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मेरी खुशी

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जी करता है
एक मन्नत का धागा बांध दूँ,
कलाई पर तुम्हारी,
काला टीका लगा दूँ
माथे पर
जो दूर से दिखे,
बुरी नज़र पास आने की
हिमाकत न कर सके,
एक ताबीज बनाकर पहना दूँ,
गले में
जो तुम्हे अजेय बनाये रखे,
मुझे ये तुम्हारा
आईना देखकर संवरना
बिल्कुल भी नहीं अच्छा लगता,
दुनिया की नज़र से तो बचा लूँ तुम्हे
पर अपनी नज़र खुद पे ही
खराब करने लगे हो आजकल,
कितने वहमी हो गए हो
खुद को ही कसौटी पर
रखने लगे हो आजकल,
कोई तुमसा भला होगा क्या?
एक विश्वास वाला रुद्राक्ष भी होगा
तुम्हारे बाजू पर,
मेरी खुशी के लिए।
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मेरी पहली पुस्तक

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