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और प्रदूषण मत फैलाओ

 




मैं हवा हूँ

उठाती हूँ गिराती हूँ

नज़र नहीं आती हूँ

प्रदूषित नहीं होना चाहती हूं

मुझे बचाओ

प्रथ्वी के प्राणियों मुझे नज़र न लगाओ

मुझे बचाओ 


मैं जल हूँ

घर से नदी-नालों तक

करता कल-कल हूँ

उत्तर से दक्षिण तक

चलता पल-पल हूँ

मुझमें कचरा न फैलाओ 

मुझे बचाओ

घने बादल न चुराओ 

मुझे बचाओ


मैं जंगल हूँ

वृक्ष-वृक्ष से मैं बनता

तूफानों में सीधा तनता

औषधि, वायु और फूल-फल

लेती मुझसे सारी जनता

मुझ पर आरी न चलवाओ

मुझे बचाओ 


मैं तारा हूँ

रातों का दुलारा हूँ

खो गया चकाचौंध में

खोज पाओगे, तो प्यारा हूँ 


मैं सूरज हूँ

आता हर रोज हूँ

ग्रीष्म में दिखाते हो आँखें

शीत में खोज हूँ 


मैं चंदा

कहलाता मामा हूँ

और हूँ अच्छा बंदा


मैं धरती हूँ

माता कहते मुझको

मेरे बच्चों, तुम्हारा भार सहती हूँ

मुझसे हवा, जल, जंगल न चुराओ

मुझे बचाओ

सब की सखी

तुम सभी के जैसी

मैं भी हूँ दुःखी 


मैं पर्वत अरावली

लेकर मशीनें घूम रहे तुम

मैं सीना तान खड़ा हूँ

तुम सबके लिए

प्रदूषण से लड़ा हूँ

अब तुम मुझी से लड़ रहे हो

कर जीवन को मरण रहे हो 



मैं मानव

मुझे इतना न करो लज्जित

मैं सबसे पराजित

लेता हूँ शपथ

स्वच्छ रखूँगा जगत

त्राहिमाम न करो

मुझे अपनी शरण लो

यदि जंगल कटे तो औषधि नहीं

पर्वत कटे तो परिधि नहीं

सूरज चाचू, चंदा मामा, धरा हमारी माता है

मौसम और जलवायु से गहरा हमारा नाता है

जिसने हमको जीवन दिया, उसे बचाने की बारी

कसकर कमर कर ली है तैयारी


2 टिप्‍पणियां:

  1. उव्वाहहहहह
    गंभीर विषय पर चिंतन
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रकृति को दूहता मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए,परिणाम जानकर भी चेतता कहां है।
    सजग करती सार्थक रचना।
    सादर।
    -------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २० जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं