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यादों की सीलन पर ठहरी धूप: भाग- II

गतांक से आगे

ये वक़्त ऐसे लग रहा था जैसे प्रेम का एक सिरा छोड़कर दूसरा थाम लिया हो, मेरे और शिव के होने में बस मैं और शिव ही थे। हमारे बीच मैं और तुम की सीमा-रेखा गायब सी लगी जैसे इस कमरे में उदासी कहीं हवा की रस्सी का फंदा बनाकर झूल गई। कभी-कभी अंतिम साँसें भी तो अलग सा सुकून देकर जाती हैं। कहीं से भी ये अहसास नहीं हो रहा था कि हम नौ महीने के एक लंबे अंतराल के बाद मिल रहे थे। एक लंबी सी ख़ामोशी का लिहाफ़ ओढ़े हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में ऐसे समाए थे कि मौत भी आ जाए तो साँसें टूटने का अफ़सोस न हो। शिव की गर्म साँसें प्रेम से थरथराता मेरा बदन सम्हाले हुए हैं। उसकी बाहों का घेरा जो सुख और सुरक्षा दे रहा है उसकी तुलना मैं चहचहाते हुए चिड़ियों के बच्चों से कर सकती हूँ। कितना शोर करते हैं जब उनका शिव उनसे दूर हो जाता है। शिव, हाँ यही तो नाम है प्रेम का और सुरक्षा का। उसके होने भर से ही तो खिल उठा है घर, चहक गया है घर का हर कोना...आँखें खोलकर मैंने शिव का चेहरा देखा। सुकून से बंद उसकी पलकें देखकर साहस ही न हुआ कि उसे छोड़कर कहीं जाऊँ...क्या मेरी तरह शिव भी आज नौ महीने बाद ज़िंदा हुआ है...
"...मालि"
"हुं"
"कहाँ हो तुम?"
"यहीं तो हूँ...अपने शिव के पास"
"फिर....तुम महसूस क्यों नहीं हो रही मुझे...मेरे अंदर...मालि पास होकर भी पास क्यों नहीं लग रही..." शिव क्या नींद में बड़बड़ा रहा है ये देखने के लिए मैं अचकचाकर उठ गई। अपनी कुहनी गद्दे पर टिकाकर उसका चेहरा देखने लगी..मुझे लगा शायद मेरा सोचना सही था तभी उसने मेरा हाथ खींचकर अपने ऊपर लगभग लिटा सा लिया। मैं अपने पैरों की उँगलियों से गद्दे पर पड़ी चादर सही करने लगी। असहाय सी पड़ी हूँ उसके ऊपर, अपने बदन का बोझ उसपर ऐसे डाल रखा है जैसे मुझसे सम्हलेगा ही नहीं। सामने दीवार पर टंगी बड़ी सी काले रंग की घड़ी में लगातर चलती हुई सुईं ही एक ऐसी थी जो पूरे कमरे के जीवन्त होने का आभास दे रही थी। मिनट की सुईं से कचनार के पेड़ पर चीं-चीं करते बच्चे दिन के आगे बढ़ने का बखान कर रहे  हैं और घंटे की सुईं सा सोया शिव...उफ्फ्फ कितना मासूम और प्यारा लग रहा..जी करता है पूरा इश्क़ उड़ेल दूँ इस पर अभी का अभी...
"ये क्या तुमने अब तक पहन रखा है इसे?" शिव का पैर मेरे टो रिंग पर पड़ गया था।
"और ये मंगलसूत्र भी..." मेरे गले पर हाथ फिराते हुए बोला।
"क्यों, तुम्हें क्या लगा था मैं..."
"क्या तुम इसे उतार नहीं सकती...अभी?
"ये क्या कह रहे हो शिव?"
"मेरे कहने पर भी नहीं..."
"ये मेरे ब्याहता होने की निशानी है।"
"यू आर अ वेल एजुकेटेड गर्ल..."
"सो व्हाट...एजुकेशन नेवर टीचेस अस टु बी अनकलचर्ड..."
"मालि...ट्राय टू अंडरस्टैंड"
"शिव...प्लीज"
"मालि..."
"शिव मैं उन सब बातों को जीते रहना चाहती हूँ। मैं प्रेम करते रहना चाहती हूँ।"
"तो ऐसा बोलो न, तुम्हें जीवन की नीरसता से प्रेम है..मन की उचाटता से प्रेम है...जो थम गया उसे लेकर कुछ नहीं हासिल होने वाला...यादें मन का कोना घेरती हैं...जो जगह प्रेम की होनी चाहिए..."
"लेकिन शिव जो वक़्त हम जी चुके होते हैं वो भुलाना इतना आसान नहीं होता..."
"ये कब बोला मैंने..भुलाओ मत उन्हें..उनसे सीखो...अक्सर ऐसा होता है न मालि कि हम खुद ही खुद को उलझाकर रह जाते हैं.. ये सोचकर कि अब कुछ भी अच्छा नहीं होगा, जो बीत गया बस वही ठीक था। अब ऐसे सोचो न...जब वो वक़्त हमारा प्रेजेंट था तो क्या हम सैटिसफाइड थे?"
"हाँ सही कह रहे हो..वैसे भी तुम सही ही कहते हो..पर परिस्थितियां भी जिम्मेदार होती हैं बहुत कुछ होते रहने के लिए?"
"ह्म्म्म मान लिया पर क्या तुम्हारे या हमारे सोचने भर से परिस्थितियां कुछ कॉम्पेनसेट करने आएंगी....नहीं न! फिर तो अपना ही नुकसान हुआ।"

कहानी जारी रहेगी...

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