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हया की वो रात!

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फूट-फूट कर रोया था
वो पहली रात
उस नामुराद के लिए,
जब वो बोली थी
'तुम्हें हमबिस्तर होने का
तज़ुर्बा ही नहीं है';
उस कमरे में
एक ही बिस्तर पर
खिंच गयी थी तकिये की दीवार:
इस तरफ़ उसके अरमान
मुहाफ़िज़ बने बैठे थे
और दूसरी तरफ़ रातों की
रंगीनियां थी बेहिसाब,
न इज़्ज़त थी न अक़ीदत
बस तलब थी
आगे बढ़ते जाने की।
क़ुसूर उसका भी नहीं
कि वो जीना सीख गई,
पर क्या उसका था
कि वो कोठों की रवायतों से
अनजान क्यों था?
सुनते हैं तो कानों में
शीशे सा पिघलता है
मगर सौदायी
असभ्यता, कुसंस्कृति का तीर
बड़ी तेज़  चलता है।
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