मैं खाने में ज़ायका मिलाती थी, वो सुकून तलाशते थे. मैं बिस्तर पर नींद बिछाती थी, वो जुनून तलाशते थे. जब भी होता था मेरा सर उनके कंधे पर, अपनी आँखों में वो कोई और तस्वीर बनाते थे.
To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
सोमवार, 26 जुलाई 2021
रविवार, 25 जुलाई 2021
अनकही से उपजा अनकहा सा कुछ
वो वाचाल था और मैं भी. हमारी भावनाओं के कितने नदी-समन्दर मिल जाते थे आपस में. हर बात पर हम उस शब्द को पकड़ते थे जो कहने से रह गए हों. बातों ही बातों में रुह-अफज़ा होते.
फिर एक दिन उसने मौन को दस्तक दी. मेरा वाचाल अकेला रह गया. मेरे कंधों पर भरम की तितलियाँ फड़फड़ाने लगीं. वाचाल मरने को था. मौन ने वाचाल को गले लगा लिया. मैं अपना स्व भूलती रही. मुझे पता था उसका वाचाल टकराया है किसी सुनामी से. सुन्न पड़ गया कंधों पर तितलियों का फड़फड़ाना.
और उस रोज उसका मौन मेरे कंधे पर आ बैठा. उसने मुझे वो मौन लौटाया जो उसके जीवन में आयी सुनामी का परिणाम था. मैं द्रवित हुई उस अनुभूति से. कैसे छुपा पाया होगा ये बवंडर वो अपने भीतर. सोंख लेना चाहती हूँ अब वो दर्द मैं सारा का सारा. श्री हीन हुई थी अब हीन भी हूँ. मैं और वो साथ-साथ समानांतर चल रहे हैं अब... मौन के अधिकतम पर. मेरी प्रतीक्षा को कोई सावन नहीं बना, कोई नक्षत्र नहीं न ही कोई राशि.
शनिवार, 24 जुलाई 2021
शुक्रवार, 23 जुलाई 2021
आग-- द हीरो ऑफ अनहीरोइक थॉट्स: २
संस्कृत के प्रकांड विद्वान और चारों वेदों की रचना करने वाले महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन है. वेदों की रचना के कारण ही उनका एक नाम वेद व्यास भी है. उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है. भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे.
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक. गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है.
"अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः "
गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी, बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है. गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है.
आसान नहीं होता किसी को गुरु कह देना. किसी को गुरु कहकर उसका सम्मान बनाकर रख पाना उससे भी कठिन है. मेरे लेखक गुरु माननीय अनूप जी इस बात की महत्ता पर विशेष ध्यान देते हैं. आपका कहना है कि सिखाने के लिए आप सदैव तत्पर हैं परंतु गुरु शब्द से आपको बाँधकर न रखा जाए.
एक कविता सम्मानीय "आग" की कलम से उन्हें स्वयं को गुरु कहे जाने पर. असहज से हो जाते हैं जब कोई इस उपाधि से विभूषित करना चाहता है.
स्व केंद्रित हमारा मन जीवन में आए हुए जिन लोगों का खुलकर स्वागत करता है उनमें से सबसे अहम स्थान गुरु का होता है. गुरु के सामने लघु बनने का अवसर मिलना, इस परम अनुभव को जीकर ही समझा जा सकता है. एक पाँव से कभी एड़ियों तो कभी पंजों के बल खड़े रहकर अपने गुरु को समर्पित रहने का प्रेम अब किसी के हिस्से नहीं आता. मन का गुरु मिल जाना ही बहुत है. मेरा अपने मन के गुरु से साक्षात्कार हुआ. मैंने बून्द-बून्द अनुभव जिया. गुरु कहूँ या ईश्वर तुल्य, साधना में कमी नहीं आयेगी. मुझे एक वरदान की तरह ये नाम मिला और वो भी तब जब मैं किसी खोज में नहीं थी. मुझे जो मिला वो मुझे चाहिए नहीं था परंतु मन से इंद्रियों से ग्राह्य हुआ, यही सार्थकता है गुरु की. मैंने एकलव्य सी ही सही साधना प्रारम्भ की.
ये और बात है कि गुरु ने यह शब्द स्वीकार नहीं किया.
मैंने क्या किया यह बात हर मायनों में छोटी हो जाती है जब बात आपके करने की आती है. ये मुझे ही क्या आपसे जुड़ने वाले हर व्यक्ति को अनुभव हुआ. किसी की भी त्रुटि दिखाई देते ही आप अपना छोटा सा सितारे वाला बिंदु उसे दिखा देते हैं और त्रुटि सुधार होते ही आप तुरन्त वो बिंदु हटा लेते. मैं हतप्रभ थी कलम के धनी व्यक्तित्व को इतना नत देखकर. किसी बात का न कोई अभिमान न ही कुछ जताना. किसी के कुछ भी पूछने पर बिना लाग लपेट सब कुछ बता देना बस आप ही कर सकते हैं. मैंने पहली बार ऐसा व्यक्तित्व देखा जिसने लोगों को अपने कंधों पर चढ़कर आगे बढ़ने के अवसर दिए. आपके मुखारविंद से मैंने एक भी नाम नहीं सुना जिसके लिए आपने स्वीकार किया हो कि आपने लेखक बनने में उसकी मदद की. इतना ओज, प्रखर, सहयोग पूर्ण व्यक्तित्व एवम प्रतिभाशाली, सहृदयी... किसी को नमन करने के लिए इससे अधिक चाहिए भी क्या! नतमस्तक हूँ उस प्रकाश की जो आप बिना कहे बिखेरते रहे. कभी नहीं सोचा कि ये कोई सौदा नहीं आप तो बस दे ही रहे हैं. अपितु आपने इस परिपाटी को बचाकर रखा कि प्रकाश सोखने वाला हस्त भी कहीं किसी को तो आशावान करेगा. मैंने अंतःकरण से अनुभव किया इस सत्य को. सृजन के अतिरिक्त नैतिक मूल्यों पर भी आपकी तीसरी आँख रहती है.
