'सुनो आज की चाय हम साथ नहीं पी सकते क्या...एक समय, एक ही मेज पर जिसका एक हिस्सा तुम अपने लैपटॉप के लिए रखते थे और दूसरा मैं यूं ही मोबाइल पर उंगलियां फिराते हुए तुम्हें कनखियों से ताकने के लिए रख छोड़ती थी, हूबहू एक ही स्थिति में बैठे हुए...याद है पिछले साल...?' मेरा संदेश अग्रसारित होते ही त्वरित उत्तर आ गया.
साथ ही एक चित्र भी... वही मुस्कुराता हुआ चेहरा, मेज की उसी छोर पर...जैसे अपलक मेरी आंखों में देखते हुए दिल में उतर रहा हो...और एक चाय का प्याला मेरे लिए...
शहर बदल गया तो क्या हुआ सर्द रातों का गर्म अहसास तो अब तक वही है.
To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
मंगलवार, 25 दिसंबर 2018
आज क्रिसमस है
सोमवार, 24 दिसंबर 2018
शनिवार, 22 दिसंबर 2018
रविवार, 16 दिसंबर 2018
सोमवार, 10 दिसंबर 2018
सोमवार, 3 दिसंबर 2018
सोने से पहले
'अरे फ़िर भूल गई.'
अपने आप से बड़बड़ाते हुए बैग की ज़िप लगाते-लगाते ईश को फोन लगाने लगी तभी डोर बेल बजी. फ़ोन बिस्तर पर डालकर दरवाजा खोला रुबीना दी रात के दस बजे आने की माफ़ी मांगते हुए अपने डिज़ाइन किए तीन सूट देते हुए बोलीं,
'ये तेरे टूर के लिए परफेक्ट हैं. मुझे लगा पैकिंग हो जाएगी तभी इस वक़्त आ गई. चलती हूं तेरी सुबह की ट्रेन है न, अब सोना भी होगा.'
'न ऐसा कुछ नहीं दी अगर आपके पास वक़्त है तो प्लीज़ बैठिए.'
'इतना कहती है तो एक कॉफी पी लेती हूं तेरे साथ, फिर तो तू एक महीने बाद आएगी.' मैं किचन में कॉफी बनाते हुए ईश को सोच रही थी. बस दी चली जाए अभी बात करती हूं. कितने कमज़र्फ दिन बीत रहे हैं मैं चाहकर भी उसे वक़्त नहीं दे पा रही. मिलना तो दूर फ़ोन भी... बस ये टूर निपटे किसी तरह.
दी कॉफी की तारीफ़ किए जा रही और मैं उसमें ईश को देख रही थी. उसे भी तो... हे भगवान, मेरे अंदर से ईश कम जैसा हो रहा है...मैं घुट जाऊंगी... दी के जाते ही दरवाजा बंद कर ईश को फ़ोन मिलाने लगी...लो बैट्री...चार्जर हाथ में उठाया ही था कि लाइट चली गई. अंधेरे में किसी तरह कदमों की गिनती करके हैंडबैग तक पहुंची. पॉवर बैंक शायद ऑफिस में रह गया था. मन की पीड़ा से छटपटा रही थी मैं. दरवाजा खोलकर बालकनी में आ गई. आंखों से नींद, पलों में व्यस्तता दोनों ही गायब हो चुके थे. शायद यही वो वक़्त होता है जब मन खत्म हो जाता है और हम बचते हैं महज एक शरीर.
बालकनी में ही एक पिलर पर टिकते हुए बैठ गई. मेरी बालकनी कंक्रीट सी दिखती है मुझे पौधों के लिए वहां कोई जगह कभी पसंद ही नहीं आयी. एक कंक्रीट की उभरी हुई संरचना पर बैठकर टेरिस की फेंसिंग रॉड पर सर टिका लिया. मैं, ईश और प्यारा अतीत...जब दो घंटे भी आवाज न सुनें तो पेट में बटरफ्लाई घूमने लगती थीं...क्योंकि तब हमारे बीच सब कुछ था और मेरे पास वक़्त भी था. आज समय प्रेम और समर्पण पर हावी हो चला था. सुबह 5 बजे मुझे ट्रेन पकड़नी थी और 3 बजे तक...मैं खुद को ही छोड़ चुकी थी. ईश तुम्हारी गुनहगार हूं मैं... अब कोई सफ़र नहीं बस मुख्तसर सी जिंदगी को अपना बनाऊंगी. सोने से पहले ही सब कुछ कर दूं. नींद का क्या भरोसा कहीं मुकम्मल हो जाए तो?
लाइट आते ही मोबाइल चार्ज करके ऑफिस मेल किया कि मैं व्यक्तिगत कारणों से 15 दिन की छुट्टी लेना चाहती हूं ये डरे बग़ैर कि इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत के लिए मुझे सज़ा मिल सकती है. सोचा सोने से पहले ईश को खुशखबरी दे दूं. हमारे बीच समय कोई मानक नहीं रहा. बात करते हुए कभी घड़ी नहीं देखी.
दो-तीन बार की मशक्कत के बाद फोन लगा.
'मैडम ये जिन साहब का नंबर है उनका ऐक्सिडेंट हो गया है. उनको पुलिस की गाड़ी ले गई मोबाइल यही गिर गया था.'
फोन रिसीव करने वाले ने जो लोकेशन दी वो मेरे घर के पास हाईवे की थी. जरूर ईश मुझे सी ऑफ करने आ रहा होगा. ईश तक पहुंचने के लिए मोबाइल लेने जाना जरूरी था.
मेरे गले से छाती तक बस अम्ल रिस रहा था. समय के बहाव के शोले हर मीठी याद पर भारी पड़ रहे थे.
रविवार, 2 दिसंबर 2018
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मेरी पहली पुस्तक
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