिवाल

जैसे नहीं मिल पाये थे

हीर और रांझा


और फिर हमें

कभी जुदा ना कर सकेगा कोई

जैसे जुदा नही हुए थे मार्केज और मर्सिडीज़


लेकिन उसके लिए तुम्हें

कर जाना होगा मुझे अमर

मेरे लिए लिखी अपनी कविताओं में


रविवार, 1 सितंबर 2024

मेरा विचित्र प्रेमी

 


फूल मेरा प्रतिबद्ध प्रेमी

भेजता रहता है कितनी ही खुश्बुएँ

हवा के लिफाफे में लपेटकर


मौसम मेरा सामयिक प्रेमी

आता है ऋतुओं में लिपट

कभी वसंत बनकर कभी शीत

तो कभी उष्ण के नाम से


दीया मेरा अबूझा प्रेमी

तकता ही रहे मुझको

और चाहे कि सब तकें मुझे

उसकी लौ में बैठकर


अंधेरा मेरा धुर प्रेमी

लील जाता है दिन को हर रोज

मुझे आलिंगन करने को


गगन मेरा दूरस्थ प्रेमी

देखता रहता है मुझे अपलक तब तक

जब तक मैं छुपा न लूँ ख़ुद को उससे

किसी छत की ओट में


लेखक मेरा विचित्र प्रेमी

मुझे…हाँ मुझे

गढ़कर अपने शब्दों में

नाम ज़िंदा रखेगा मेरा

तब, जब जा चुका होगा इनमें से

हर एक प्रेमी मुझसे दूर

तब, जब मैं भी नहीं रहूँगी

तब, जब कोई भी न रहेगा

तब भी जब सृजन

प्रलय में बदल जायेगा

बस प्रेम रह जायेगा


गुरुवार, 15 अगस्त 2024

याद बहुत आते हो ना

 


अपनी आँखों में

नक्शा बाँधकर सोने लगी हूँ अब

सपनों में आ जाती हूँ

तुम्हारे पास


चले आने की आहट किये बिना ही

तुम्हारे सिरहाने बैठे बैठे

पूछ लेती हूँ, मे आई कम इन

और जब तुम कहते हो ना,

धत पगली और कितना अंदर आयेगी

तब माँ कमरे के बाहर तक आकर

लौट रही होती है...

नींद में बड़बड़ाने की बीमारी

ब्याह के बाद ही जायेगी बुद्धू की

मैं, मेरा बुद्धू, कहकर

अनंत प्रेम पाश में

समेट लेती हूँ तुम्हें

शुक्रवार, 14 जून 2024

प्रेम में मैं

मुझे तुमसे

लड़ना नहीं था

पर तुम्हारे सामने

खड़े होना था

जब तुम्हारी ओर

बढ़ने लगे

बहुत से हाथ

सहानुभूति के

जब तुम बढ़ाने लगे

अपने दायें बायें

क़द औरों का

तब मेरी ज़िद थी

मुझे तुमसे

आगे निकलना था

मंगलवार, 11 जून 2024

प्रेम का माधुर्य

 


सर्वेक्षण से कमायें और जीतें


'मैं तुम संग प्रेम में हूँ'

यह कोई प्रणय निवेदन नहीं

मेरे मन का माधुर्य भर है

शकरपारे से पगी अपनी दीद

रख देना चाहती हूँ

मैं तुम्हारी हथेली पर

लज्जारुण हो तुम लगा लेना

हथेली अपने सीने से

संध्या विनय के क्षणों में

नीड़ चहकने तक

तुम आकाश सुमन हो मेरा

सौम्य नभ कमल

मेरे विनयी साथी

मेरी तंद्रा का आकर्षण

कल्पनाओं की नीलगिरि से

आती हुई परिचित भाषा

मुझे नहीं पता मैं कौन

और तुम मेरे मन का मौन

रविवार, 24 मार्च 2024

तुम केसरिया हो


 •तुम प्रिय

तुम प्रियता

सांसारिक निजता

हिय दृष्टा हो


तुम अंतर्दिष्ट सखा हो


तुम अतीत का

नाम जप

तुम स्नेह का

प्रतीक्षित तप


मैं हूँ सूर तुम दृष्टा हो


तुम फाग

तुम ही फाग राग

अनछुआ रंग

कुसुमित पराग


मैं श्याम कमल तुम केसरिया हो


रविवार, 10 सितंबर 2023

हमारे रास्ते


यूँ ही अलग अलग रास्तों से
फिर कभी मिल जायेंगे

तुम जम्हाई बोना मेरे चेहरे पर
अपने पास बिठा लेना
हम ख़्वाब में भी बस तुम्हें
हाँ तुम्हें गुनगुनायेंगे

