मन मदन है देह वायु
भूमिजा अपलक नयन है
कर्ण कुंतल नासिका मणि
कटिबंध पर आंचल हरण है
क्षीर का बांका कोई अब
थामे नीर कंचन कामिनी को
चपलता, लालित्यता को
रुपसी मृगनयनि को
मुख लजाती माधुर्य करती
रति में रति का आवरण है
दृग से दृग का ज्यों हो मिलना
रेख अधरों का संवरना
दृष्टि में उतरा वसंती
कौमार्य का मादक सा हँसना
भाव गूँथे वेणियों में
केश बिच यामिनी का अंतरण है
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9 टिप्पणियां:
सुंदर
Wow, Beautiful
Wahh
बहुत सरस और मोहक सृजन अभिलाषा जी! आपकी रचनाओं में प्रेम का रूप अद्भुत है ❤️🙏
आभार!
Thank you!
बेहद आभार आपका!
Shukriya!
बहुत ही आभार आपका!
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