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आज सुबह चाय पीते हुए

तुम्हारा होना
रोज़ रोज़ होना
कोई आदत नहीं
न ही लत है मेरी, क्योंकि
तुम तो सुबह हो,
मेज पर रखे चाय के दो कप
तुम्हारे साथ घूंट घूंट पीना
और बूंद बूंद स्वाद लेना
बालकनी पर छितरे बेल की
खिड़की से झांकती पत्तियां
मेरी आंखों से पढ़ी
तुम्हारी कविताओं का
स्पर्श चाहती थीं,
ये खिल सी उठती हैं
जब मेरे होंठों पर
तुम्हारे शब्दों के इन्द्रधनुष रचते हैं
गोया इनके भी कान हों
इतने संवेदी
जैसे मेरे कान तुम्हारी कविता को,
आज वो बेल मुरझा गई
पढ़ी तो थीं आज भी
तुम्हारी कविताएं
पर आंखों से कही नहीं
न ही होंठों से बाची गईं
...फ़िर कभी हो सकेगी क्या
वो चाय तुम्हारे लिए
और वो कविता हमारे लिए.
....
आज सुबह चाय पीते हुए
पी गई थी जाने कितनी उलझनें
बस एक चाय ही तो नहीं पी थी
आज सुबह...

अग्नि मेरा गीत है


मैं निशा की चांदनी
मांग अंधेरा सजा है
भोर के आने से पहले
नर्तनों का गीत हो
तांडव की बेला हो जैसे,
कांपते हांथों से
मेरी देह का श्रंगार कर दो
भाव पर धरकर विभूति
रोम रोमांचित मेरा हो.
तुम अलग
मैं पराकाष्ठा हूं विलग की
नेत्र पर दृष्टि समेटे
खोलने को हों ज्यों आतुर
भस्म दो
तन पर मलूं मैं
शीत मेरा ताप हो...

जा ही रहे तो लौटकर मत आना!

मरना ही चाहते हो न तुम
तो आराम से मरो और पूरा मरो
रत्ती रत्ती मत मरना
मरने के प्रयास में कहीं जी भी मत उठना
इस दुनिया की नारकीय पीड़ा भोगने को दोबारा,
नहीं तो मार दिए जाओगे प्रश्नों की बौछार से,
तब तक मरो जब तक कि
ये न बता सको
रक्खा ही क्या है इस दुनिया में
ताकि आने वाली नस्लों को
सुनाई जाए शौर्य गाथा तुम्हारे नाम की
इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो जाओ तुम
एक तुम ही तो हो संतान आदम और हव्वा की
बाक़ी सब सरीसृप वर्ग के प्राणी हैं
किसी की कोख़ से कहां जन्में
कायिकी प्रवर्धन का परिणाम जो ठहरे;
तुम जी नहीं सकते तभी मरोगे
आत्मा तो उसी पल मार दी थी
जब जीने की जिजीवषा मरी थी,
तुम असीमित में सीमित हो
स्थूल में नगण्य हो
संभावनाओं की चौखट पर बैठे
वो द्वारपाल हो जो किसी स्त्री के
मैल से उत्पन्न विवेक शून्य प्रतीत होते हो,
अपने न होने में मगर
कभी होना न तलाशना
तुम वो भाव मारकर जा रहे हो
जिसे आत्मीयता की पराकाष्ठा कहते हैं.

बिटिया

हर चिड़िया के माथे पर एक उदासी
और पंखों में एक उमंग होती है
हर बार जमीन से
जितना भी ऊपर जाती है
हर चिड़िया के माथे पर
अा जाती है शिकन, फ़िर भी
हर चिड़िया अपनी चोंच में
नेह भर तिनका लिए रहती है.
बहुत कुछ ऐसी ही होती है बेटी
सब कुछ करती है सभी के लिए
पर चाहकर भी उड़ नहीं सकती
कभी अपने लिए.
क्योंकि हर बिटिया
परों वाली चिड़िया नहीं होती.

जीवन के बाद भी जीवन है कहीं!

बहुत ही कम लोग परिचित होंगे
इस शब्द के मायने से
शब्द से तो बहुत से लोग होंगे
पढ़ रखा होगा अख़बार में, पाठ्य-पुस्तकों में
कभी सुना भी होगा दूरदर्शन पर
अभी हाल ही में खबरों का आकर्षण रहे थे
जब लाखों की संख्या में इनके बेघर, विस्थापित होने की बात अाई थी;
सही समझे, वही हैं ये
जिनका कोई ठौर नहीं होता
सामान्य से नाक नक्शे वाले
हमारे तुम्हारे जैसे, पर
हम जैसों से प्रकाश वर्ष की दूरी तक.
याद आया पुरानी फिल्मों में देखते थे
हू ला ला जैसा कुछ,
ऐसे भी नहीं होते ये.
शहर की आबादी से मीलों दूर बसे
अपने ही समूह में रहते हैं
पेड़ों के घनी छांव में
वही तो इनका जीवन है.
लोग वृक्षारोपण करते हैं, सही होगा
पर असल मायनों में जंगल तो इन सबका
बचाया और बसाया हुआ है.
शहर की पगडंडी को पारकर
जब लगेगा हम जंगलों में हैं
और वहां भी मीलों चलना होगा
चलते रहना क्योंकि कोई सुराग नहीं मिलता जीवन का
फ़िर दूर कहीं कुछ चूजे दिखेंगे
कुछ दूरी पर मिलेगी बकरियों की सुगबुगाहट
तब कहीं जाकर महसूस होगा
कि जीवन के निशान बाकी हैं अभी
दूर से दिख रहा पुआल और बांस की दीवारों पर रखा खपरैल
कहीं कहीं मिट्टी का लेपन किया हुआ
अहसास दिलाता है वहां किसी के रहने का
पास जाने पर मिलता है बस एक रोमांच
कितना भी पुकारते रहो बाहर से
कौन सुनने ही वाला है, भीतर तक जाकर भी
शून्य ही रहती है संवेदना क्योंकि
इंसान बसते हुए भी नहीं मिलते वहां सभ्यता के निशान
उन्हें सलीका नहीं आता आगंतुक को बिठाने का
टूटी खाट को गिराकर बैठने पर ताकते रह जाते हैं विस्मय से
बदन पर गमछी या फ़िर छापा साड़ी लपेटे युवा स्त्रियां
वृद्ध स्त्रियां बदन ढक लेती हैं एक गमछी भर से
बहुत सम्मान के भाव में 'गो' का संबोधन
शिक्षा का ककहरा भी नहीं पता,
नहीं देखी है इन्होंने सड़क और रेल,
कई कई दिनों तक सोना पड़ता है भूखों
उबले हुए भात में पानी और मिश्रण मिलाकर
'हड़िया' पीने को मजबूर;
जाने कौन सी धारा के शिकार हैं ये
कि इंसान होकर भी इंसानी अस्तित्व से वंचित
उठानी होगी एक आवाज़ इनके हक़ में
जोड़ना होगा इन्हें भी समाज की मुख्यधारा से
या फ़िर मनाते रहेंगे आदिवासी दिवस हर वर्ष
जब तक इनका अस्तित्व ही ख़त्म न हो जाए!

