" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!: कौमार्य का मादक सा हँसना

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

कौमार्य का मादक सा हँसना


 


















मन मदन है देह वायु

भूमिजा अपलक नयन है

कर्ण कुंतल नासिका मणि

कटिबंध पर आंचल हरण है


क्षीर का बांका कोई अब

थामे नीर कंचन कामिनी को

चपलता, लालित्यता को

रुपसी मृगनयनि को

मुख लजाती माधुर्य करती

रति में रति का आवरण है


दृग से दृग का ज्यों हो मिलना

रेख अधरों का संवरना

दृष्टि में उतरा वसंती

कौमार्य का मादक सा हँसना

भाव गूँथे वेणियों में

केश बिच यामिनी का अंतरण है


9 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर

Vishul ने कहा…

Wow, Beautiful

M VERMA ने कहा…

Wahh

रेणु ने कहा…

बहुत सरस और मोहक सृजन अभिलाषा जी! आपकी रचनाओं में प्रेम का रूप अद्भुत है ❤️🙏

Roli Abhilasha ने कहा…

आभार!

Roli Abhilasha ने कहा…

Thank you!

Roli Abhilasha ने कहा…

बेहद आभार आपका!

Roli Abhilasha ने कहा…

Shukriya!

Roli Abhilasha ने कहा…

बहुत ही आभार आपका!

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php