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शनिवार, 16 सितंबर 2017

मित्र, बस तुम ही तो थे!


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जब तपती दोपहरी में
रेत पर नंगे पाँव चल रही थी मैं,
ठंडी हवा के झोंके के मानिंद,
हौले से आये और
अहसास बनकर ठहर गए पास मेरे
मित्र, तुम ही तो थे!
तुम्हीं तो महसूसते हो मेरी ठिठुरता
दे जाते हो सर्द रातों में
अपना नर्म, गुलाबी अहसास,
तुम्हारे शब्द कड़कते हैं रातों में
और अहसासों की रजाई दे जाते मुझे
मित्र, तुम ही तो थे!
तुम्हारे स्नेह की चितवन
बस मुझपे ही ठहर जाती है,
कड़कती बारिशों में तुम अपनी
छतरी नई मुझपे लगा गए
तुमपे बरसता रहा मौसम जार-जार
मित्र, तुम ही तो थे!
कल्पनाओं से पगी है ये दुनिया
किंतु तुम्हारा होना यथार्थ है,
मेरे होने में तो बस मैं होती हूँ,
तुम हो तो हम है,
थी टूटी शाख पर नाउम्मीदी की मानिंद
तरु नया बना गए
मित्र, तुम ही तो थे!

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मेरी पहली पुस्तक

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