Coffee with Abhi

Buy Me a Coffee

सोमवार, 13 अगस्त 2018

आहत भारत

नीलाभ छितरे गगन के तले
भावनाओं से बंजर जमीं पर
श्वेत शांति मध्य में समेटे
गति की आभा, केसरिया शौर्य लिए
मैं हूँ विक्षिप्त भारत माता
प्राणवायु मुझे छूकर निकलती है
जल की थाती जीवन का संचार करती है
अरुणाभ से मैं जगती हूँ
श्वेत चाँदनी में खिलती हूँ
प्रेम और वैराग्य से पोषित हूँ
सीप की गोद में खिलकर
हिमालय के मुख में मिलती हूँ
स्वाभिमान का प्रतीक, पर
विक्षिप्तता की दहलीज़ पर हूँ
मेरे पैरों में समृद्धि और स्नेह के
सूचक बना दो
ए जीवन, मेरे आगमन का मंगल गा दो

कोई टिप्पणी नहीं:

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php