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गुरुवार, 1 नवंबर 2018

जब हम...तब तुम


जब हम घर का आख़िरी दिया बुझा दें,
जब हम भीतर आकर
किवाड़ की सांकल चढ़ा दें,
जब हम इन पाँवों पर
होंठों की लकीर सजा दें,
जब हम बदन से लिबास की
दूरी बढ़ा दें,
जब हम गुरुत्व हम-दोनों का
कुल जमा कर दें,
जब हम घनत्व साँसों की हवा का
गुना कर दें,
जब हम हृदय पर हाथ रखकर
संदेश उत्तेजना का रवां कर दें,
जब हम नमी उन होंठों की
जवां कर दें,
........
क्या तुम आँखों में देखोगे
हमसे ये पूछोगे
'मिज़ाज कैसा है जनाब का'
तब तो हमें दुल्हन बना लोगे न,
अपनी बाहों के घूँघट में हमको
छुपा लोगे न,
इस संगमरमर की नक्काशी को
तराशोगे न,
चक्षुओं से दो क्षीर मटकों को
ताकोगे न,
हाथों में भरकर अपनापन
जताओगे न,
उस नमी से रात शबनमी
बनाओगे न,
अपनी चोटों से रात भर
जगाओगे न,
हर वार पर आह, सिसकी दिलाओगे न,
जब क्रिया होगी तभी न
प्रतिक्रिया का बिगुल बजेगा!

3 टिप्‍पणियां:

रेणु ने कहा…

बहुत खूब। श्रृंगार रस की सहज अभिव्यक्ति!!!!

Roli Abhilasha ने कहा…

आभार दी!

Roli Abhilasha ने कहा…

आभार रेणु जी!

मेरी पहली पुस्तक

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