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मंगलवार, 23 जनवरी 2018

मैंने लिखना छोड़ दिया है

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तुम्हारी मुस्कराहटों के नाम 
वो जो रक्तिम अक्षर थे 
आखिरी थे मेरी कलम से
तोड़ दिया अग्र भाग
कि ये विवश हो जाये,
अब नहीं होगी न, वो स्याही
जो तुम 
अपनी देह की ऊष्मा पिघलाकर
दिया करती थीं,
तुम्हारी झनकार लय थी
मेरे गीत का
सुलझाते हुए तुम्हारे अलकों को
शब्द बिखरते थे हर पन्ने पर
जब झुकाती थीं तुम पलकें
माधुर्य सिमट आता था कविता में;
न भी होती थीं तो
मुझमें छुपी होती थीं
तुम तो चुरा ले गईं खुद को मुझसे
अब कहाँ से लाऊँ वो रस
मैंने लिखना छोड़ दिया है
क्योंकि
रूठे हुए मीत को मनाऊँ कैसे
बिन मीत गीतों में रस लाऊँ कैसे

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मेरी पहली पुस्तक

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