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शनिवार, 16 सितंबर 2017

मुझे स्त्री ही बने रहने दो!

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स्त्री हूँ मैं
और जीना चाहती हूँ
अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के साथ;
क्यों करूँ मैं बराबरी पुरुष की,
किस मायने में वो श्रेष्ट
और मैं तुच्छ!
वो वो है
तो मैं भी मैं हूँ,
ये मेरा अहम नहीं
मुझे मेरे जैसा
देखने की तीक्ष्णता है
स्वीकारते हो न,
मैं और तुम
ये दो पहिये हैं हम के;
अगर तुम्हारे बेरिंग घिस रहे जीवनपर्यंत
तो मेरे कौन सा
गुणवत्ता की कसौटी से परे हैं,
इन्हें श्रेष्ठता के तराजू में
नहीं तोलना है मुझे,
ये तो ज़िन्दगी के कोल्हू में
पहले से मंझे हुए हैं;
एक द्वंद जो चल रहा मैं के भीतर
उसका समूल विनाश ही तो बनाएगा
हम का संतुलन:
मैं तुच्छ नहीं
वही तो है इस सृष्टि की सृजक
और तुम पालक हो इस सत्ता के
तभी तो हम से सन्तुलन है,
और अहम विनाश की
व्यापक स्वरूपता।

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मेरी पहली पुस्तक

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