वो जो कविता गायी थी
तुमने एक रोज मेरे लिए,
उसके सुरों से एक सड़क बनायी है
उसके इर्द-गिर्द तन्हाई बिछायी है
हम चलेंगे एक दिन उस सड़क पर
साथ-साथ

यूँ ही अलग अलग रास्तों से
फिर कभी हम मिल जायेंगे

संगीत के सादा नोट की तरह

रविवार, 20 अगस्त 2023

प्रार्थनायें

मेरी प्रार्थनाओं में
कभी नहीं आये
मंदिर-मस्जिद,
गिरजाघर-गुरुद्वारे
बल्कि इन स्थानों पर
पनपी हैं याचनायें
मुझे प्रार्थनाएं आयीं
वहाँ-वहाँ
जहाँ-जहाँ
लिखा मैंने
कोई प्रेम गीत
तुम्हारे साथ
तुम्हारे लिए

शनिवार, 11 सितंबर 2021

प्रेम का संत्रास

*****

तुम्हारी चुप्पियों का विस्तारित आकाश

भर देता है मुझे दर्द के नक्षत्रों से

आकाश गंगा की समग्रता

भंग करती है मेरी एकाग्रता और

पैदा करती है मुझमें एक नयी चौंक

बात-बात पर इतनी सजग तो कभी न हुई मैं

मैंने देवदार के पत्तों पर भी

अपना मन भर आहार जिया है

मैं रखना चाहती हूँ उस पर अपना बड़बोलापन

कितनी भी प्रेम की गागर भर लूँ मन में

थाह गहरी तो तुम्हारे मौन की रही है सदैव

भुला दी हैं तुमने मुझे वायुमंडल की समस्त भाषाएँ

रात्रि की मेरुदंड पर अधाधुंध दर्द लिखती हूँ

क्यों देखते हो तुम उसे कलंक

मैं सोना चाहती हूँ मृत्यु की एक पूरी नींद

तुम जागकर भटकते रहते हो मुझमें

इतना कि बन जाते हो मेरी सुबहों का मंगल

मैं औषधि का प्याला बढ़ाती हूँ तुम्हारी ओर

तृप्त होऊँ तुम्हें पीते देखकर और

ले लूँ चुम्बन तुम्हारे अधरों का

अमरत्व चखना है मुझे सृष्टि का

तुम्हारे होने तक उत्सव मना सकूँ मैं भी.

तुम्हारे मन का गृहस्थ मौन है न

और मेरे मन का सन्यास, मोह भर उपजी पीड़ा.

बुधवार, 8 सितंबर 2021

प्रेम में जोगिया

 न मिले सात सुर

न सप्तपदी हुई

साँस प्रेम की

हर साँस ठहरी रही


सुमिरन करुँ

प्रेम में मैं प्रवासी

मन को पाषाण

कर देह सन्यासी


जोगिया मुझसे मिलना

जब मिले देह काशी

घाट मणिकर्णिका

क्लांत पथ कोस चौरासी

शनिवार, 28 अगस्त 2021

प्रियतम को पहली पाती

बार-बार अधरों की लाली
शर्माती और सकुचाती,
नेह निचोड़ लिखी जब हिय से
प्रियतम को पहली पाती:

मैं अक्षर सारे भूल गयी
संकेत ही बिम्ब बने मन के,
अरज कोई और भावे न
जब बोल बने बसन तन के,
उनके संग को ढूंढ रही
उन ढाई आखर की थाती,
फिर सारा प्रेम उड़ेल लिखी
प्रियतम को पहली पाती:

काया गोकुल मन वृंदावन,
तिरछी मुस्कान है मनभावन,
अँखियाँ बन्द करूँ दिखते
बस उनके नयन लुभावन,
आभा उनकी जिनसे सुंदर
उस चाँद को देखके हर्षाती,
किरणों को कलम बनाय लिखी
प्रियतम को पहली पाती.

