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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

पहली तारीख...


इकतीस दिनों के महीने का
आखिरी वाला दिन
कितनी नाउम्मीदी और
बेचैनी से बीतता है
एक बंधी हुई
तनख्वाह उठाने वाला
साधारण सा मध्यमवर्गीय
परिवार बता सकता है,
रसोईं घर के खाली बजते हुए कनस्तर
खाने की मेज पर कम हुई फलों की मात्रा
फ्रिज में मुँह चिढ़ाती महज पानी की बोतलें
दाल में बढ़ गयी तरलता
बच्चों का आखिरी पन्ने पर घना-घना लिखना
बाबूजी का टूटा हुआ चश्मा धागे से बाँधना
हर महीने की बीस तारीख को
मुन्नी की गुल्लक इस आश्वासन पर तोड़ना
कि इस बार तो सूद के साथ भरेगी
बहुत डरावना होता है
बीस से तीस के बीच का सफर
जब विवशता में एक और दिन जुड़ता है
बहुत खीझ आती है
क्यों लंबी हुई अवधि महीने की
जबकि बाबू तो इस बार भी
वही पतला सा नोटों का लिफाफा देगा,
ये समझे बिना
कि मुन्ना इकतीस को भी
दूध की उतनी ही शीशी माँगता है
काला धुँआ छोड़ता इनका स्कूटर
उसी ईंधन में दफ्तर पहुँचता है
फिर भी गृहणी
उम्मीद पर मुस्कराती है
कि कल पहली तारीख है
सब ठीक हो जाएगा।

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मेरी पहली पुस्तक

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