To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
शुक्रवार, 16 जुलाई 2021
गुरुवार, 15 जुलाई 2021
बुधवार, 14 जुलाई 2021
मंगलवार, 13 जुलाई 2021
सोमवार, 12 जुलाई 2021
कैसे कहें प्रेम है तुमसे!
बहुत प्यार करने लगे हैं हम तुम्हें
जाने कितने दिनों से दिल में
चल रहा है बहुत कुछ
और कोई बात नहीं होती
कोई और होता भी नहीं वहाँ
इस तरह रहने लगे हो हमारे दिल में
कि हमें भी रहने नहीं देते हो अपने साथ
किए रहते हो अलग-थलग जैसे
हवा की आहट पर झाड़ देता हो
कोई पत्ता अपनी देह की धूल
बात-बात पर कर देते हो हमें अपनी
उन मुस्कुराहटों से विस्थापित
जिनके इंतज़ार में गीली रहती हैं कोरें
तुम्हारी सवा किलो की यादें
और एक मन का दर्द…
कभी रुको न हमारे सामने घड़ी दो घड़ी
तो देख लें मन भरकर तुम्हें
चूम लें तुम्हारे होने को
कभी कहो न कुछ…
क्यों कहें हम, कितना प्यार है तुमसे
खोल तो दी है हमने अपनी
इच्छाओं की सीमा
विचरण कर रहा है प्रेमसूय अश्व
हमें स्वीकार है तुम्हारी सत्ता
हम निहत्थे ही आयेंगे तुमसे परास्त होने
एक बार चलाओ अपना प्रेम शस्त्र.
PC: Google
रविवार, 11 जुलाई 2021
प्रियंवदा के लिए दो शब्द
प्रकृति, प्रेम, प्रियंवदा और प्रियम, लगते हैं न सभी एक-दूसरे के पूरक. यक़ीनन हैं भी. ख़ुशगवार रहा ये वक़्त कि एक और पुस्तक मुझे उपहार में मिली. शब्दों से इतना गहरा है लेखिका का प्रेम कि शब्द-शब्द दिल में उतरती हैं इनकी बातें. कविताओं में एक सुंदर और प्रेमिल संसार रच दिया है.
इसके पहले पन्ने ने ही मुझे प्रभावित किया जहाँ लेखिका ने अधिक भूमिका न बाँधते हुए बस इतना ही प्रभावशाली ढंग से कहा है कि वो बिखरे हुए मोतियों को पुनः सजाने का प्रयत्न कर रही हैं. अनुक्रमणिका से ही स्पष्ट है कि आधुनिक गद्य से सजी इन कविताओं का वैशिष्ट्य प्रेम है.
पुस्तक का पहला खंड मनभावन प्रेम को समर्पित है. नायिका के अधिकांशतः एकल संवाद गहनता को दिखाते हैं. कभी-कभी सोच की उत्कंठा इस तरह बढ़ जाती है कि सारे प्रश्नों के उत्तर स्वतः ही झरने लगते हैं…
"मगर यही सोच/ मेरी उत्सुकता को/ मेरे भीतर ही थाम लेती है/ कि जो आंनद उत्सुक फुहार में है/ वो प्रश्नों के तीव्र बौछार में कहाँ?..."
जहाँ एक ओर प्रेम में प्रतीक्षा की निष्ठुरता है वहीं दूसरी ओर आगमन का पुलक सहजता मन भी है. "प्रेमागमन" एक ऐसी ही अभिव्यक्ति है. आसमानी स्वंयम्बर से एकाएक नायिका भू लोक पर आ जाती है और उनकी तलाश होती है अपने प्रेमी के लिए उपहार पर मन का दिव्य प्रेम इसे तुच्छ मानकर विस्मृत करना चाहता है. गीतों से शृंगार और समुद्र की प्रेयसी बनने जैसे भावों में अतिशयोक्ति का प्रयोग हुआ है.
"मैं बन लहर/ आसमां पहन/ समुद्र की मैं प्रेयसी/ बादलों से उतर आयी हूँ…"
अगला खण्ड "तुम्हें प्रेम करने की मेरी चाह" पूर्ण रुप से उन प्रतिमानों को समर्पित है नायिका जिन प्रतिबिंबों में स्वयं को रखकर अपने प्रिय के पास पहुँच जाना चाहती है. पत्र के माध्यम से तो कभी पक्षी बनकर, कभी नदी की भाँति अगाध हो ईर्ष्या रुपी ज्वालामुखी उसमें बहाकर तो कभी तीव्र कल्पनाओं के माध्यम से. मकड़जाल रुपी नायिका का हृदय भी इससे अछूता नहीं. अंतिम दो कविताएँ जिनमें प्रिय की खोज और विश्वास वर्णित है, खण्ड की सुंदरता बढ़ाते हैं.
अगले पड़ाव "अलविदा प्रेम" के अंतर्गत इस सच को उकेरा है कि जब जीवन में प्रेम शेष न हो तो कठिन है प्रेम कविताएँ लिखना. उदास मन की तुलना कभी रेलगाड़ी से तो कभी सावन मनाकर पीहर से लौटती नवविवाहिता से की गयी. विदा प्रेम की गहन पीड़ा झलकती है इन शब्दों में…
"किसी भाषा में/ किसी बोली में/ किसी पुस्तकालय/ या शब्दकोश में/ नहीं मिल रहा/ वह शब्द./
जो/ आशाओं के/ पुनः सृजन में/ असमर्थता से/उतपन्न पीड़ा को/ व्यक्त कर सके."