सोमवार, 23 अगस्त 2021

तितिक्षु प्रेमी

मैंने इमरोज़ नहीं चाहा

न ही उसकी पीठ

तुम्हारा नाम उकेरने को,

तुम साहिर भी मत बनना

शायद ही कभी मैं

चूल्हे पर चढ़ा सकूँ

तुम्हारे नाम की चाय

बस यूँ ही बने रहना

मेरी सुबह, मेरी शाम और रात

मेरी आत्मा के साथी.

सोमवार, 16 अगस्त 2021

सृष्टि, तुम्हारी हथेली में

 ब्रह्मा का वास है

तुम्हारी कलाई में

मुट्ठी में शिव

और उँगलियों में चतुरानन

चारों दिशाओं में घूमती कलाई

बस एक भी शब्द पर

ठहर भर जाए

तोड़ देते हो

अपने ही सारे आयाम

सृजन के.

प्रिय है कलाई ही इतनी

कि मुट्ठी और उँगलियाँ

वंचित हैं स्नेह से अब तक.

सोमवार, 9 अगस्त 2021

आ जाए अगर गुस्सा मुझ पर

अब आ जाये अगर गुस्सा मुझ पर

तो दूर न कर देना ख़ुद से

तो पहले ही जता देना मुझसे

मैं चूम ललाट मना लूँगी

रख अधरों पर तुम्हारे तर्जनी अपनी

अंगुष्ठ से ठोढ़ी सहला दूँगी.


अब आ जाये अग़र गुस्सा मुझ पर

जो चाहे मुझको तुम कह लेना

दिल हल्का अपना कर लेना

आवाज़ जो तुमको देती रहूँ

कुछ मत कहना गुस्सा रहना

मैं रात धरा के शानों पर 

रोते हुए बिता दूँगी

जब आऊँ अगली सुबह तुम तक

तुम चाय का प्याला उठा लेना

कुछ मत कहना चुप ही रहना

बस लिखते जाना, पढ़ने देना.


अब आ जाये अग़र गुस्सा मुझ पर

मेरे हक़ की स्याही और को तुम

न देना, इतना सुन लेना

दो-चार रोज को मौन भला

महीनों मातम में न बदल देना

गले लगा लेना हमको

या गला दबा देना मेरा

पर दर्द से अपने न जुदा करना

मुझे कभी-कभी तो मिला करना

अब आ जाये अग़र गुस्सा मुझपे

बस गुस्सा ही किया करना

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

प्रेम का एंटासिड

 


तुम शब्दों में इज़ाफ़ा भी तो न लिख गए...

एक वैराग से होते जा रहे हो

जैसे ख़ुद में ही एक बड़ा सा शून्य

कहते तो हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता

मग़र जो दिख रहा वो क्या है?

अपने दाल चावल में थोड़ा सलाद क्या बढ़ा

तुम उँगलियाँ चाटने लगे थे

और अब....

एंटासिड तकिए के नीचे रख कर सोना

ये जो तुम्हारा सर दर्द है न

ये ज़्यादा सोचने का नतीजा है बस

उठते ही खा लेना एक गोली

हम जी रहे हैं न अपने हिस्से का माइग्रेन

बुरे जो ठहरे...

तुम...तुम तो प्यार हो बस

धड़कन से पढ़ा गया

आँखों में सहेजा गया,

रोज़ तुम्हारी कविता की ख़ुराक लेकर

ऐसे सोते हैं

मानो ज़मींदोज़ भी हो जाएं

तो जन्नत मिले

तुम्हारे शब्दों के अमृत वाली...

हमें पता है इसे पढ़कर तुम

सूखे होठों पर अपनी जीभ फिराओगे

काश के हम आज तुम्हें पिला सकते

एक चाय...सुबह की पहली वाली

हम साथ नहीं दे पाएँगे मग़र तुम्हारा

जबसे मायका छूटा

चाय का स्वाद हमसे रूठा

...एक दिन आएँगे न ससुराल से वापस

और तुम्हारे गले लगकर पूछेंगे,

"क्या तुमने अब तक...?"

