Coffee with Abhi

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शनिवार, 7 सितंबर 2024

भाषा ने लिपि से कहा




मैं आँखों की मधुर ध्वनि

तुम अधरों से झरती हो

घट घट में मैं डूबी हूँ

तुम कूप कूप में रहती हो


संकुचित स्वयं में हूँ

और तुमसे विस्तारित हूँ

मैं आविर्भाव जगत का,

मुझे संरक्षित तुम करती हो


3 टिप्‍पणियां:

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत सुन्दर

Anita ने कहा…

भाषा और लिपि का सुंदर संवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

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