" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!: वांगचुक छला जा रहा

सोमवार, 13 जुलाई 2026

वांगचुक छला जा रहा

स्त्रियों को सदैव भरोसेमंदो ने छला है

यह नहीं कहूँगी

मगर यह भी नहीं कहने जा रही कि

स्त्रियों को सदैव अजनबियों ने छला है


क्योंकि स्त्री ही नहीं

छले तो पुरुष भी गये हैं











KEEP US SAFE GOD!
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छल हमारे बीच पैर पसार चुका है

छल हमारे साथ आ गया है

इस तरह मासूम और अपना बनकर

कि हम ख़ुशी ख़ुशी छलवा लेते हैं ख़ुद को

जब समझ आता है तो छलछला उठते हैं


हम आँख पर पट्टी बाँधकर बैठे हैं

कि वांगचुक छला जा रहा जंतर मंतर पर

सच तो यह है कि 'उस' भीड़ के अलावा

हम सब छले जा रहे

हमारी आत्माओं पर बोझ बढ़ रहा

क्योंकि वो भीड़ हमारे बच्चों के लिए है वहाँ

हम यहाँ छल चुके जाने का आनंद ले रहे

न गुरुत्व बचा है हममें न चेतनता

उस गछ की जड़ बन गये

जो आए दिन गिर रहे चार बूँदें फिसलते ही


कोई और कितना, क्या ही छलेगा

2014 फिर नहीं मिलेगा



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