मेरा मन साँचा और मिट्टी कच्ची
ज्ञान कूप मिल गयी भक्ति सच्ची
भटक न रही जब संग चरण, गुरु
और न कुछ, प्रथम मंत्र मैं गुरु वरूँ
बस एक वो, दूजा समर्थ न कोई
शीत ज्यों भानु, अगन मार्तंड होई
दीप हो ज्योति, खग हो आकाश
दृग-दृग पसरी है, धैर्यता खास
ध्रुव सा अटल, धूम्र सा उज्ज्वल
उदधि है ज्वार तरणी सी कल-कल
अंतहीन स्नेही विनम्र सम अनुभूति
पीड़ा पर वार सम, लगती उद्भूति
सदसानिध्य अकिंचन को उपहार
ज्ञान का उपक्रम अज्ञानता पे प्रहार
गुरु ने रख लिया, लघुता का मान
दरस ऐसे हों जैसे बने सूर महान
गरल समन्दर से सुधा निकाल लाए
बीच भँवर में भी कश्ती न डगमगाए
एक अच्छा गुरु तरणताल में सीखने के लिए कभी शिष्य को नहीं उतारता वो बीच भँवर में डुबकियाँ लगवा सकने में सक्षम है. गुरु ने यदि मुझमें मोम के पंख लगाकर सूर्य तक उड़ान भरने की इच्छाशक्ति जगायी तो उनको विश्वास रहता है कि मैं दक्ष हूँ इसमें.
गढ़ते नित्य विहान, दीप तुम जलना निरन्तर चिर स्मृति के गान कर रोष से उल्लास अंतर
आपके ये शब्द सद्प्रेरणा हैं जीवन के लिए कि अंत कुछ भी नहीं होता. सही मार्गदर्शन होने पर हर क्षण एक प्रारम्भ है.
आपका दर्शन मुझे बाध्य करता है हर बार कि मैं रिक्त मुठ्ठियों में भी प्रयास करती रहूँ. गुरु की बात आने पर सबसे लुभावने लगते हैं आपके शब्द जब आप कहते हैं कि प्रकृति से बढ़कर कोई गुरु नहीं. प्रकृति से हम क्षण-क्षण, कण-कण सीखते हैं.
अंततः नमन, वंदन और अभिनन्दन. 🙏
गुरुवार, 22 जुलाई 2021
बुधवार, 21 जुलाई 2021
बेटी: किलकारी से महावर तक
क्षितिज पर ललछौं आभा से भी पहले पसरी
मेरे जीवन पर सलिल हृदय रक्ताभ ललाट
स्वेद को मेरी पीड़ा को किलकारियों में भुलाती
बूँद-बूँद समेटती रही मेरे मन का उचाट
वर्तिका, तितली, परागकण तो कभी छुई मुई
सदुपाय, आलम्बन तो कभी स्वत्त्व बन मिली
मैं अरण्य, वन, कानन घूमा वो तोतली मिश्री की डली
कितने दिन के मैं भँवर चला उसे देख मेरी हर शाम ढ़ली
उसका प्रदीप्य और वो मुख मशाल
बना कभी मेरा गांडीव तो कभी शंखनाद
उसके चित्रों में मिलते सुपरमैन मूँछों वाले
उसके कल्पनाओं की सिम्फ़नी दिखाती मेरे रुप मतवाले
उसकी तरुणाई की छम छम का असर बढ़ा
मेरे कन्धे पर सर रख, गोदी के झूले में
सोने वाली का हाथ, मुझे अपने कंधे पर मिला
माँ, दादी माँ, नानी माँ तो कभी परनानी
मेरी अल्फ़ा, बीटा और अनसुलझी प्रमेय की दीवानी
ठुनक जाती है जब भी कहता हूँ, कोई और ठौर है तेरा
बिठाना है तुझे नाव सपनों जिस संग, सिरमौर है तेरा
छाप तेरे महावर की होगी, लगे जब अंग प्रियवर
खोज नहीं पाऊँ मैं भी, नाम मुझ सा अनल अक्षर
कैसे कहूँ बेटी हृदय में हूक सी समा जाती है
आँगन घर का हो या मन का बस तू ही सुहाती है.
सोमवार, 19 जुलाई 2021
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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•स्मृति क्या है? °बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि •शोर क्यों स्वर क्यों नहीं? °जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म...
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•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...
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मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...