चलो छोड़ो अभी

बहुत रुलाते हो तुम हमको!

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

प्रेम ही तो ब्रह्मचर्य है

इस सदी का ब्रह्मचर्य

एक मात्र प्रेम ही तो है.

प्रेम कौमार्य नहीं भंग करता

सौहार्द्र बढ़ाता है,

संकीर्णता के

जटिल मानदण्डों को तोड़कर

समभाव की अनुभूति कराता है.

अब निकलना होगा प्रेम को

किताबों से, ग्रंथों से

और हम सभी के मन से भी बाहर…

यदि कम करनी है

दूरी हृदयों के मध्य की

तभी तो रुक सकेंगे ग्लेशियर पिघलने से

जब सम्पूर्ण को देखने की

हम सभी की दृष्टि एक ही होगी

शनिवार, 17 जुलाई 2021

लव एक्सटिंक्ट

 


मुझे यक़ीन है

एक दिन

तुम अपने

बच्चों के बच्चों को

सुना रहे होगे

अपनी प्रेम-कहानी

और वो कौतूहल वश पूछ बैठेंगे

"दादू ये प्रेम क्या होता?"

और तुम हँसकर

बात टालने की बजाय

उन्हें समझाओगे,

"ये प्रेम ज्वर नहीं

देह का सामान्य ताप

हुआ करता था

जिन्हें पढ़ सकते थे

केवल तापमापी यंत्र

….."

मुझे ये भी यक़ीन है कि

इसके आगे तुम

कुछ नहीं बोल पाओगे

तुम्हें चाहिए होगा

अपने आँसू पीने को

मेरी आँखों का पानी

कल आज और आने वाले कल में

यही तो शेष रह जायेगा.


प्रेम बचाकर रखेगा

अपना अस्तित्व

डायनासोर के मानिंद

जिसे हम में से किसी ने नहीं देखा

पर कहा जाता रहेगा

युगों-युगों तक

सबसे बड़ा प्राणी.


PC: Google


सोमवार, 12 जुलाई 2021

कैसे कहें प्रेम है तुमसे!


बहुत प्यार करने लगे हैं हम तुम्हें

जाने कितने दिनों से दिल में

चल रहा है बहुत कुछ

और कोई बात नहीं होती

कोई और होता भी नहीं वहाँ

इस तरह रहने लगे हो हमारे दिल में

कि हमें भी रहने नहीं देते हो अपने साथ

किए रहते हो अलग-थलग जैसे

हवा की आहट पर झाड़ देता हो

कोई पत्ता अपनी देह की धूल

बात-बात पर कर देते हो हमें अपनी

उन मुस्कुराहटों से विस्थापित

जिनके इंतज़ार में गीली रहती हैं कोरें

तुम्हारी सवा किलो की यादें

और एक मन का दर्द…

कभी रुको न हमारे सामने घड़ी दो घड़ी

तो देख लें मन भरकर तुम्हें

चूम लें तुम्हारे होने को

कभी कहो न कुछ…

क्यों कहें हम, कितना प्यार है तुमसे

खोल तो दी है हमने अपनी

इच्छाओं की सीमा

विचरण कर रहा है प्रेमसूय अश्व

हमें स्वीकार है तुम्हारी सत्ता

हम निहत्थे ही आयेंगे तुमसे परास्त होने

एक बार चलाओ अपना प्रेम शस्त्र.


PC: Google

सोमवार, 5 जुलाई 2021

जाने क्यों!

 



जब सार्थक हो मौन

तो माप आता है

आकाश गंगा से लेकर

पृथ्वी की बूँदों का घनत्व,

समझ आता है

दिव्य भाव-भंगिमाएँ,

तुला पर रख गुज़रता है

अकाट्य तर्क

....

अगर असफल होता है

तो बस

प्रेम का उतार चढ़ाव पढ़ने में.

जाने क्यों नहीं पढ़ पाता

प्रेमिका का निःछल मन!

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php