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बुधवार, 2 मई 2018

क्यों चाहते हो फिर भी...

तुम्हें प्यार करने की चाहत
मेरी ज़िंदा रहने की हसरत
मुक़म्मल तो कुछ भी नहीं
क्यों चाहते हो फिर भी
कड़वा ज़हर कहकर
मोहब्बतों को
हलक से उतार लूँ,
मेरे मनाने की आरजू
तुम्हारे आने की जुस्तजू
रहगुज़र तो कुछ भी नहीं
क्यों चाहते हो फिर भी
दिल को अपने
राह-ए-मोहब्बत से मोड़ लूँ,
मैं बैठी हूँ अधूरी सी
सारी बात अनमनी
गम भुलाने को कुछ नहीं
क्यों चाहते हो फिर भी
तुम्हारी याद के नाम
हर सफ़ा उधार दूँ।

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मेरी पहली पुस्तक

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