उस दिन
वैदेही और धरती के संवाद
मन में उतरे
उस दिन
प्रतिकारस्वरूप राम
मन से उतरे
राम
अहिल्या के रहे
शबरी के रहे
जानकी के नहीं
कलयुग में भी तो ऐसा ही है
पुरूष स्त्रियों का सगा होता है
पत्नी को सहर्ष त्याग तक देता है
क्यों पूजूँ मैं राम को
जानकी को
या फिर अहिल्या को?
यह प्रतिकार नहीं
प्रश्न है मेरा
रीढ़ विहीन होता जा रहा समाज
मूढ़ हो चुका है
प्रश्न के प्रत्युत्तर में
गढ़ने लगा है प्रश्न
जब विवेक हीनता में
नहीं रख पाता तर्क
तब मौन हो जाता है
स्वांग रचता है
बुद्ध होने का
मैं भी बुद्ध हो जाती हूँ
अंतर से शुद्ध हो जाती हूँ
ईश्वर को स्वयं में पाती हूँ
अप्प दीपो भवः
दोहराती हूँ
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