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शनिवार, 23 जून 2018

न तुम जानो न...


सुख मेरी आँखों का 

दुःख मेरे अंतर का 

या तुम जानो 

या मैं जानूँ,

उष्मित होता है जब प्रेम,

पिघलती रहती है 

भावों की बर्फ 

परत दर परत,

तुम बांधते रहते हो 

मन का कोना 

मैं खुलती रहती हूँ 

सवालों की तरह.

एक पहेली ही तो है 

वो पल 

जो तुम जानो 

और मैं जानूँ,

पूर्णता है प्रेम की 

तुम्हे पा लेने में,

एकाकी है मन 

तुम्हे खुद में समां लेने में,

मेरे मन के वृन्दावन में 

क्यों रहते हो हर पल 

तुम ही तुम 

न तुम जानो 

न मैं जानूँ।

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