8To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
रविवार, 5 अगस्त 2018
यादों की सीलन पर ठहरी धूप: भाग- II
शनिवार, 4 अगस्त 2018
तुम ही नहीं तो...
उन होठों से लगा चाय का प्याला
या हो मेरे भूखे पेट का निवाला
न हो वो तो सब स्वाद फ़ना है
दोस्त तुम ही नहीं तो रौनक कहाँ है?
मैं सोचूँ गर तुम्हें, तुम सामने मुस्कराओ
मुझे ईश से पहले तुम नज़र आओ
वार दी है मैंने तुझपर किताबों की दौलत
हो बन्दिगी में शामिल, ज़िंदगी बनाओ
मेरी हथेलियों पर तेरा नाम लिखा है
दोस्त तुम....
तुम्हारे नाम अपनी सुबह-शाम लिखूँगी
तुमपर ही अपनी उम्र तमाम लिखूँगी
देवालय हो मेरा घर या मदिरालय की राह लूँ
ईश से भी ऊपर तुम्हारा नाम लिखूँगी
तुमसे है मंदिर-मस्जिद, अजान-दुआ है
दोस्त तुम...
गुरुवार, 2 अगस्त 2018
यादों की सीलन पर ठहरी धूप: भाग- I
शनिवार, 28 जुलाई 2018
जन्मदिवस की असीम शुभकामनाएं
जन्मदिन पर बधाई देना
बीमा की प्रीमियम भुगतान जैसा है
हर वर्ष नियत समय पर
भले ही किसी कार्यक्रम का
कोई काल-चक्र रुक जाए
पर स्नेह के इन पलों में असंतुलन न आए,
अक्षरों में न तो नेह ठहरता है
और न शब्दों में बधाई समाती है
फिर भी अपने और अपनों में भेद कराते
ये शब्द ही तो थाती हैं;
कुछ भी नहीं है इस अकिंचन के पास
कुछ शुभकामना के पल अशेष हैं,
ओस पर चमकती धूप मुबारक़ हो तुम्हें
बादलों की गोद में इंद्रधनुष का रूप
मुबारक़ हो तुम्हें
सागर सी गहराई, हिमालय सी ऊँचाई
क्षितिज की थाह जो दुनिया देख न पाई
प्रकृति की सुंदरता मुबारक़ हो तुम्हें
अग्नि की पावनता मुबारक़ हो तुम्हें
लम्हों की अनवरतता मुबारक़ हो तुम्हें
युगों की सत्ता मुबारक़ हो तुम्हें
परिस्थितियों की विषमता तुम्हें छू न पाएं
गांडीव, सुदर्शन बन रक्षा कवच मुस्कराएं
माथे पर रहे अक्षत, रोली का टीका
बारिशों का जल आचमन को आए,
समय की नब्ज थामकर
अंकित कर दो अपने हस्ताक्षर
उम्मीदों के आसमान पर
लिखते रहो स्वर्णाक्षर,
कर लो दुनिया मुट्ठी में कोई बड़ी बात नहीं
छोटे से मन की बस इतनी सी अभिलाषा है
बुधवार, 25 जुलाई 2018
ये किस्से भी न...
झूठ के पांव से चलते हैं किस्से
बहुत लंबी होती है इनकी उमर
हर मुसाफिरखाने पर रुकते हैं
करते ही हैं थोड़ी सी सरगोशी हवाओं में
फिर बांधकर पोटली निकल पड़ते हैं;
ये किस्से भी बड़े अजीब होते हैं
महसूस सच के बेहद करीब होते हैं
किसी के लिए शहद भरे हों जैसे
तो कहीं कड़वे करेले नसीब होते हैं,
तितलियों के पंखों में बँध जाते हैं
पक्षियों के ठौर पर इतराते हैं
विदेशी बन ठाठ से जाते हैं कभी
तो प्रवासी बन मन को लुभाते हैं कभी
उम्मीदों की गिरह से निकलते हैं
दुआ-ताबीज के बेहद करीब होते हैं
ये किस्से भी न..
ये चलने का मुहूरत नहीं देखते
और न ठहरने का ही समय
दबे पाँव महफ़िल की शान बनते हैं
ये मुखारबिन्दु से तभी निकलेंगे
जब होंठ हो हाथों से छुपे
एक मुंह से दूसरे कान का सफर तय करते हुए
न-न में भी महफ़िल की रौनकें बन जाते हैं
सच के कंधे पे अपनी मैराथन पूरी करके
उसे पार्थिव बना मुस्कराते हैं
अमीर होकर भी कितने गरीब होते हैं
ये किस्से तो बस....
राजा-रानी के किस्से
नाना-नानी के किस्से
दम तोड़ते रिश्तों के
हर घर की कहानी के किस्से
घर से गलियों से निकले
संसद के गलियारों के किस्से
हीरेजड़ित अमीरों के हो कभी या
टाट की पैबन्द से निकले गरीबों के हिस्से
ये किस्से अगर मर भी जाएं तो क्या हो?
मग़र ये बड़े बदनसीब होते हैं
ये किस्से तो उफ्फ्फ....
वेज तड़का मसालेदार होते हैं कभी
तो नॉनवेज भी निकलते हैं
साधारण शुरुआत होती है इनकी
परोसने तक गार्निश होकर मिलते हैं
पचते नहीं हैं किसी पेट में ये
तभी तो कानों से होकर मुँह से निकलते हैं
होतेे ही रहते मकानों के अंदर
गूँगी ये दीवारें बोलती कब हैं इनको
मग़र कान फैला ही देते हैं जग में
हे प्रभु, किस्से पच सकें वो ऑर्गन बना दो
या इंसानी नियत को हीलियम से भारी बना दो,
औरो की गिराने की चाहत में नंगा हुआ जा रहा
मुफ़लिसी, दर्द के ये सबसे करीब होते हैं
ये किस्से भी छि ...बड़े अजीब होते हैं
जीजी को ताई से लड़वा दें
आंखों के पहरे को नीम्बू मिर्च लटका दें
सच के गर्दन पे तलवार रखकर
पड़ोसी की बीवी को लुगाई बना दें
बेटी के ब्याह का न्योता पिता को भेजकर
आहों की भी जगहंसाई करा दें,
अपनी न किसी और की सही
श्वसुर के दामाद को ओलम्पिक में मेडल दिला दें
कहीं हो न जाए उलटफेर इतनी
काश कि शोक सभा में खुद को स्वर्गीय बना दें,
पर कहाँ सच के इतने नसीब होते हैं
ये किस्से भी न इतने ही अजीब होते हैं।
सोमवार, 23 जुलाई 2018
तब भी हम होंगे...
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
-
•स्मृति क्या है? °बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि •शोर क्यों स्वर क्यों नहीं? °जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म...
-
•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...
-
मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...
