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Saturday, 5 August 2017

Friday, 4 August 2017

मेरा पुनर्जन्म

सुनो,
आज की रात
चाँद जमीन पर उतारकर भी करना!
जब अहसासों की जुम्बिश
निंदिया की हथेली पर
धीरे-धीरे करवट लेगी
तो तारे अपनी नींद भर सोएंगे,
मैं तुम्हारे पहलू में रात भर
भोर की राह तकुंगी।
अपने जीवन के प्रलय को
तुम्हारे सृजन के क्षणों से धोती रहूँगी।
आज की रात
तुम्हारे देह की उष्णता से
हुई बूंदों का स्खलन
मेरे भीतर का बीज प्रस्फुटित कर चुका है,
अब वो ऋतु नहीं होगी कुछ माह
मेरे अंतर में होता रहेगा
मेरा ही पुनर्जनम।

Wednesday, 2 August 2017

मनुहार की हथेली

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सुनो
अब इतनी भी खामोशी
अच्छी नहीं होती,
ये झूठमूठ का अनशन क्यों?
देखो न ये शब्द
सुहागरात को मचल रहे हैं,
और तुमने तो
कलेवा भी नहीं किया,
इन्हें इनके हक़ का दे दो,
अब हम खाली शब्दों से
नहीं मानने वाले,
हमें तो खुशी की पलक पर
उम्मीद का दिया जलाना है,
रात की रानी को
तुम्हारी हँसी से सजाना है,
आओ न
मनुहार की हथेली पर
हां की हल्दी का टीका करो
और
नज़रों के अक्षत से
इस सेज का श्रीगणेश।

Tuesday, 1 August 2017

वक्रीय दुश्वारियां

वो हर रास्ता तय करता गया
ये समझे बगैर
कि उसका हर कदम उल्टा है,
जीवन की बारीकियों में उलझा रहा,
मोटी रेखाएं उसके चारों ओर
त्रिभुज की तरह अड़ गईं,
घेरा तो हर ओर से आच्छादित था
मगर उसने
एक रेखा उठाकर राह बनानी चाही,
समानांतर क्रम टूटा
और राह बनी रेखा पर
समय की वीभत्स दुश्वारियां
360° में नियत हो गईं।

गुनाह

उसने प्यार को गुनाह बताकर
अपने सिरहाने
मगर तकिये के नीचे रखा,
आंखों से रिसते हुए आँसू
उस गुनाह की स्याही को
बूंद-बूंद धोते रहेंगें
और वो तिल-तिल
कसमसाता रहेगा।
उस पाकीज़गी को
गुनाह बनाने में
वो भी तो गुनहगार था
लम्हा दर लम्हा।
कल की सुबह भी
उस गुनाह की स्याही
ज्यों की त्यों मिलेगी
क्योंकि
आंख से रिसने वाली हर बून्द
तकिये के अहम को
भेद नहीं पाएगी
गुनाह और संवर जाएगा।