यह कविता मित्र अपर्णा अन्वी (स्वयंसेवी संस्था एकजुट की डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर) के साथ हुए संवाद पर आधारित है.

आउट लाइन

कई पन्ने ऐसे गुज़रे ज़िन्दगी में
कि हाशिए के इस पार भी लिख दिया
अब भरने को है ये नोटबुक
बहुत से सवाल
और उनका प्रश्नचिन्ह मिटाते जवाब
कुछ सबक
और कुछ हिसाब,
थोड़ा रोना लिखा
कुछ हंसना भी लिखा
बहुत बड़ा था दोस्ती का पन्ना
अब लगता है सब कुछ लिख गया
जैसे ख़त्म होने को है ज़िन्दगी
और बनानी है
उस खात्मे को निर्धारित करती आउट लाइन
जिसके उस पार से मौत लपक लेगी
वैसे तो बाउंड्री के बाहर कैच आउट नहीं होता
पर उपर वाला अंपायर
खींच ले जाता है सांसें
इस आउट लाइन को पार करते ही.

अवसान तक प्रेम!

मैं बचाए रखना चाहती हूं प्रेम
ख़त्म होने तक भी
यहां तक कि प्रेम के अवशेष
जब कुछ भी न बचे दुनिया में
तब तुम्हें वो पोषित करता रहे
चिरकाल तक
और फ़िर तुमसे ही प्रारम्भ हो
एक नए युग का
जिसकी रगों में बहता हो
मेरा पोषित किया हुआ प्रेम.

स्त्री धर्म है!

नभ के सीप में बंद उदात्त स्त्री
स्वयं में एक सत्ता है
हवा की आरी से दुःख को चीरती हुई
शिव नहीं है तो क्या हुआ
गरल तो पी जाती है
वो पूजती है और पूजी जाती है
गोमुख से निकली पावनी सी पवित्र
वही तो है समूचा अस्तित्व
फिर प्रश्नचिन्ह कैसा
क्यों तोड़ना उसे
अगर वो जोड़ती है.
अपात्र नहीं है
वो तो सुपात्र है
स्वीकारनी होगी उसकी उन्मुक्तता
ताकि सृष्टि का संतुलन बना रहे.

एक प्रश्न

मुक्त कर दो न हमें
प्रेम के ब्रह्मास्त्र से
बांट लेते हैं
अपने अपने हिस्से की जमीन
तुम अपनी सल्तनत में
प्रेम के बीज बोना
और मैं सींचता रहूंगा वो स्नेह
जो चलते हुए तुम
आलिंगनबद्ध कर दे गईं थीं.
बोलो, इस तरह बचाकर
रख सकोगी प्रेम का वर्तुल स्वरूप?

उन्मुक्तता

जब स्वच्छंदता
स्व की बेड़ियों में
जकड़ दी जाती है
तो उन्मुक्तता का मूल
स्वतः ही नष्ट हो जाता है
जैसे समंदर की लहरों पर बने
पांवों के ढीठ निशान.
न तुम रह जाता है
न मैं
न ज़्यादा या कम की तू-तू, मैं-मैं.
उन्मुक्त ही रहने देने थे न
कुछ भाव
कि खुली आंखों से देखते
सृष्टि के विरले रंग
और आंखें बंद करो तो शिव.

मैं जीवन हूं


मैं सब कहीं हूँ
प्रेम में, विरह में
दर्द में, साज में
सादगी में हूँ
परिहास में भी हूँ
मूक गर शब्दों से
तो आभास में हूँ
मैं मधुर हूँ
नीम की छड़ में
मैं कटु हूँ
शहद के शहर में,
अणु हूँ
रासायनिक समीकरण में
गति हूँ
चाल हूँ
समय हूँ
भौतिक के हर नियम में,
मुझसे ही आगे बढ़ा है
डार्विन का हर वाद
अपना सा लगे
प्रजातन्त्र और स्वराज
माल्थस का सिद्धांत हो
या रोटी का भूगोल
रामानुजम ने बताया
न समझो हर जीरो गोल
मैं शेषनाग पर टिकी,
मोक्ष के मुख पर
कयाधु के गर्भ से निकली,
जड़ हूँ
चेतन हूँ
अजरता
अमरता 
का पोषण हूँ
मैं जीवन हूँ।


मेरी पहली पुस्तक

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