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शनिवार, 2 सितंबर 2017

मुझे वो हर सहर उधार दे

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सरे-शाम से लिये चिराग,
तेरी याद में मैं बेहिसाब,
बैठी हूँ तेरे सिजदे को,
मुझे एक रात नवाज़ दे।
कहाँ है मुझको ये बता,
सुलग रही है मेरी जफ़ा,
फिक्र है मुझे बस तेरी,
तू कहीं से तो आवाज़ दे।
तेरे नूर को मैं चूम लूँ,
प्यारा है मेरा रहनुमा,
वरक़-वरक़ सिमट सकूँ,
बस तेरे लफ्ज़ सँवार दे।
न छाँव अपनी दे मुझे,
न नाम का तू अक्स दे,
जो शाम तुझमें हो घुली,
मुझे वो हर सहर उधार दे।

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मेरी पहली पुस्तक

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