"उदास प्रेमिकाओं" का मार्मिक चित्रण किया है अगले भाग में. नायिका भली भांति जानती है कि वो भले ही अहल्या हो ले पर राम नहीं आने वाले. किसी के आने और जाने के बीच की स्थिति में कितना कठिन है सामंजस्य बिठाना. छोटी-छोटी बातों को सहेज लेने से आसान हो सकता था जीना. कैसे कम होगा दुःख जब "दुःख ही एकमात्र सत्य है". प्रेम देखने की अभ्यस्त आँखें कहाँ पाती हैं ठौर, भले ही विलीन हो जाएँ स्मृतियों में.
अगला भाग समर्पित है कभी शुष्क, कभी जल बनी "नदी एवं स्त्री" को. आदिकाल से नदी की तुलना स्त्री से की गयी है. कहीं नदी का सागर में विलीन होकर मृत हो जाना है तो कहीं संभावना है जीवन मृत सागर से अंगड़ाई ले. उपेक्षा में विलीन चेहरा भी है. लूणी का संघर्ष इस भाग का उर है.
"तब लौट आयी होगी/ खंडित हृदया चुपचाप/ मन में कुछ विचारते/ सँजोते हुए प्रेम पर विश्वास."
अंत में आते हैं इस पुस्तक के "प्रिय तुम मेरी प्रतीक्षा करने के साथ". सभी कविताएँ सुंदर बन पड़ी हैं. कविता के माध्यम से लेखिका ने उजागर किया है प्रेम के लिए अपना दर्द, जब प्रेम को हृदय में सींचते हुए प्रथा, परम्परा, मान्यता, आडम्बर और सीमाएँ बाधक बनती हैं. जिनसे पार जाकर नायिका प्रेम जीना चाहती है.
पुस्तक में इससे इतर कुछ कमियाँ भी दृष्टिगोचर होती हैं. प्रूफ़ रीडिंग का अभाव तो कहीं-कहीं पर उपयुक्त फॉन्ट का चुनाव न होना अखरता है.
उपरोक्त पुस्तक की लेखिका नेहा मिश्रा "प्रियम" का यह प्रथम काव्य संग्रह है. संग्रह का मूल्य १४९/- रुपये मात्र है.
लेखिका को साहित्यिक उज्ज्वल भविष्य हेतु अशेष शुभकामनाएँ! लेखक मित्र माननीय अनूप कमल अग्रवाल "आग" जी की प्रेरणा से एक और पुस्तक की समीक्षा.
पुस्तक के लिए लिंक…
https://www.amazon.in/dp/1638869111/ref=cm_sw_r_wa_awdb_imm_967FS6ZQCYDX4HRGSWE7
शनिवार, 10 जुलाई 2021
आ अब लौट चलें
कल एक इतवार है २०२१ वाला
वही शांत, नीरव सा
घर की खिड़कियों से दूर ख़ाली मैदान देखता
और मोबाइल की स्क्रीन पर कोविड अपडेट लेता हुआ
जीवन बस एक टट्टू ही तो बनकर रह गया
आँखें तो असल रंग की पहचान तक भूल गयीं
अब सोचना पड़ता है कभी-कभी कि
दाता ने हमें हाथ, पाँव, मुँह, पेट भी क्यों दिया?
कुछ अधिक नहीं हो गया ये सब?
बस एक आँख और इतना सा दिमाग़ होता
और दिमाग में भी मेमोरी जैसा आइटम क्यों दिया?
बस गूगल कर दो और जय मना लो.
काम भी तो मिल जाता है बैठे-बिठाये
'वर्क फ्रॉम होम' संजीवनी ही हो गया जैसे
मटर छीलते हुए तीन-चार फ़ाइल निपट जायें
जब बात आये ऑन लाइन क्लासेज की
तो सीधा सा फण्डा…
न्यूटन, आइंस्टीन नहीं बनाने अब,
डॉक्टर, इंजीनियर बन ही कौन जाता
ऐसे माहौल में पढ़ाई करके?
आग, पहिए का अविष्कार पहले से हुआ
अब मोबाइल का भी हो गया.
अगर कुछ करना होगा तो पहिए को ही
प्रतिस्थापित करना है किसी
उपयोगी अविष्कार से…
नहीं, मैं नहीं जाना चाहती कल ऐसे इतवार में
बुला रही हैं 90 के दशक की कुछ शामें
जो यादों में ठहरी हुई हैं
सुबह उठते ही क्लास, कोचिंग, पढ़ाई
और खेल का जाना-पहचाना सा मैदान
इंटरवल पर घण्टे की बीट से भागते मन
नोट्स के लिए तक़रार, प्यार भाईचारा
जब लड़की माल नहीं बहन या दोस्त होती थी
सीमित साधनों में असीमित प्रेम
हम प्रोफाइल से नहीं मन से जुड़ते थे
लाइक, शेयर पर नहीं यारियों पर मचलते थे...
हाँ, मुझे चाहिए वही छुट्टी वाला इतवार
हर चेहरे पर एक सुकून, एतबार.
PC: Elin Cibian
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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•स्मृति क्या है? °बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि •शोर क्यों स्वर क्यों नहीं? °जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म...
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•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...
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मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...






